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न्याय की आँखों पर विशेषाधिकारों की पट्टी

न्याय का सामान्य अर्थ है, परिस्थितियों के सम्यक आकलन के बाद पीड़ित को मरहम देना और अपराधी को दंडित करना। इस प्रक्रिया में किसी की जाति, लिंग, धर्म या आयु का प्रश्न कहाँ से जुड़ गया?
हमने विशेष-अधिकारों, वर्ग आधारित विशेष प्रकोष्ठों और इस तरह की अन्य व्यवस्थाओं से न्याय प्रक्रिया को अपाहिज बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है। इन प्रावधानों ने उस वर्ग को सर्वाधिक हानि पहुँचाई है, जिसके पक्ष में ये कानून बनाए गए हैं।
महिलाओं के पक्ष में दहेज कानूनों का प्रावधान हुआ तो उसकी गाज पारिवारिक जीवन की सहिष्णुता पर गिरी। जब घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के अपराधी को दंडित करने के लिये न्याय व्यवस्था सुसज्जित थी तो इस विशेष प्रावधान की आवश्यकता क्यों पड़ी। स्त्रियों के साथ ससुराल में होनेवाले दुर्व्यवहार की चिंता व्यक्त करते हुए ‘दहेज कानून’ बन तो गए लेकिन इस हथियार के दुरुपयोग के हज़ारों मुआमले अदालतों में ज़ाहिर होने लगे। दाम्पत्य जीवन की ज़रा-सी खटपट सीधे दहेज और घरेलू हिंसा के आक्षेपों तक जा पहुँची। लड़कियों ने परिवार बसाने के लिए प्रयास करने की बजाय थाने पहुँचना आसान समझ लिया। सास-ससुर, नंद-ननदोई, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी और यहाँ तक कि दोस्तों तक के नाम प्रताड़ना में लिखवाए; स्त्री सुरक्षा को कटिबद्ध पुलिस ने सबको लॉक अप में डाल दिया। परिवार के परिवार तबाह हो गए।
एक दिन अचानक अदालत को महसूस हुआ कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अब लड़की की शिकायत पर प्रमाण मांगे जाने लगे। अब ससुरालवाले डरते तो थे लेकिन त्वरित गिरफ्तारी की प्रक्रिया बन्द हो गई। किन्तु परिवार में सौहार्द कायम नहीं हो सका क्योंकि लड़कियों को बता दिया गया है कि कानून लड़की के पक्ष में झुका हुआ है।
‘चार बर्तन होंगे तो आवाज़ होगी ही’ -यह कहावत हम सबने सुनी है। लेकिन दाम्पत्य में साथ रहनेवाले बर्तनों को यह बताया गया कि यदि थाली और गिलास में टकराहट हो तो गिलास को आवाज़ करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि कानून थाली के पक्ष में झुका हुआ है।
क्यों जी, जिन लड़कियों ने दहेज कानूनों का दुरुपयोग करके अपने ससुराल पक्ष के सभी लोगों का जीवन नर्क कर दिया है, उनको किस अदालत ने दंडित किया है। पारिवारिक कलह को आधार बनाकर कन्यापक्ष, वरपक्ष से मोटी रकम वसूलता है और हमारे न्यायालय इसे सेटलमेंट का नाम देकर उस पर ठप्पा लगा देते हैं।
ग़ज़ब का न्याय है! पत्नी ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर हिंसा का आरोप लगाया। इन तीनों आरोपों में अपराधी को जेल भेजने की बजाय पैसे से पत्नी का मुँह बंद करने की सुविधा दे दी गई। अगर अदालत पति को अपराधी मानती है, तो उसे कारावास क्यों नहीं दिया जाता। और अगर अदालत जानती है कि पत्नी केवल क्रोध में उक्त आरोप लगा रही है तो किस अपराध में पति को आर्थिक मुआवजा देने के लिए बाध्य किया जाता है। कितने ही निर्दाेष लोग इस कानूनी व्यवस्था में असहाय होकर आत्मघात तक पहुँच गए।
इन प्रश्नों पर विचार करेंगे तो हम पाएंगे कि इस प्रकार की हर सेटलमेंट हमारी न्याय प्रक्रिया की विफलता को प्रमाणित करती है।
ठीक यही स्थिति एससी/एसटी कानून की भी है। दो व्यक्तियों के सामान्य से झगड़े को भी जातीय अपमान का मुद्दा बनाकर कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। हज़ारों निर्दाेष इस प्रावधान की भेंट चढ़ गए। एक दिन अचानक माननीय न्यायालय को लगा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। इसमें शिकायत दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी की बजाय पहले शिकायत की वास्तविकता की पड़ताल कर लेनी चाहिए। इतना सुनते ही झूठी शिकायतों को हथियार बनाकर ब्लैकमेल करनेवाले तथाकथित दलित भड़क गए और उन्होंने देश भर में उत्पात मचाकर न्यायलय को धमकी दी कि यदि हमारी शिकायत की वास्तविकता जाँचने की कोशिश की तो हम पूरा देश जला डालेंगे। सरकार ने इन बेचारे ब्लैकमेलर्स की बात सुनी और सुप्रीम कोर्ट को कहा कि तुमने बिना सोचे-समझे बेचारे दलितों के फटे कानून में टांग अड़ाई है, चलो दोबारा अपने निर्णय की पड़ताल करो, वरना ये बेचारे देश जला डालेंगे।
समझ नहीं आता कि संसद में बैठे विधिनिर्माताओं के पास वास्तव में दूरदर्शिता है ही नहीं या फिर वे जानबूझकर अगले इलेक्शन से आगे देखना नहीं चाहते। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता समाज का विश्वास जीतने की प्रथम सीढ़ी है। दहेज कानूनों से बर्बाद हुए परिवार और जातीय कानूनों से त्रस्त हुए लोग आज भी देश की संसद और न्यायालय की ओर इस आशा से देखते हैं कि हम तो शहीद हो गए साहब लेकिन अयोग्य योद्धा के हाथ से इन घातक अस्त्रों को वापस ले लो। इन अस्त्रों से ये अपने आसपास के लोगों को ज़ख्मी कर रहे हैं और अंततः अपनी भी जान के दुश्मन बन चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

