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कविता के चिन्ह

भारतीय संस्कृति के प्रसार तथा सर्वांगीण विकास में कवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी, संस्कृत, उर्दू, बांग्ला, उड़िया, तमिल, मराठी, भोजपुरी आदि तमाम भाषाओं, बोलियों और शैलियों के कवियों ने अपने-अपने समय के सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक क्षितिज पर हस्ताक्षर किए हैं। यही कारण है कि देश भर में अनेक स्थानों पर कवियों के नाम पर सड़कों, उद्यानों, पुस्तकालयों, शिक्षण संस्थानों आदि का नामकरण किया गया है। कवि विशेष के जन्मस्थान पर उनकी प्रतिमा तथा संग्रहालय बनाने की प्रथा भी विद्यमान है। सिमरिया में राष्ट्रकवि दिनकर के निवास स्थान को संग्रहालय बना दिया गया है और उस संग्रहालय की ओर जाने वाली सड़क पर दिनकर की प्रतिमा भी स्थापित है। इसी प्रकार दरभंगा के निकट नागार्जुन के पैतृक निवास के समीप उनके नाम से पुस्तकालय बनाया गया है। सालासर में बालाजी मंदिर के बाहर मीराबाई की जीवंत प्रतिमा स्थापित है। चित्तौड़गढ़ में मीरा मन्दिर विद्यमान है जहाँ मीराबाई की भव्य प्रतिमा विदेह प्रेम का प्रतीक बनकर विराजित है। होशंगाबाद के पास बाबई नामक स्थान पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की विराट प्रतिमा स्थापित है। भोपाल में पत्रकारिता का एक विश्वविद्यालय “माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय” के नाम से संचालित है। आगरा में एक भव्य प्रेक्षागृह को सूरसदन के नाम से जाना जाता है। कन्याकुमारी में संत कवि तिरुवल्लुवर का भव्य स्मारक विश्व भर में विख्यात है। तिरुवल्लुवर का ही एक भव्य पद्मासन बिम्ब महाबलीपुरम में समुद्र तट पर और चेन्नई के मरीना तट पर भी स्थापित है। अहमदाबाद शहर में गुजराती कवि दलपतराम की भव्य प्रतिमा, उनके नाम से शहर का एक प्रमुख चौराहा तथा एक अस्पताल भी मौजूद है। पुदुच्चेरी में सुब्रमण्य भारती की विशाल प्रतिमा स्थापित है। हैदराबाद में तेलुगु कवि क्षेत्रय्या की शानदार प्रतिमा विद्यमान है। कालिदास के नाम पर उज्जैन में “कालिदास संस्कृत अकादमी” संचालित है। मध्यप्रदेश सरकार महाकवि कालिदास की स्मृति में “कालिदास महोत्सव” का भी आयोजन करती है। अलवर में भृतहरि के नाम पर दस दिन का भव्य मेला आयोजित किया जाता है। भारत के संसद भवन की सौध में भी गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की विशाल प्रतिमा स्थापित है। कोलकाता में अनेक स्थानों पर टैगोर की प्रतिमाएँ मौजूद हैं। बल्लवपुर बीरभूम स्थित अमर कुटीर सोसाइटी में टैगोर का जापानी शैली में बनी आकर्षक प्रतिमा मौजूद है। नई दिल्ली में कोपर्निकस मार्ग स्थित ललित कला अकादमी के मुख्यालय को “रबीन्द्र भवन” के नाम से जाना जाता है। सम्भवतः देश भर में सर्वाधिक मूर्तियां जिस कवि की हैं उनमें बांग्ला भाषा के कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर और तमिल भाषा के कवि तिरुवल्लुवर का नाम अग्रणी है। राउरकेला में वेदव्यास का भव्य मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर महाभारत महाकाव्य की रचना हुई थी। दिल्ली में वज़ीराबाद के पास जमुना के एक बड़े घाट का नाम सूरदास जी के नाम पर “सूरघाट” रखा गया है। दिल्ली जंक्शन से प्रतापगढ़ के मध्य चलने वाली ‘पद्मावत एक्सप्रेस’ का नामकरण मलिक मुहम्मद जायसी की कृति “पद्मावत” के नाम पर किया गया है और यह गाड़ी जायसी के जन्मस्थान “जायस” पर रुकती है। चांदनी चौंक के बल्लीमारान में मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब की हवेली आज भी मौजूद है। लखनऊ जंक्शन के प्लेटफॉर्म नम्बर 5 पर रेल की पटरियों के बीच एक बड़ी सी मज़ार है जिसे लोग पीर बाबा की मज़ार कहते है, यह दरअस्ल मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की मज़ार है। ऐसे ही आगरे के ताजगंज में बस्ती के बीच नज़ीर अकबराबादी की मज़ार है। दिल्ली में बारापुल्लाह फ्लाईओवर से गुजरते हुए एक पुराना खंडहर दिखाई देता है। बहुत कम लोगों को पता है कि यह खंडहर अब्दुर्रहीम खानखाना का मक़बरा है। हाल ही में ओमप्रकाश आदित्य जी के जन्मस्थान पर उनकी प्रतिमा की स्थापना करवाई गई है। मुम्बई में श्याम ज्वालामुखी के नाम पर “श्याम ज्वालामुखी मार्ग” मौजूद है। दिल्ली के हिंदी भवन में पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा गोपाल प्रसाद व्यास जी की प्रतिमाएं मौजूद हैं। ऐसे ही सैंकड़ों स्मारक और भग्नावशेष कविता के साधकों की अनकही कहानियां कहने के लिए देश के हर कोने में ज़िंदा हैं। निश्चित ही आपने भी यात्राओं में इन स्मारकों के दर्शन किये होंगे। आपसे अनुरोध है कि ऐसी जो भी जानकारी आपके पास उपलब्ध है कृपया मुझे उससे अवगत कराएं ताकि इन सब स्मारकों, सड़कों, घाटों, मंदिरों, मज़ारों, हवेलियों, संग्रहालयों, मूर्तियों, पुस्तकालयों तथा शिक्षण संस्थानों आदि का एक दस्तावेज तैयार किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को इन शब्द साधकों से परिचित कराना आसान हो सके।

