Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
कितना बोलते थे प्रमोद जी। नॉन स्टॉप। सुननेवाले का सिर दुःखने लगता था लेकिन बोलते-बोलते उनका मुँह नहीं दुःखता था। और अब ऐसी चुप्पी धार ली है कि साँसों तक की आवाज़ नहीं आ रही। एक-एक मंज़र आँखों के सामने तैर रहा है। लालकिले की वीडियो यूट्यूब पर डलवाने के लिए उनकी बेचैनी और मेरी लापरवाही की जुगलबंदी से जो गालियाँ निर्मित हुईं, उनकी मिठास मुझे अभी तक जस की तस याद है। और वह वीडियो अपलोड करने के बाद जब मैंने उनके लेखन पर लेख लिखा तो उनका अपनत्व, फोन पर मुझे डेढ़ घंटे तक झेलना पड़ा था। सिंगरौली यात्रा में बनारस से सिंगरौली तक अनवरत प्रवचन, आगरा में तेज भाई, संपत जी और रमेश भाई के सम्मुख मेरे गीतों की प्रशंसा का क्रम शुरू किया तो कार्यक्रम में विलम्ब हो जाने की क़ीमत पर भी उसे समाप्त करने को राज़ी न हुए। और पिछली 1 मार्च को दिल्ली के बीएसएफ ग्राउंड में मुरादाबादी दाल के चटखारे लेते हुए एक आँख मीचकर हौले से प्रशंसात्मक सवाल -‘क्या खाए हो गुरु, रोज़ ही लपक के गीत प गीत पेले जा रहे हो। ये वरदान है, जब तक मिल्ला है लपकते रहो। जब मिलना बंद हो जाएगा तो हमाई तरह फक्खड़ हो जाओगे।’
पहेली सी बूझ रहा हूँ कि मैं अपने साथ उनके इस अंतिम संवाद को आशीर्वाद मानूँ, सुझाव मानूँ या चेतावनी …काश उस ही रात उनसे पूछ लेता। उनकी यादें अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के साथ जीवन की पूंजी बन गई हैं।
अपने कवि होने पर उन्हें अहंकार बिल्कुल नहीं था, लेकिन ठसक पूरी थी। मूलतः पत्रकारिता से जुड़े रहे इसलिए उनके आँख, नाक, कान हमेशा तैनात रहते थे। ज़िन्दगी की किताब के इतने पृष्ठ पलट चुके थे कि अपने अनुभव साझा करते हुए वे कभी थकते ही नहीं थे।
मंचीय जोड़-तोड़ से वे अक्सर खिन्न रहा करते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति और मंच पर उनकी धमक से यह खिन्नता कभी अनर्गल नहीं लगती थी। नॉन-स्टॉप बोलने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। किसी यात्रा में यदि उन्हें ड्राइवर के साथ न बैठने को मिले तो वे पूरी यात्रा के दौरान आगे की दोनों सीटों के बीच ही स्थापित रहते थे ताकि संवाद की सम्प्रेषणीयता में कोई बाधा न आ सके।
किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना उन्हें बहुत पसंद नहीं था लेकिन मंचीय व्यवहार की कोई भी हरक़त उनकी नज़र से बच नहीं सकती थी। मन को भरपूर जीनेवाले प्रमोद तिवारी जी हिंदी कवि सम्मेलनीय जगत् में गीत का एक अनोखा तेवर स्थापित कर गए हैं।
आज भी जब कोई नया साधक उनके बिंब-विधान और उनकी मस्ती को गीत में साधने का प्रयास करता है तो भीतर से आवाज़ आती है कि कानपुर-लखनऊ हाइवे पर घटी दुर्घटना में उस सुबह केवल उनका शरीर ध्वस्त हुआ था, उनका मन आज भी गीत रच रहे बालकों को डपटकर बोलता है- ‘मस्ती भरे गीत लिखो बे!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
ले गया चुनकर कँवल कोई हठी युवराज
ताल के शैवाल-सा हिलता रहा मन