आरक्षण के आंदोलन

प्रधानमंत्री ने विश्व भर में घूम-घूमकर देश की छवि सुधारी है। और छवि वास्तव में सुधरी भी है, लेकिन देश नहीं सुधरा। हम आज भी किसी देवता की तस्वीर को चप्पल से पीटकर अपने दलित होने की कुंठा निकाल रहे हैं। हम भगवान की तस्वीर पर जूते फेंककर सरकार से आरक्षण बहाल रखने की फिरौती मांग रहे हैं। यह सब देखकर बाबा भीमराव अंबेडकर फूले नहीं समा रहे होंगे। रेलगाड़ियाँ रोक दी गई हैं। बाज़ार बन्द पड़े हैं। सड़कों पर हथियारबंद गुंडे गुंडई कर रहे हैं। इन सबको गुंडागर्दी का आरक्षण चाहिए। ये सब बाबा अम्बेडकर के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने की स्वतंत्रता चाहते हैं। ये चाहते हैं कि जब पुलिस इन्हें हायतौबा करने से रोके तो संविधान पुलिस के हाथ बांध दे, लेकिन संविधान इन्हें हिंसा करने से रोके तो ये संविधान का बोरिया बांध दें।
सरकार इन्हें नहीं रोकेगी। वह माननीय न्यायालय से कहेगी कि अगले चुनाव में हमें इन लड़कों से विजय की पालकी उठवानी है इसलिए हम इन्हें बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटने से नहीं रोकेंगे सो तुम्हारे पास दो ही उपाय हैं या तो अपनी बहू-बेटियों को घर में घोंट दो या फिर इन लड़कों को आरक्षण की रिश्वत देकर विदा कर दो। न्यायालय सरकार को फटकारता है। सरकार आँसू बहाते हुए आरक्षण मांगनेवाली भीड़ को बताती है कि हमने तुम्हारी बात रखी तो हमें न्यायालय ने डाँट दिया। सुनकर हथियारबंद गुंडों का मन पिघल जाता है। वे न्यायालय की ज़्यादतियों से टूट जाते हैं और जिलाधीश का दफ्तर फूँक देते हैं। वे बेबस होकर बसें जलाने पर मजबूर हो जाते हैं। न्यायालय से न्याय न मिलने की पीड़ा से त्रस्त होकर वे बेचारे, आम लोगों से मारपीट करते हैं।
वे ब्राह्मणों के आराध्य को चप्पल से पीटते हैं। वे हिन्दू-देवी देवताओं को अपमानित करते हैं। इससे क्रुद्ध होकर हिंदुओं का खून खौल जाता है। उनके भीतर परशुराम उतर आते हैं। वे भीमराव अंबेडकर और कांशीराम की मूर्तियों पर कीचड़ उछालते हैं।
उधर पटेल, जाट, गुर्जर समुदाय इन सब घटनाक्रमों का महीन अध्ययन करते हुए अपने लिए आरक्षण की रणनीति बनाते हैं। माननीय न्यायालय सरकार की ओर देखता है और सरकारें वोटबैंक की ओर। आंदोलन के बैनरतले होनेवाले फसादात का धुआँ आकाश में छाने लगता है और विश्व में भारत की छवि सुधरने का परचम धूसर हो जाता है।
हाँ, इस सबके बीच स्कूल गए बच्चों की, दफ़्तर के लिए निकले बेटे की, टूर पर गए पति की और गश्त पर गए पिता की चिंता में कुछ आँखें राह देखती रह जाती हैं। इस सबके बीच कोई नन्हा फरिश्ता दुनिया में आने से पहले ही आँखे मूंद जाता है। इस सबके बीच किसी चायवाले के घर चूल्हा नहीं जल पाता। इस सबके बीच किसी गोलगप्पेवाले का ठेला उदास खड़ा रह जाता है। इस सबके बीच कोई दर्द दवा तक नहीं पहुँच पाता है। इस सबके बीच कुछ मेहनतकशों की मजूरी नहीं हो पाती। इस सबके बीच कुछ अहम ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं।