✍️ चिराग़ जैन

महानगर में गर्मी का एक दिन

गर्मी अपनी पर आई हुई है। तमाम भागदौड़ के बावजूद सड़कों पर एक वीराना पसरा हुआ है। ज्यों-ज्यों सूर्य धरती के निकट आता है त्यों-त्यों धरती का तापमान बढ़ता जाता है। जन्मों का प्यासा सूरज, चलते-फिरते लोगों की दैहिक जलराशि से प्यास बुझाने का उपक्रम कर रहा है। मनुष्य पसीना बहा-बहाकर आसमान को बारिश का स्मरण करा रहे हैं।
जेठ के कुकृत्य से बदहवास सड़कों को अमलतास की ओढ़नी से ढाँपकर मौसम अपना पाप छुपाने के प्रयास कर रहा है। उधर गुलमोहर भी अपने लाड़ले मौसम के ऐब छुपाने के लिए लीपापोती करने में पूरा ज़ोर लगाए हुए है। बालमखीरा के दरख़्तों पर झूमर जैसे फूल लटकाकर ध्यान भटकाया जा रहा है। लेकिन नीम, कच्ची निम्बोलियों जैसा कड़वा सच बोलकर अपने फूल की तरह बरस पड़ता है। आम के बौर में केरियाँ फूटने लगी हैं। मौसम के आवारा थपेड़े और तूफानों के बेग़ैरत झोंके इन मासूम आम्बियों को तब तक छू-छूकर गुज़रते रहते हैं जब तक वे हार कर टूट न जाएँ। इस सारी बेईमानी को देखकर हवाएँ आग-बबूला हो चली हैं। बहते पसीने को शांत करने के लिए जो झोंका गात को स्पर्श करता है वह पसीने के नीचे त्वचा की एक परत झुलसा जाता है। ऊमस ने ऊर्जा का कोष रिक्त कर दिया है।
सड़क किनारे शिकंजी, कुल्फी, पानी, कोल्डड्रिंक, छाछ और चुस्की बेचनेवाले पेट के लिए अपने तन को तपाकर कंचन कर रहे हैं। वातानुकूलित वाहनों और पक्के मकानों के भीतर का तापमान स्वर्ग की अनुभूति करा रहा है इसलिए बाहर का नर्क और गहराता जा रहा है। ग़रीबों के बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए सड़कों पर रोज़गार तलाश रहे हैं और अमीरों के बच्चे मोबाइल के जीपीएस पर वॉटर पार्क तलाश रहे हैं।
शाम ढलते-ढलते मौसम अपनी ज़िद्द छोड़कर कुछ देर को सुहाना होने लगता है, लेकिन जल्द ही वह मूड बदलकर वापस अड़ियल हो जाता है। प्रकृति हीटर चलाकर भूल गई है और हमने अपनी कृत्रिम सुविधाओं के ब्लोवर से इस प्रकोप को कई गुना बढ़ा दिया है। महानगरों के निस्तेज चेहरे और भी क्लान्त हो गए हैं। गाँव की चौपाल से आए झोंके महानगरों के ऊपर से अट्टहास करके गीत गाते हुए बहे जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

