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नया धर्म : सेंड टू ऑल

आज मुझे एहसास हुआ कि हमारे देश में कोई आम आदमी है ही नहीं। हर नागरिक के दुनिया के बड़े से बड़े आदमी से डायरेक्ट कॉन्टेक्ट हैं। और सबको ही कोई कल्पवृक्ष टाइप की सिद्धि प्राप्त है। यही कारण है कि जब उन्हें पैनडेमिक से संबंधित कोई पुख्ता जानकारी चाहिए होती है तो उनके व्हाट्सएप पर सीधे डब्ल्यूएचओ से मेसेज प्रकट हो जाता है। वे उस मेसेज को पढ़ते हैं और तुरंत अपने मोबाइल से जुड़े एक-एक जनसामान्य को फॉरवर्ड करके उन्हें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाल लेते हैं।
कुछ तो इतने परोपकारी होते हैं कि स्वयं पूरा मेसेज पढ़ने में समय नष्ट करने की बजाय, सीधे औरों तक भेजकर परोपकार में जुट जाते हैं।
कई बार ऐसा लगता है कि अमरीका, जर्मनी, कनाडा, चीन और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ-साथ यूएनओ और नासा जैसी संस्थाएं रोज़ सुबह अपनी दुकान का शटर उठाते ही भगवान के आगे अगरबत्ती जलाने से पहले यह चैक करती होंगी कि आज उनके आका को कौन-सी इन्फॉर्मेशन चाहिए। और फिर जो बिडेन से लेकर बोज़कर तक अपनी लुंगी फोल्ड करके इन्फॉर्मेशन के पुलाव बनाने पर जुट जाते हैं और एक-एक कर सारी इन्फॉर्मेशन इस देश के व्हाट्सएप यूज़र्स के पास पहुँचा देते हैं।
‘भारत सरकार में अंदरख़ाने क्या चल रहा है’ से लेकर ‘शनि के पास से गुज़रते हुए जुपिटर क्या कहेगा’; तक की हर छोटी-बड़ी सूचना इनके पास उपलब्ध होती है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों में भारत को लेकर क्या रणनीति बनाई जा रही है, पाकिस्तान और चीन गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर भारत के खि़लाफ़ क्या खुसर-फुसर कर रहे हैं; यह चौबीस घण्टे इनके ट्रांसमीटर पर रेकॉर्ड होता रहता है। कई बार तो शक होता है कि पाकिस्तान और चीन नेकर पहनकर दो उंगली आगे करके पहले इनसे परमिशन मांगने तो नहीं आते कि- ‘मैडम जी, क्या हम भारत के खि़लाफ़ कानाफूसी कर सकते हैं?’
पूरी दुनिया के देशों की विदेश नीति इनके लिए बच्चों के घर-घर खेलने से ज़्यादा कुछ नहीं है। अमरीका ने पाकिस्तान को कह दिया है कि तू चीन से कुट्टा हो जा तो मैं तुझे इंग्लैंड से अब्बा करवा दूंगा। समझ ही नहीं आता कि ये देश हैं या नोबिता और शिनचैन!
भारत सरकार का सूचना प्रसारण मंत्रालय, बीबीसी, एएनआई और इतने सारे मीडिया संस्थानों की टुच्ची इन्फॉर्मेशन इन लोगों की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। आत्मनिर्भरता इनके ख़ून में शामिल है इसलिए अमरीका, जापान, चीन, नासा जैसे इनके योग्य मजदूर इन्हें कोई सूचना उपलब्ध नहीं करा पाते तो ये पुरातन भारतीय पद्धति का प्रयोग करते हुए गहरे ध्यान में उतरकर स्वयं सूचनाएं निर्मित कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में प्राप्त हुई सूचनाओं में पूरा ब्रह्मांड और स्वयं ईश्वर भी इनकी दृष्टि से अछूता नहीं रहता।
माता वैष्णोदेवी के दरबार से चला मेसेज फॉरवर्ड करने पर कितने लोगों की लॉटरी खुल गयी इसका पूरा हिसाब इनके लेजर में उपलब्ध होता है। यह और बात है कि भारत में लॉटरी बैन है।
ऐसे ही गहरे ध्यान में उतरकर प्राप्त हुई सूचना के दम पर उत्तर प्रदेश में एक बाबा ने भारत सरकार के पुरातत्व विभाग समेत पूरे देश को सोने का भण्डार खोजने के काम में लगा दिया था। और अंत में सोना न मिलने पर वे बाबा, पुरातत्व विभाग और हम सब बेशर्मी के साथ अन्य फर्स्ट हैंड इंफोर्मेशन्स फारवर्ड करने में जुट गए, क्योंकि ज़मीर, आत्मा और शर्म जैसे शब्द इन सूचनाओं के वेग में कहीं ग़ुम हो चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