✍️ चिराग़ जैन

श्वास से ज़्यादा ज़रूरी है विश्वास

सावधान रहकर रेंगा जा सकता है, चला जा सकता है किन्तु दौड़ा नहीं जा सकता। दौड़ने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस राह पर दौड़ रहे हो, उस पर विश्वास; जिन पैरों से दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास; जिन राहगीरों के साथ दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास। जिस वृक्ष के नीचे से गुज़रोगे, उस पर विश्वास करना होगा कि वह आपके ऊपर गिर नहीं पड़ेगा। आसमान पर विश्वास करना पड़ेगा कि वह टूट नहीं जाएगा। दाहिने पैर को विश्वास करना होगा कि जब तक वह हवा में रहेगा, तब तक बाँया पाँव उसके हिस्से का भी संतुलन बनाए रखेगा। बाँए पैर को आश्वस्त होना होगा कि जब वह अपने हिस्से की दौड़ लगाएगा तो दाहिना पैर देह के बोझ को ज़िम्मेदारी से संभाले रखेगा। इनमें से किसी भी विश्वास का स्थान संदेह ने ले लिया तो वह संदेह आपके पैरों को जकड़ लेगा।
जड़ के विश्वास पर ही देवदार के तना भौतिकी के समस्त नियमों के विपरीत, सैंकड़ों फीट तक उठता चला जाता है। यदि उस तने को जड़ पर विश्वास न हो और वह बार-बार मुड़कर जड़ की मजबूती जाँचने लगे तो वह अष्टवक्र सरीखा झाड़ बनकर रह जाएगा।
सृष्टि विश्वास पर टिकी हुई है। सूर्य पर हमें विश्वास है कि वह शाम को ढल जाएगा। चन्द्रमा पर हमें विश्वास है कि वह नियत क्रम में घटता-बढ़ता रहेगा। यहाँ तक कि मृत्यु पर भी हमें विश्वास है कि वह एक न एक दिन अवश्य आएगी। बस, हम नहीं करते तो सिर्फ़ इस जीवन पर विश्वास नहीं करते। जिस जीवन का प्रारंभ प्रसव जैसी अद्वितीय पीड़ा से होता है उसकी शक्ति पर हमें भरोसा नहीं हो पाता। जिस मस्तिष्क ने बिना किसी प्रशिक्षण के देह के रोम-रोम पर नियंत्रण कर रखा है उसकी क्षमता पर हम संदेह करने लगते हैं।
जिन संबंधों की ऊर्जा शक्ति एक पूरी सृष्टि से लोहा लेने को तैयार रहती है, उन संबंधों पर हमें विश्वास नहीं है। जिस प्रेम के बूते सृष्टि की हज़ार बार सृजित की जा सकती है, उस प्रेम पर हम भरोसा नहीं कर पाते और घृणा को पोसने लगते हैं। लहलहाते हुए खेत का स्वप्न देखनेवाले लोग, बीज की क्षमताओं पर संदेह नहीं करते। जितनी ऊर्जा हम बीज पर संदेह करने में खपाते हैं, उतनी ही ऊर्जा अपने श्रम, अपनी इच्छाशक्ति और भूमि की उर्वरता को पोसने में खपाएँ तो खेत में फसल ज़रूर लहलहाएगी।
जीवन जीने के लिए विश्वास, श्वास से भी अधिक आवश्यक है। विश्वास के अभाव में कोई भी सफ़र गति नहीं पकड़ सकता; न क़ामयाबी का, न भक्ति का, न प्रेम का और न ही रिश्तों का! जो मन में संदेह रखकर इनमें से किसी राह पर चलता है, वह दरअस्ल अपने-आप को छल रहा होता है।