तमाशबीनों का लोकतंत्र

कितना शानदार लोकतंत्र है हमारा। पाँच दिन से पूरा देश तमाशबीन बनकर जनमत के मखौल का खेल देख रहा है। कांग्रेस जानती है कि पैसे फेंके जाएंगे तो उसके विधायक बिक जाएंगे, इसलिए उसने जनता के जीते हुए प्रतिनिधियों को बाक़ायदा नज़रबंद कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि बहुमत साबित करने के लिए विधायक तोड़ने होंगे। वह यह भी जानती है कि बहुमत साबित हुआ, तो उसकी धूर्तता सबके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगी। राज्यपाल जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए हर हद्द तक का भ्रष्टाचार होगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस में से कोई भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
कार्यपालिका जानती है कि निजी हितों के लिए अनधिकृत रूप से पैसे का नक़द लेन-देन अपराध है। कार्यपालिका यह भी जानती है कि नोटबन्दी के बाद से इतनी बड़ी नक़दी अपने पास रखना अपराध है। मीडिया जानती है कि शतरंज की बिसात पर पैसे फेंककर काले घोड़ों को सफेद करने की जुगत चल रही है। सोशल मीडिया धड़ल्ले से इस ख़रीद-फ़रोख़्त पर चुटीले, तीखे, कड़वे और चटखारे भरे संदेश वायरल कर रहा है।
भाजपा के प्रवक्ता से पूछो कि यह क्या हो रहा है तो वह चुपके से अपनी पार्टी के इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करते हुए दलील देते हैं कि हरियाणा में इंदिरा गांधी ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए यही किया था, तब हम इसे अपराध मानते थे लेकिन अब हमारी बज्जी है, इसलिए अब हम इसे अपराध नहीं मानते।
कांग्रेस के प्रवक्ता से पूछो कि गोवा में आप सबसे बड़ी पार्टी की दुहाई देकर सरकार बनाने का दावा कर रहे थे तो फिर अब आप आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों चले गए। कांग्रेसी प्रवक्ता इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहता है कि गोवा में हमने वह बात कही, जिससे हमें लाभ हो रहा था और कर्नाटक में भी हम वही बात कह रहे हैं जिससे हमें लाभ मिले अब ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हों तो इसमें हमारी क्या ग़लती है?
सोशल मीडिया पर जो कांग्रेस को आइना दिखाए उसे ‘अंधभक्त’ कहकर ज़लील किया जाएगा। जो भाजपा का सच बोलने की कोशिश करे उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर अपमानित किया जाएगा।
जनता पूछती है कि सबसे ज़्यादा वोट कांग्रेस को पड़े तो सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा की कैसे आ गईं। उत्तर मिलता है कि सीटों का बँटवारा इस तरह से किया गया है कि चाहे एक वोट का अंतर हो, लेकिन सीट जीतने का जुगाड़ हो जाएगा।