स्वर्ग का युवराज गीत-सरोवर के सबसे ख़ूबसूरत कँवल को ले चला और गीतों के रसिकों का मन काँपता रह गया। विरह और पीड़ा से परिपूर्ण किशन सरोज जी का कवित्व गीत की सबसे परिष्कृत शब्दावली का साधक था। मेहंदी रचे हाथों से दीप तिरोहित होते देख किशन सरोज जी वर्तिका के मोहपाश में बंधने की बजाय, जल में हुई सिहरन को महसूस करते रहे। गीत की संवेदना की सूक्ष्म दृष्टि का इससे बढ़िया कोई और उदाहरण तलाश पाना कठिन है। किशन जी के गीतों में यह सूक्ष्मदृष्टि फिर-फिर कर उतरती दिखती है।
अन्य गीतकारों की तरह स्वार्थ की ओट में जताए जा रहे संबंध भी उन्होंने गीत में अभिव्यक्त किये किंतु उनके लिए जो बिम्ब विधान किशन सरोज जी के पास था, वह अन्य गीतकारों के पास नहीं मिलता।
एक पल में आँख ओझल, हिरनियों का दल हुआ
कौन जाने, तन हुआ घायल कि मन घायल हुआ
बहुत घबराए अकेले प्राण, नदिया के किनारे
फिर लगा प्यासे हिरण के बाण, नदिया के किनारे
समर्पण की पराकाष्ठा और किसी अपने को अभय करने के लिए किस हद्द तक पहुँचा जा सकता है, यह बात समझने के लिए उनके गीत की इन पंक्तियों को जीना पड़ेगा र:
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया सब पुराने मित्र
तुम निश्चिन्त रहना!
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना!
अभिव्यक्ति के लिए इतनी सक्षम प्रतिभा और अनुभूति के लिए इतना संवेदनशील मन का संयोग ही किसी मनुष्य को किशन सरोज बना सकता है। एक गीत के मुखड़े में वे सामान्य बिम्ब विधान पर कविताएँ रचनेवालों को इशारे से बताते हैं कि संवेदना की दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहीं कविता खड़ी मिलती है। अहा, क्या गीत है –
नीम तरु से फूल झरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य!
यही आश्चर्य-बोध उनके प्रतीकों, बिंबों और शब्द-चयन को अभ्यार्थियों के लिए पाठशाला बना देता है। कितना बड़ा गीतकार, और कितना सहज मनुष्य! यह विलक्षण था। अपनी किसी आवश्यकता को तब तक किसी के सम्मुख प्रकट नहीं करते थे, जब तक उसे अनदेखा करना सम्भव होता था और फिर जब कहना पड़ता था तो संकोच का सागर उनके मन से उनकी वाणी तक लहलहाने लगता था।
न कोई लाग-लपेट, न कोई दिखावा और न ही कोई महत्वाकांक्षा, न किसी से स्पर्धा! केवल दो ही शब्द उनके पूरे जीवन का परकोटा रहे रू एक प्रेम, दूसरा गीत!
आज किशन जी विदा हो गए। गीत की गंगा में बहाए गए उनके सीप-शंख चुनकर आने वाली पीढियां गीत-वधुओं के कुन्तलों में गूँथती रहेंगी और गीत की कनुप्रिया की स्वर्णकेशी व्यथा का गायन युग-युग तक किशन सरोज जी के अस्तित्व की गवाही देता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आईआईटी रुड़की का कवि सम्मेलन था। सभागार में तिल रखने को जगह नहीं थी। मंच पर डॉ गोविंद व्यास, श्री मनोहर मनोज, श्री अरुण जैमिनी, श्री अंसार कम्बरी और मैं आमंत्रित कवियों के रूप में विराजमान थे। तीन कवि रुड़की स्थानीय कवियों के रूप में मंचासीन थे और दो युवक विद्यार्थी कवियों के रूप में।
संचालन प्रारंभ किया तो संस्थान में भूगोल विषय पर शोध कर रहे दिव्यांशु दीक्षित से शुरुआत कराई। पहले ही मुक्तक में दिव्यांशु ने मंत्रमुग्ध कर दिया-
मौन भी स्वर हो गए अब लौट आओ
प्रश्न उत्तर हो गए अब लौट आओ
फूल जल तुमने चढ़ाया पत्थरों पर
प्राण पत्थर हो गए अब लौट आओ
कथ्य और भाषा, दोनों उम्मीद से बेहतर थी। फिर भीतर के क्षुद्र अहंकार ने स्वप्न देखा कि शायद गीत कमज़ोर होगा। लेकिन गीत ने भी मेरे भीतर के अहंकार को चूर-चूर किया… अहा, क्या बिंबविधान था…