✍️ चिराग़ जैन

पुलिस विभाग

ट्रेन में चलनेवाले मुसाफिरों से पैसे वसूलते पुलिसवालों का वीडियो देखा। मन क्षोभ और घृणा से भर गया। खाकी वर्दी की धौंस और सरकारी तंत्र के निकम्मेपन पर थूक रहा था पूरा वीडियो। सत्तर साल हो गए इस देश को आज़ाद हुए। सवा सौ करोड़ भारतीयों को मूलभूत सुविधाएँ देने में पूरी तरह नाकाम यह सिस्टम शर्म आ जाने की सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका है।
पुलिस विभाग की अभद्रता, ढिठाई और निष्ठुरता ने जनहित के ढोंग की हर लम्हा खिल्ली उड़ाई है। अपराध और शोषण से त्रस्त नागरिक भी इन थानों में घुसने से कतराता क्यों है -इस प्रश्न का उत्तर न तो सरकार के पास है, न ही पुलिस की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे आयोजनों के आयोजकों के पास।
भारत के विकास कार्यों हेतु रात-दिन मेहनत करके टैक्स चुकानेवाला नागरिक भी यदि किसी स्थिति में पुलिस की सहायता लेना चाहे तो उसे दुर्व्यवहार झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है। थाने में सहायता मिले या न मिले, एकाध गाली हर किसी को मिल ही जाती है। जनता के टैक्स के पैसों पर पलनेवाला ये विभाग, जनता की जेब से रिश्वत लूटनेवाला ये विभाग, जब किसी सभ्य नागरिक को गरियाता है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई खाना खाने के बाद पत्तल में छेद कर रहा हो।
रिश्वत लेकर कार्रवाई करना और गाली-गलौज करना इस विभाग के कुछ नुमाइंदों को इतना भा गया है कि जो कुछ लोग ईमानदार होकर किसी पीड़ित की वास्तविक मदद करना भी चाहते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय हो जाना पड़ता है या फिर इनके रंग में रंग जाना पड़ता है। शहरों की पढ़ी-लिखी जनता भी इस महकमे की कारगुज़ारियों से बच नहीं पाती, फिर गाँव-कस्बों के सीधे-सादे लोगों का तो कहना ही क्या!
इस देश की पुलिस को रामायण के बाली की तरह यह वरदान प्राप्त है कि जो भी नागरिक बिना किसी एप्रोच के किसी पुलिसवाले के सामने खड़ा हो जाएगा, उसका इज़्ज़तदार होने का भरम समाप्त हो जाएगा और चंद मिनिटों में वह स्वयं को अपराधी मानने लगेगा।
देश के हुक्मरानो! खरबों रुपये के घोटाले आपको मुबारक़, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आपको मुबारक़, देश के चुनावों की राजनीति भी आपको मुबारक़, राहुल-मोदी की महाभारत भी आप जानो; इस देश के आम नागरिक को अपनी समस्या बताकर बिना प्रताड़ित हुए थाने से घर लौट सकने की स्थितियाँ इस देश को सौंप दीजिये ताकि आप जब देश की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरने का ढोल पीटें तो कोई वायरल वीडियो आपके रंग में भंग न डाल सके।