जनता पुनः पूछती है कि फिर सबसे ज़्यादा सीट वाली पार्टी के सामने कम सीटों वाले दो मिलकर कैसे सरकार बना सकते हैं। उत्तर मिलता है कि दोनों पार्टियों ने तय कर लिया है कि मिल-बाँटकर मलाई खा ली जाएगी इसलिए रैलियों की गाली-गलौज को भूलकर गले लग जाओ।
जनता पुनः पूछती है कि हमने तो रैलियों की बातें सुनकर ही आपको वोट दिया था। उत्तर मिलता है कि हमने भी वोट लेने के लिए ही रैलियाँ की थीं। हमारा उद्देश्य जनकल्याण नहीं था, चुनाव जीतना था। पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है साहब। रात-दिन एक करने पड़ते हैं। इलेक्शन मैनेजमेंट कोई हँसी-खेल नहीं है। इतनी मेहनत से मिले वोटों को विपक्ष में बैठकर बर्बाद तो नहीं कर सकते ना। जहाँ इतना पैसा लगा, वहाँ थोड़ा और सही। एक बार कुर्सी मिल गई तो छह महीने में सारा ख़र्चा निकल आएगा।
जनता भौंचक्की होकर पूछती है कि चुनाव आयोग तो बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए सीमित धन व्यय करना होता है। उत्तर मिलता है, छोड़ो यार, किस युग में जी रहे हो। उतने पैसे में कोई पार्षद का चुनाव भी न जीत पाएगा। ये सब औपचारिकता के लिए लिखा जाता है। सबको पता है कि इलेक्शन कितने करोड़ों का खेल है।
जनता की आँखे फट जाती हैं। वह प्रश्नवाचक दृष्टि से चुनाव आयोग की ओर देखती है। चुनाव आयोग जनता से मुँह फेरकर खड़ा हो जाता है। जनता आशा से भरकर कार्यपालिका की ओर देखती है तो पुलिसवाला उसे डाँटकर बोलता है- ‘अबे तैने वोट दे दिया ना, अब अपना हिल्ला कर, ये बड़े लोगों के काम हैं इन पचड़ों में क्यों पड़ता है?’ जनता हिम्मत करके न्यायपालिका की ओर देखती है तो न्यायपालिका अपने काले कोट में से पट्टी फाड़कर कस के अपनी आँखों पर बांध लेती है।
जनता हारकर मीडिया के पास पहुँची, तब तक ख़बर आ गई थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक रिसोर्ट से ग़ायब हो गए। पूरे चैनल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कोई कांग्रेस के प्रवक्ता को लाइन अप कर रहा है। कोई बीजेपी के प्रवक्ता का फोनो कर रहा है। कोई ग्राफिक बना रहा है। जनता ठिठककर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाती है। स्टूडियो में आवाज़ गूंजती है – ‘कट, कट, कट, अरे यार ये फ्लोर पर कौन बैठा है इसे बाहर करो। …स्पॉट दादा देखो ज़रा!’
…बिजली की गति से दो स्पॉट बॉय आते हैं और जनता को उठाकर स्टूडियो से बाहर फेंक देते हैं।
जनता अपने हाथ में टिफिन पकड़े अपने दफ़्तर की ओर चल देती है। हाज़िरी रजिस्टर पर आधे दिन की तनख़्वाह कटवाती है और शाम को छुट्टी होने का इंतज़ार करने लगती है।

✍️ चिराग़ जैन

ईद के अवसर पर कश्मीर में सेना पर प्रतिबंध

सुना है एक मदमस्त हाथी ने
बिल्ली के कहने पर
शेरों के हाथ बांध दिए
ताकि भेड़िये मेमनों की दावत उड़ा कर
ईद मना सकें।