प्रेम में उतरा, तभी कठिनाइयाँ स्वीकार कर लीं
ज़िन्दगी की भँवर क्या, जब नयन झीलें पार कर लीं
उफ्फ… भूगोल का शोधार्थी, मन की इतनी गहरी परतों को खोलकर छू सकेगा.. यह मेरी कल्पना से परे था। जियो दिव्यांशु, तुम सबकी नज़रों में आओ, किन्तु तुम्हारी दिव्यता को किसी की नज़र न लगे। दिव्यांशु के काव्यपाठ का सम्मोहन अभी टूटा भी न था, कि संस्थान के पर्यवेक्षक श्री महावीर ने दार्शनिक मुक्तकों से मंच और श्रोतादीर्घा को चमत्कृत किया। अद्भुत मनोदशा थी, जितना सुनता जाता था, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती थी। जब हेमन्त मोहन ने ग़ज़लें पढ़नी शुरू कीं तो ऐसा लगा, ज्यों प्रतिभा अपने विश्वरूप के दर्शन करा रही हो। आँखें अपलक हो चली थीं और तन अकम्पित! और फिर एक शेर ने तो श्रेष्ठता के चरम को छू लिया-
क़ैदख़ानों को बड़ा करते रहें
लोग समझेंगे कि वो आज़ाद हैं
अहा.. रोम-रोम खिल उठा। कितने पुण्यों से ये दो मिसरे हेमन्त मोहन को मिले होंगे। ईश्वर इस लाजवाब शायर को ख़ूब आशीष दे! इसके बाद भी मंच काव्य से लबरेज ही रहा, विश्वकर्मा के प्रांगण में सरस्वती के इन लाडलों की उपस्थिति ऐसी ही थी मानो लंका नगरी की किसी कुटिया में रामभक्त मिल गया हो।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
जब हम शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, तब शिक्षकों का ख़ूब उपहास करते हैं। कोई ऐसा शिक्षित न मिलेगा जिसने अपने शिक्षकों के विकृत नामकरण न किये हों। किन्तु जब हम संघर्ष की वीथियों पर चलते हैं, तब उन्हीं शिक्षकों के सामान्य व्यवहार में उच्चरित वाक्य हमारी समस्याओं का समाधान बन जाते हैं। यही कारण है कि उद्दण्ड से उद्दण्ड बालक भी जब परिपक्व होता है तो उसके हृदय में अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान अवश्य उपजता है।
मुझे अपने शिक्षकों से अपार दुलार मिला। अनेक शिक्षक ऐसे रहे जो मित्र बनकर मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन गए। मेरे समवयस्कों में मेरे मित्र बहुत कम रहे, इसीलिए मुझे अपनी आयु से दस-बीस-तीस वर्ष अधिक के मित्र भरपूर मिले।
मैंने नवमीं कक्षा में दरियागंज के जैन स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ मुझे ऐसे-ऐसे शिक्षक मिले जिनके स्नेह और आचरण ने मेरे चरित्र का निर्माण किया। संस्कृत के अध्यापक आचार्य गिरीश पुरी गोस्वामी जी से मैंने भाषा का संस्कार और कठिन परिस्थितियों में संयत रहने का गुण सीखा। वे शब्दों के अपव्यय के विरोधी हैं, इसीलिए सही जगह पर बिल्कुल सही शब्द प्रयोग करना उन्होंने मुझे अपने आचरण से सिखा दिया। हिन्दी के अध्यापक श्री राजबल्लभ पचौरी के साथ मेरी घनिष्ठता सबको पता थी। वाद-विवाद से लेकर काव्यपाठ और भाषण तक जिस भी प्रतियोगिता में जाना हो, मुझे उसकी अनुमति में कभी कोई संकट नहीं आया क्योंकि पचौरी सर की ओर से मुझे अभय प्राप्त था।