✍️ चिराग़ जैन

ठगों का बाज़ार

भारत में सरकारें जनकल्याणकारी नीतियों पर काम करती है। माननीय न्यायालय जनता के प्रति न्याय हेतु उत्तरदायी है। कार्यपालिका जनता की रक्षा हेतु चौबीस घंटे तैनात रहती है। …ये सब बातें जब सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तिका में पढ़ते थे तब इस देश को लेकर जैसी छवि बनती थी वह किसी गोलोकधाम से कम नहीं थी। किन्तु जैसे ही हमने अख़बार पढ़ना सीखा तब ज्ञात हुआ कि पाठ्य पुस्तिका की इबारतें असल ज़िंदगी में झूठ साबित होती हैं।
लोकतंत्र के जिन स्तम्भों के प्रति श्रद्धा और आदर उमड़ा था, बाहर आकर देखा तो वे एक-दूसरे के साथ घटिया हरक़तें करते नज़र आए। पाठशाला के स्वप्न से बाहर निकले तो महसूस हुआ कि जनकल्याण एक कवच का नाम है जिसके पीछे खड़े होकर जनता पर क्रूर वार किए जाते हैं। सरकार नीतियाँ बनाते समय सिर्फ इतना ध्यान रखती है कि उसकी सत्ता को बचाने के लिए किस-किस ‘जन’ की ज़रूरत पड़ सकती है। और उसका कितना कल्याण करने से अपनी कमीशनिंग ठीक-ठाक चलती रह सकती है।
जब दिल्ली के बिल्डर करोल बाग़, पहाडग़ंज की आवासीय संपत्तियों को फ्रीहोल्ड करा के उन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बना रहे थे, तब उस क्षेत्र का थाना शायद तीर्थाटन पर गया था। उस क्षेत्र के नगर निगम अधिकारी भी देश सेवा में व्यस्त थे। जब उन कॉम्प्लेक्सों की बिक्री हुई तब रजिस्ट्रार का पूरा कार्यालय भी देश निर्माण में तल्लीन था। जब उस इकाई पर बिजली-पानी के वाणिज्यिक कनेक्शन लगाए गए, तब इन दोनों विभागों को भी ध्यान नहीं आया कि यह आवासीय परिसर है। कई दशकों से सरकार इन व्यापारियों से कमर्शियल टैक्स लेती रही।
बिजली विभाग, जल विभाग, नगर निगम सब व्यावसायिक पैसा वसूलते रहे। अब अचानक माननीय न्यायालय को ज्ञात हुआ कि यह तो आवासीय परिसर है। टैक्स चूसनेवाले विभाग सारा ठीकरा व्यापारी के सिर पर फोड़कर ईमानदारी और सिस्टम की ढाल के पीछे छुप गए। नगर निगम और पुलिस विभाग, माननीय न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए सीलिंग करने पहुँच गए। व्यापारी ठगा-ठगा सा खड़ा रह गया। दिल्ली सरकार ने कहा कि सीलिंग केंद्र सरकार करवा रही है। केंद्र सरकार ने कहा कि यह न्यायालय का आदेश है और न्यायालय के आदेश को हम कैसे टाल सकते हैं।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए फैसला दिया कि इनमें कुछ नरमी बरती जाए। फैसला सुनते ही केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के खि़लाफ़ खड़ी हो गई। जनकल्याण के कवच में घुसकर केंद्र सरकार ने जो बयान दिए, उनका वास्तविक भावार्थ ये है- ‘तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या? इलेक्शन सिर पर खड़ा है। राजस्थान की मीणा कम्युनिटी, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ट्राइब्स… सबकी वोट कट जाएगी। सरकार औंधे मुँह गिर जाएगी। उधर पासवान जान खा लेगा। मायावती पहले ही भाजपा के लिए आफत है उसे सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट में बैठकर कुछ भी फैसला देने से पहले वोटिंग के गणित क्यों भूल जाते हो। व्यापारियों को वोट डालने की आदत नहीं है उन्हें नोच लो, हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन झुग्गी-झोंपड़ी, एससी-एसटी तो हमारे वोटिंग के गढ़ हैं भाई, यहाँ हाथ डालने से पहले सौ बार सोचा करो। समझे! अब हम रिव्यू पिटीशन ला रहे हैं, चुपचाप इस फैसले को वापस लेकर पुनर्विचार के अंधे कुएं में फेंक देना।’
…कई बार ऐसा महसूस होता है कि हम ठगों के बाज़ार से गुज़र रहे हैं। जो कम ठगा गया वो ख़ुश होता है। जो ज़्यादा ठगा गया वो अराजक होता है। जिसके कपड़े उतार लिए गए वो आत्मघातक होता है। और जो ठगता है वो गाता फिरता है- ‘सारे जहाँ से अच्छा…..!’