शेरों को आदेश है
कि लकड़बग्घे उन्हें अपमानित करें तो हो लें
क्योंकि बेचारे लकड़बग्घों का रमज़ान है
उनसे अपमानित हो लोगे तो बेचारे ख़ुश हो जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

तंत्रजन्य विद्रूपताओं का सम्यक चिंतन

जीवन की अथक जिजीविषा यदि हताशा के चरम पर पहुँची है तो परिस्थितियों ने विवशता का कितना भयावह चेहरा प्रस्तुत किया होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। हिमांशु रॉय जैसे बेटे को खोकर भी यदि इस राष्ट्र ने तंत्रजन्य विद्रूपताओं का सम्यक चिंतन नहीं किया तो स्थितियों का यह चेहरा इतना वीभत्स हो जाएगा कि उसके महामिलन से उत्पन्न संतति युग को महाविनाश के कुरुक्षेत्र की ओर ले जाएगी। हिमांशु रॉय की प्रेरणादायक जवानी जिस एक क्षण में आत्मघात की देहरी पर बलिदान हो गई उस एक क्षण से अपनी पीढ़ियों को बचाने के लिए अनर्गल मुद्दों में नष्ट होने वाले समय को मनुष्यता के वास्तविक विकास में समर्पित करना होगा। आह! संवेदनाएँ सिहर उठती हैं, क्या अनुभूति रही होगी उस क्षण जब कोई जुझारू जीवन अपने मुँह में पिस्तौल रख पाया होगा। कितनी मेहनत लगी होगी उन उंगलियों को ट्रिगर दबाने के लिए। उफ्फ! आत्मा काँप जाती है। हे ईश्वर, इस देश की जवानी को तंत्र की विफलताओं से बचाना। नमो नारायण!

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Himanshu Roy Suicide

तूफ़ान, सरकार और मीडिया

मौसम विभाग की भविष्यवाणी कमज़ोर साबित हुई। तूफान की गति और प्रचंडता बताने में मौसम विभाग निष्फल सिद्ध हुआ। ज्ञात हो कि मौसम विभाग के बताए गए समय से दो दिन पूर्व ही देश भर के मीडिया में तूफान कहर बरपाने लगा था।
टेलीविज़न चैनलों के संवाददाताओं और प्रस्तोताओं के चेहरे की बदहवासी से स्पष्ट हो रहा था कि तूफान भयंकर है और संवाददाता के ठीक पीछे दुबका हुआ है। चैनल के ग्राफिक आर्टिस्ट्स के दिलो-दिमाग़ में तूफान ने हंगामा मचाया कि उड़ती हुई धूल को गूगल से डाउनलोड करके भारतीय टच कैसे दिया जाए।
सोशल मीडिया पर भी तूफान की गति भयंकर थी। व्हाट्सएप्प पर ताज़ा अपडेट के टेक्सट तथा वीडियोज़ के ऊँचे बवंडर आवश्यक संदेशों को उड़ा ले गए। फेसबुक पर तूफानी चुटकुलों ने देश के अन्य मुद्दों के हज़ारों पेड़ गिरा दिए।
महानगरों में किसी के टकराने से भी यदि किसी पेड़ में कुछ स्पंदन हुआ तो उसे रिकॉर्ड करके उतावलों ने तूफान सिद्ध कर दिया। कहीं-कहीं तो पेड़ के न हिलने की स्थिति में कैमरे को हिला-हिलाकर शूटिंग करके भी तूफान के वीडियो वायरल किये गए। रेडियो प्रस्तोताओं ने भी अपने श्रोताओं को फोन कर करके उनके घर के पर्दों का हिल्लन जँचवाया।
इस भयंकर अप्रकृतिक आपदा में कई सौ मीटर फुटेज बर्बाद हो गई। अड़तालीस से ज़्यादा घण्टों के मारे जाने की सरकार ने पुष्टि की है। सरकार ने चेतावनी जारी करते हुए सभी नागरिकों को किसी भी वास्तविक मुद्दे के सिर उठाने की स्थिति में ऐसे तूफान के प्रति सतर्क रहने को कहा है।

✍️ चिराग़ जैन

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