मेरे क्लास टीचर भी मुझे ‘पचौरी जी का चेला’ कहते हुए खीझते हुए ही सही, लेकिन अनुमति दे ही देते थे। संगीत के अध्यापक श्री चन्द्रकान्त पाटणकर जी का मैं अधिकृत स्टूडेंट नहीं था किंतु ‘लोकोच्चार प्रतियोगिता’ के लिए उनकी जान खाने का अधिकार मुझे उन्होंने सहर्ष प्रदान किया था। एक हमारे अध्यापक थे श्री जी एस अग्रवाल। वे हमें भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। उन्होंने कभी किसी विद्यार्थी को डाँटा नहीं, लेकिन यदि किसी लड़के के प्रति उन्होंने खिन्नता प्रकट भी कर दी तो इससे फ़र्क़ पड़ता था। वे अपने शिक्षार्थियों के प्रति बेहद सजग थे। वे हमारे एक ऐसे अध्यापक थे, जो पाठ्यक्रम रटाते नहीं, बल्कि सिखाते थे। एक बहुत ग़ुस्सेवाले अध्यापक थे श्री वी एस राही। उनकी दहशत पूरे स्कूल के लड़कों को थी, लेकिन जब स्कूल से निवृत्त हुआ तो समझ आया कि उनकी सख़्ती ने हमारे जीवन में अनुशासन के ऐसे बीज बो दिए जिन पर पल्लवित आदतें हमारी सफलता की प्रशस्ति बन गई। इसी विद्यालय के परिसर में श्री राजकुमार चिटकारा से कम बोलकर ज़्यादा करने का गुण ग्रहण किया; श्रीमती अलका गुप्ता और श्रीमती अंजू रगता से अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में ऊर्जा नष्ट न करने का व्यवहार सीखा; श्री राजेश जैन और श्री पी दास से अपने विषय में पारंगत होने का महत्व समझा।
उपप्राचार्य श्री एस सी रस्तोगी से कुशल नेतृत्व की क्षमताएँ और प्राचार्य डॉ बी डी जैन से प्रबंधन की परिवक्वता हासिल की। विद्यालयों में जीवन भर श्रेष्ठ नागरिक तैयार करनेवाले इन अध्यापकों का आभार व्यक्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु आज अपने व्यक्तित्व की परतों का अन्वेषण करता हूँ तो अपने एक-एक शिक्षक को अपने व्यवहार की एक-एक परत में जीवित पाता हूँ।
स्कूल से निकलकर कॉलेज में गया तो वहाँ अनेक शिक्षक ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तित्व के रॉ फ्लैट को डेकोरेट करके शानदार बना दिया। मैं कभी नहीं भूल सकता कि वर्ष 2004 में मुझे ‘जनसंचार के सिद्धांत’ पढ़ानेवाली अतिथि प्रवक्ता श्रीमती ऋतु नानन पाण्डेय को जब यह पता चला कि मैं एक कवि सम्मेलन के लिए बेल्जियम पहुँच रहा हूँ, तो वे नीदरलैंड से अपने परिवार के साथ मुझसे मिलने बेल्जियम आ पहुँची। कवि सम्मेलन करके जब मैं होटल पहुँचा तो पता चला कि एक फैमिली पिछले 2 घण्टे से रिसेप्शन पर बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस घटना ने मुझे एक बार फिर सिखाया कि विनम्रता किसे कहते हैं।
एक और अतिथि प्रवक्ता डॉ संध्या गर्ग ने जीवन में मातृत्व की भूमिका अदा की। आज भी जीवन की हर चुनौती में उनके मार्गदर्शन से समाधान खोज ही लेता हूँ। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके कारण जीवन के इस दुर्गम पथ पर अनवरत बढ़ता जा रहा हूँ। आप भी तलाशिये, आपके भीतर भी आपके शिक्षक किसी न किसी ‘आदत’ के रूप में साँस ले रहे होंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आज 8 जून है। हिंदी कवि सम्मेलन जगत का सबसे उदास दिन। वर्ष 2009 में आज ही की तारीख़ के ब्रह्म मुहूर्त में हिंदी जगत् शोक में डूब गया था। 7 जून को बेतवा महोत्सव था। बहुत समृद्ध मंच था। प्रो अशोक चक्रधर, प्रदीप चौबे, ओमप्रकाश आदित्य, विनीत चौहान, नीरज पुरी, डॉ सरिता शर्मा, ओम व्यास ओम, देवल आशीष, पवन जैन, मदन मोहन समर, लाड सिंह गुर्जर और जॉनी बैरागी जैसे रचनाकारों ने देर रात तक शब्द यज्ञ किया। आश्चर्य यह था कि उस रात मंच पर लगभग प्रत्येक कवि की कविता में मृत्यु का ज़िक्र हुआ। मानो, मृत्यु आगत की सूचना दे रही हो। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। सभी कवि अलग-अलग गाड़ियों में बैठकर होटल के लिए रवाना हुए। एक गाड़ी में ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी, लाडसिंह गुर्जर, ओम व्यास ओम और जॉनी बैरागी सवार हुए। राह में मृत्यु प्रतीक्षारत थी। रात के अंधेरे में हाइवे पर दौड़ती गाड़ी सड़क किनारे खड़े एक अनजान ट्रक से जा टकराई। सरस्वती कुल में सूतक लग गया। हास्य के शास्त्रीय रचनाकार ओमप्रकाश आदित्य को उसी क्षण यम ने सरस्वती से छीन लिया। गाड़ी के भीतर मृत्यु और पीड़ा ताण्डव कर रही थी। गाड़ी का चालक और आदित्य जी मृत पड़े थे। ओमव्यास ओम, नीरज पुरी और लाडसिंह गुर्जर ख़ून से लथपथ थे। जॉनी बैरागी पिछली सीट पर थे। उनके हाथ में फ्रैक्चर था। हड्डी टूटने की पीड़ा के बावजूद वे किसी तरह गाड़ी से बाहर निकले और सड़क पर आने वाली गाड़ियों से सहायता मांगने लगे। पीछे विनीत भाई, समर जी और देवल भाई की गाड़ी आ रही थी। जॉनी को सड़क पर देख विनीत भाई ने गाड़ी रुकवा ली। घटना की भयावहता देख कर देवल भाई विह्वल हो गए लेकिन विनीत भाई ने हिम्मत के साथ गाड़ी से कवियों को बाहर निकालना शुरू किया। नीरज भाई का शरीर भारी था। दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी में वे फँस गए थे। गम्भीर रूप से घायल होने के कारण हिम्मत हारने लगे थे। विनीत भाई उन्हें लगातार आश्वस्त करते रहे कि नीरज हिम्मत रखो, तुम्हें कुछ नहीं होगा। तब तक देश भर में फोन बज गए थे, पास के गाँववाले मदद के लिए आ गए थे, मदन मोहन समर जी ने युद्ध स्तर पर पुलिस की मदद मुहैया करवा दी थी। एक वायुयान नीरज भाई के परिवार को चंडीगढ़ से भोपाल के लिए ले उड़ा था। ओम व्यास ओम कोमा में जा चुके थे। लाडसिंह सिंह और नीरज पुरी देर तक संघर्ष करने के बाद मृत्यु के मेहमान बन चुके थे। बैतूल में नीरज पुरी, शाजापुर में लाड सिंह गुर्जर और दिल्ली में आदित्य जी के अंतिम संस्कार हुए। आदित्य जी के अंतिम संस्कार में अल्हड़ बीकानेरी भी पहुँचे। घटना से इस हद तक आहत थे कि मालवीय नगर श्मशान भूमि के बाहर ही बैठ गए। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अस्पताल में भर्ती हो गए। कहते हैं उन दिनों अल्हड़ जी बार बार एक फिल्मी नग़मा गुनगुनाते थे – “आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं।” दस दिन तक जब मीत का कोई जवाब न आया तो 17 जून को अल्हड़ जी ख़ुद चले गए अपने मीत के पास। उधर ओम व्यास ओम बेसुध पड़े मृत्यु से लड़ रहे थे। उन दिनों तकनीक इतनी सहज नहीं थी, फिर भी किसी तरह उनकी कविताओं की रिकॉर्डिंग जुटाई गई और उन्हें सुनाई गई। देश भर का कवि समाज ओम व्यास जी के लिए बेचैन रहा। प्रशासनिक, मानवीय, तकनीकी और अन्य हर प्रकार की सहायता लिए पूरा हिंदी जगत् अनवरत तैनात रहा। लेकिन मृत्यु के साथ जारी यह युद्ध हम हार गए। एक महीने की अवधि में पाँच साथी खो गए। वो दौर याद आता है तो आज भी रूह काँप उठती है। मृत्यु, अंतिम संस्कार, उठावनी, तेरहवीं, रस्म पगड़ी…. ये सब शब्द अनुप्रास हो गए थे। मोबाइल की घण्टी बजती थी तो अनजान भय से मन काँपने लगता था। सरस्वती पुत्रों के इस सबसे कठिन दौर की बरसी पर सभी दिवंगतों को विनम्र श्रद्धांजलि!