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया में कवि सम्मेलन

हिंदी कवि-सम्मेलन भारतीय समाज में एक परंपरागत संचार माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित है। आधुनिक और अत्याधुनिक माध्यमों के प्रचलन से पूर्व ही कवि-सम्मेलनों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैंठ बना ली थी। समय के साथ काव्यमंचों पर रासानुपत में परिवर्तन अवश्य हुए किन्तु ये सब परिवर्तन कवि-सम्मेलन के मूल स्वरूप के इर्द-गिर्द ही बने रहे।
प्रारम्भ में साहित्य और पत्रकारिता के हस्ताक्षर अलग-अलग नहीं थे किंतु समय के साथ ये दोनों ही क्षेत्र अलग चिह्नित किये जाने लगे। हिंदी की पत्रकारिता का तो उद्भव ही साहित्य के साधकों ने किया। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, धर्मवीर भारती और अन्य तमाम ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने भारत में पत्रकारिता की आधारशिला रखी। यह वह समय था जब साहित्य और पत्रकारिता को अलग करना असंभव जान पड़ता था।
बाद में “साहित्यिक पत्रकारिता” पत्रकारिता के बड़े क्षितिज का छोटा-सा अंश बनकर रह गई। इस कालखंड में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को समाचार-पत्र के संपादन-मंडल में इसलिए स्थान मिलता था क्योंकि पत्र में नियमित प्रकाशित होने वाली कहानियां, कविताएं, संपादकीय, व्यंग्य और भाषा का स्तर पत्र की गरिमा तय करता था। धीरे-धीरे समाचार-पत्रों में साहित्य एक कोना मात्र बनकर रह गया। अधिकतर समाचार-पत्रों में यदा-कदा कोई कविता छापकर साहित्य की हाज़िरी लगा दी जाती थी और कुछ समूहों ने तो यह हाज़िरी भी बंद कर दी।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब साहित्य, कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास की कड़ियाँ समाचार-पत्रों में बाक़ायदा “बैन” हो गईं। कुछ संपादकीय मंडलों ने तो साहित्यिक गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों आदि की ख़बर तक प्रकाशित करने से परहेज किया। अंततः इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक की शुरुआत होते-होते देश के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्रों से साहित्य-बीट ही समाप्त हो गई।
मीडिया की अनदेखी के इस दौर में दूरदर्शन एकमात्र ऐसा माध्यम बचा था जिससे प्रसारित होनेवाली काव्य-गोष्ठियों में साहित्य जीवित था। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर प्रसारित होनेवाले रंगारंग कार्यक्रमों में हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा और शैल चतुर्वेदी जैसे चेहरे अक्सर दिखाई देते थे। अशोक चक्रधर और गोविंद व्यास ने दूरदर्शन की इन काव्य-गोष्ठियों में विविध प्रयोग किये। हर दूसरे मंगलवार को प्रसारित होने वाले ‘कहकहे’ कार्यक्रम में अशोक चक्रधर, सुरेश नीरव और सरोजिनी प्रीतम ने हास्य-कविता का नया अध्याय प्रारम्भ किया। अनेक कवियों की वर्तमान लोकप्रियता की नाल दूरदर्शन की इन्हीं गोष्ठियों में गड़ी हुई है। युवा काव्य-गोष्ठी, फुलझड़ी एक्सप्रेस और अन्य काव्य आधारित कार्यक्रम टेलीविज़न पर कवियों की हाज़िरी लगवाते रहे। दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम पर यह उपस्थिति साहित्यिक अनुष्ठानों के मनोबल की दृष्टि से “डूबते को तिनके का सहारा” सिद्ध हुई।
बाद में सेटेलाइट टेलीविज़न की अतिवृष्टि में जैसे-जैसे दूरदर्शन के रंग फीके पड़े, वैसे-वैसे ही काव्य गोष्ठियों और अन्य साहित्यिक अनुष्ठानों के प्रचार-प्रसार का कारवां भी थम गया। शुद्ध व्यावसायिकता और ग्लैमर की तेज़ रौशनी में मसनद पर विराजित बिना संगीत-साज के कवि-सम्मेलन को मिसफिट करार दे दिया गया। देश भर में कवि-सम्मेलन होते रहे किन्तु मीडिया की फोकस लाईट का छोटा-सा घेरा कवि-सम्मेलन तक पहुँचने से कतराता रहा। NDTV ने कुमार संजोय सिंह के संचालन में “अर्ज़ किया है” शीर्षक से एक कवि-सम्मेलन की सर्जना की भी थी किन्तु इस प्रयास की यात्रा बहुत लम्बी न हो सकी। इसके तुरंत बाद डॉ अशोक चक्रधर ने SAB TV पर “वाह-वाह” प्रारम्भ किया। कवि सम्मेलन की परंपरागत छवि की तर्ज़ पर तैयार यह कवि-सम्मेलन एक नए भवन की नींव मजबूत कर गया।
इसी समय में STAR ONE पर द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज नामक एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसने TRP के सभी रेकॉर्ड तोड़ डाले। इस कार्यक्रम में लतीफों और भाव-भंगिमा से लोगों को हँसाने की एक अपेक्षाकृत नवीन विधा की प्रतियोगिता का संयोजन था। इस कार्यक्रम को जब मीडिया के पुराने लोगों ने देखा तो वह साथी याद आया जिसे वे मसनद पर बैठा छोड़ आए थे।
“आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड” में यक़ीन करनेवाले मीडिया ने कवि-सम्मेलन को लुप्त मान लिया था। इसलिए जब पीछे जाकर उसने कवि-सम्मेलन के सिर पर लगी फोकस-लाइट का स्विच ऑन किया तो वहाँ सब कुछ बदल चुका था। मसनद के गोल तकियों ने सोफे का रूप ले लिया था। कवियों का कुर्ता-पायजामा सूट-बूट में तब्दील हो चुका था। टैंट हाउस के माइक सिस्टम अब ग्लैमरस माइक्रोफोन और लेपल के आकार में ढल गए थे, दरी पर बैठे श्रोताओं की दरियां] कुर्सियां बन चुकी थीं और लोकल टैंटहाउस की व्यवस्थाएं भव्य ऑडिटोरियम में सुव्यवस्थित हो चली थीं।
इस दौर तक SAB TV पर अशोक चक्रधर द्वारा संचालित “वाह-वाह” का दर्शक वर्ग TRP के आंकड़ों में अपनी सम्मानजनक पहचान बना चुका था। उधर “जनमत” टीवी के माध्यम से दीपक गुप्ता और नीरज पुरी; टीवी इंडिया और दबंग टीवी से शैलेश लोढ़ा; तथा अन्यान्य चैनल्स से अरुण जैमिनी भी सेतुनिर्माण में गिलहरी के योगदान की कथा लिख रहे थे। विवेक गौतम के संचालन में “जैन टीवी” पर चल रहा “इंडिया कॉलिंग” लम्बा चला किंतु अपनी पहचान क़ायम करने में विफल रहा। साधना टीवी पर प्रवीण आर्य के संयोजन में चल रहे “कवियों की चौपाल” कार्यक्रम का उपक्रम भी बहुत फलदायी सिद्ध न हो सका।
इसी उठापटक के बीच सब टीवी को सोनी एंटरटेनमेंट जैसे बड़े समूह ने ख़रीद लिया और अशोक चक्रधर का “वाह-वाह” सुभाष काबरा के हाथों से होता हुआ शैलेष लोढ़ा के हाथों में आ गया। अनेक प्रयोग करने के बाद शैलेष जी ने इसे “वाह-वाह क्या बात है” शीर्षक से बिल्कुल नए प्रारूप में प्रारम्भ किया। ठीक इसी कालखण्ड में लाफ्टर चैम्पियन की अचानक से उभरी मांग का जादू धीमा पड़ने लगा था। और इसी दौर में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन में डॉ कुमार विश्वास की अग्रणी भूमिका ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर ला खड़ा किया था।
वाह-वाह क्या बात है ने TRP के मोर्चे पर कवि सम्मेलन की महती उपस्थिति दर्ज की और कुमार विश्वास ने कवि सम्मेलनों को उस तबके तक पहुंचा दिया जिसको कविता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था।” वाह-वाह क्या बात है” के संचालक शैलेश लोढ़ा भी लोकप्रिय धारावाहिक “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” के मुख्य पात्र के रूप में लोकप्रियता के प्रतिमान स्थापित कर चुके थे।