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Diary, Prose
अनुभूतियाँ ज्यों-ज्यों ऊँची उठती जाती हैं, त्यों-त्यों उनकी उड़ान सहज होने लगती है। और एक सीमा के बाद उन्हें पंख नहीं हिलाने पड़ते, वे स्वतः ही सृजन के आकाश में तैरने लगती हैं। फिर उड़ान, उड़ान न रहकर बहाव बन जाती है। बस यही बहाव गीत का प्राणतत्त्व है।
शिल्प की यान्त्रिकता पीछे रह जाये और अनुभूति स्वतः ही लयात्मक होकर अभिव्यक्त होने लगे तो इसे गीत का अवतरण कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में व्याकरण को अलग से साधना नहीं पड़ता, इस स्थिति में मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं, बल्कि आनन्द के किसी चरम पर यदि पंख प्रमादी भी होने लगें तो आनन्द का वेग परिन्दे को बहा ले जाता है। यहाँ केवल आनन्द शेष रह जाता है और प्रक्रिया गौण हो जाती है। फिर तिरना निश्चित हो जाता है। यह याद ही नहीं आता कि पंख भी हिलाने हैं। यह होश ही नहीं रहता कि उड़ने के मूलभूत नियम न पाले गये तो दुर्घटना घट सकती है।
यह किसी रचनाकार के अपनी अनुभूतियों से एकाकार हो जाने की अवस्था है। यह किसी पथिक के मार्ग में लीन हो जाने की अवस्था है। पानी में दूर तक यात्रा करनी है तो ख़ुद को पानी कर लेने से बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है। आकाश में बहुत ऊँचे जाना हो तो हवा में घुल जाना ही श्रेयस्कर है।
भाव और भाषा के इसी एकाकार स्वरूप का नाम है गीत। लय की झंकृति के आकाश में तिरता अनुभूति का पाखी है गीत। पीड़ा, हर्ष, दर्शन, उत्साह अथवा अन्य किसी भी मनोदशा के चरम पर पहुँचकर रचनाकार को अनहद की जो ध्वनि सुनायी देती है, वही गीत है।
इसके लिये बहुत ज़ोर नहीं आज़माना पड़ता। ज़ोर आज़माकर गीत रचा ही नहीं जा सकता। बादलों को पत्थर मारने से बरसात नहीं होती। बादल तो स्वतः ही बरस पड़ता है …बेपरवाह …झमाझम। यदि अनुभूति लबालब भर गयी है तो गीत को छलकना ही होगा। उसको आमन्त्रित नहीं करना पड़ेगा। वह स्वतः आयेगा। आप मना करेंगे, तब भी आ जायेगा। फिर उसे रोकना नामुम्किन होगा।
मैंने कई बार गीत से झगड़ा किया है लेकिन उसने भी ढीठ दोस्त की तरह आने का क्रम जारी रखा। कई-कई दिन शक्ल नहीं देखी, लेकिन फिर जब मिला तो ऐसे मिला जैसे कभी बिछुड़ा ही न हो। गत दो-ढाई वर्ष में तो गीत मेरी अभिव्यक्ति का साया बन गया है। विचार का हाथ थामकर किसी भी राह पर चलूँ, लेकिन मंज़िल पर गीत खड़ा मिलता है।
‘छूकर निकली है बेचैनी’ ऐसी ही सृजन यात्राओं का प्राप्य है। संवेदना के अस्तित्व से जो कंपन मन के धरातल पर घटित होता है, उसकी तरंगों का लिप्यंतरण हैं ये गीत। इनमें प्रसव की पीर से लेकर विरक्ति की मनोदशा तक की अभिव्यक्ति है। इनमें वयष्टि के झरोखे से समष्टि का दर्शन करने का प्रयास है। पौराणिक संदर्भों के कॅनवास पर परिवेश का चित्र उकेरने की कोशिश है। हिन्दी गीत के वातायन में कणांश सरीखा अस्तित्व लिये यह संग्रह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। इसकी किसी भी पंक्ति से आपको अपने किसी अनुभव की गूंज सुनायी दे तो मेरी लेखनी को सहजता का आशीष दीजियेगा।
✍️ चिराग़ जैन
(“छूकर निकली है बेचैनी” की भूमिका)