ऐसे संयोगों के बल पर SAB TV का “वाह-वाह क्या बात है” कवि सम्मेलनों के खोए हुए ग्लैमर का लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। नए रूप-रंग और ग्लैमर के साथ प्रसारित होता परंपरागत कवि-सम्मेलन कॉर्पोरेट और मल्टी नेशनल्स को भी आकृष्ट करने लगा। उधर कुमार विश्वास की ख्याति भी कवि-सम्मेलनों की सिल्वर स्क्रीन प्रेजेंस के लिए प्रायोजक जुटाने में सहायक सिद्ध हुई।
इधर “वाह-वाह क्या बात है” के सौ से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके थे, उधर धूमिल होते लाफ्टर शो के एक सादा से नुमाइंदे कपिल शर्मा ने एक कॉमेडी शो लांच करके भारतीय टेलीविज़न जगत के TRP अन्वेषकों को चौंका दिया। चूँकि कवि-सम्मेलन और लाफ्टर शो के स्वरूप में बहुत सी समानताएं हैं इसलिए इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के श्रोतावर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा समान ही है।
कपिल शर्मा के शो की टीआरपी के चलते कोई नया कार्यक्रम तो टेलीविज़न पर नहीं शुरू हुआ किन्तु कवि-सम्मेलन के प्रति उदासीन मीडिया का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। टीवी न्यूज़-चैनल्स ने कवि-सम्मेलनों को अनियमित प्रसारण के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। एकाध वर्ष में ही प्रत्येक न्यूज़ चैनल में होली के अवसर पर कवि-सम्मेलन अनिवार्य-सा हो गया। इसी बीच न्यूज़-नेशन ने “चुनावी-चकल्लस” शीर्षक से कवियों का एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक चुनावी घटनाक्रम पर कवियों की चुटकियां कार्यक्रम की सफलता का माध्यम बनी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में यह कार्यक्रम ख़ासा लोकप्रिय हुआ। चुनाव सम्पन्न होने के बाद इसे “चकल्लस” शीर्षक से संजय झाला ने संचालित किया।
उधर कुमार विश्वास ने दो कदम और आगे बढ़कर “महाकवि” शीर्षक से दिवंगत कवियों के जीवनवृत्त की एक श्रृंखला ABP NEWS पर प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार ने कवियों के ग्लैमर को और ऊपर उठाने में सहायता की।
कुछ समय बाद NEWS 18 INDIA ने “लपेटे में नेताजी” शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्टूडियो में कवियों के सामने बैठाया जाता था और कवि अपने चुटीले अंदाज़ में उनसे प्रश्न पूछते थे। इस कार्यक्रम में पहली बार कविता और राजनीति का ON AIR आमना सामना हुआ।
न्यूज़ मीडिया में कवि-सम्मेलन अब पूरी तरह चस्पा हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर कवियों को बुलाकर एक एपिसोड शूट कर लेना प्रोग्रामिंग हेड के लिए आसान भी होता है और इस कार्यक्रम की सफलता की गारंटी भी पूरी होती है। कई लाख रुपये ख़र्च करके प्रोग्रामिंग कोटे का एक बुलेटिन तैयार करने की बजाय मौलिक कंटेंट, सरल समन्वय और अपेक्षाकृत कम व्यय में शानदार कवि-सम्मेलन शूट करने में प्रोडक्शन की अधिक रुचि दिखने लगी है। आज तक, एबीपी, न्यूज़ नेशन, ज़ीन्यूज़, ज़ी बिज़नेस, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ 24 और अन्य सभी न्यूज़ चैनल्स पर समय-समय पर कवि-सम्मेलनों की उपस्थिति यह घोषणा करती है कि साहित्य और मीडिया का जो बिछोह प्रिंट मीडिया के मेले में प्रारम्भ हुआ था वह अब इलैक्ट्रोनिक मीडिया की गलियों में समाप्त हो गया है। मीडिया के पास नए कंटेंट का टोटा था और कवि-सम्मेलनों के पास उचित प्रचार तकनीकों का। दोनों ने आपस में हाथ मिलाकर एक नए युग की शुरुआत की है।

✍️ चिराग़ जैन

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