भगवान के यहाँ मिलावटखोरी

ईश्वर का सिस्टम पूरी तरह त्रुटिरहित होता तो मनुष्यों की देह में वीभत्स पशुओं का जन्म सम्भव नहीं था। किसी के मर जाने पर उसके परिजन जो रुदन करते हैं, उसे देखकर भी जिसकी आत्मा न काँपती हो वह कम से कम मनुष्य तो नहीं हो सकता।
एक अदद इन्सान को साँसों के लिए तड़पते देखकर भी जो ऑक्सीजन, दवाई और अस्पताल में जगह दिलवाने के बदले पैसा कमाने की सोच रहा हो उसकी देह में मनुष्यता रखना तो ईश्वर भूल ही गया होगा।
रोते बच्चे, बिलखती औरतें और तड़पते मरीज़ जिसके भीतर करुणा न उपजा सकें, उनके आँसुओं और पीड़ा में भी जो लाभ-हानि का गणित जोड़ने की गुंजाइश निकाल ले वह तो सड़ांध मारते शव पर लिजलिजाते कीड़ों से भी ज़्यादा घिनौना है।
ये सब प्राणी, जिन्हें कम से कम मैं मनुष्य तो नहीं कह सकता; ईश्वर ने मनुष्यों के वेश में धरती पर छोड़े हैं इसका साफ मतलब है कि ईश्वर की फैक्ट्री में भी मिलावटखोरी का धंधा जारी है।
तवायफ़ भी किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है। लेकिन ये मिलावटी जीव किसी भी अवसर को भुनाने से नहीं चूकते। अस्पतालों के डॉक्टर से लेकर फुटपाथ पर पड़े नशेड़ी तक और राजनीति के गलियारों से लेकर दफ़्तर के बाबू तक; यह मिलावटी जीव हर जगह मौजूद है।
इसको बनाते समय ईश्वर के कर्मचारियों ने कोमल तंतुओं से बना हृदय बेच खाया होगा और इसके सीने में पत्थर का टुकड़ा रखकर ऑर्डर पूरा कर दिया होगा। इसके भीतर आत्मा, ज़मीर तथा दिल ही बदले गए हैं। इसलिए इसका शेष आचरण देखने में मनुष्यों जैसा ही रहता है।
यह अन्य मनुष्यों की भाँति बीमार भी पड़ता है। लेकिन बीमारी को भी अवसर मानकर यह मदद करने वाले को ही नोच खाने की जुगत में लग जाता है।
यह उसी प्रजाति का जीव है जो ‘हार की जीत’ कहानी में लाचार भिखारी बनकर बाबा भारती से उनका घोड़ा छीन लेता है। बस अंतर इतना है कि उस कहानी में बाबा भारती के वचन सुनकर खड़गसिंह का ज़मीर जाग जाता है, लेकिन इस प्राणी के जिस्म में ज़मीर सोया नहीं बल्कि मर चुका है।
इस प्राणी के कारण वास्तविक मनुष्यों को भी अपमान और अभाव सहना पड़ता है। इस प्राणी की पहचान आसान नहीं है, क्योंकि यह मेन्युफेक्चरिंग फ्रॉड है। धरती की कंपनियां तो अपनी साख बचाने के लिए कई बार अपने ख़राब प्रोडक्ट को कॉल बैक कर लेती है, लेकिन ईश्वर के यहाँ शायद क्वालिटी मेंटेनेंस विभाग में भी रेकॉर्ड्स बदल दिए गए हैं।

✍️ चिराग़ जैन

सामान्यीकरण की बीमारी

जो लोग कोविड की आपदा को अवसर समझकर ऑक्सीजन से लेकर दवाइयों तक की कालाबाज़ारी कर रहे हैं; वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग बिना किसी कारण के ऑक्सीजन और ज़रूरी दवाइयाँ अपने घरों में स्टॉक कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग किसी से दुश्मनी निकालने के लिए उसका फोन नम्बर कोविड हेल्प के पोस्टर पर चिपका कर वायरल कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। और जो लोग तन-मन-धन से जुटकर लोगों की यथासम्भव मदद कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं।
हमारा समाज सामान्यीकरण करने की प्रवृत्ति का शिकार रहा है। दिल्ली में कोई बलात्कार हो गया तो हर दिल्लीवाले को घूर-घूरकर देखने लगे। भाजपा का कोई नेता बेईमान निकल गया तो हर भाजपाई को गरियाने लगे। कांग्रेस का कोई नेता नाकारा निकल गया तो पूरी कांग्रेस का उपहास करने लगे। भगवा वस्त्र पहनकर कोई अपराध करता पकड़ा गया तो पूरे हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। जाली टोपी लगाकर कोई गुनाह करता मिला तो सभी मुसलमानों को गुनहगार मान बैठे। एक महिला दहेज की आँच में जली तो हर दूल्हे को हत्यारा समझ लिया। एक पति का परिवार दहेज कानूनों के कारण बर्बाद हो गया तो हर दुल्हन को षड्यंत्री मान लिया।
यह प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। जिन खेतों में अन्न उपजता है वहाँ धतूरा भी फूट आता है। कैक्टस के झाड़ में भी दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत फूल खिल जाते हैं। किसी के प्रति धारणा पालकर उसके पूरे समुदाय के लिए जजमेंटल हो जाना अविवेक का प्रमाण है।
हमने तो अपने धर्मग्रन्थों में देखा है कि सौ कौरवों में भी एक ‘विकर्ण’ हो सकता है। हमने अपनी कथाओं में पढ़ा है कि बाली के घर भी अंगद जन्म ले सकता है। फिर हम इतनी सरलता से किसी एक के कृत्य को देखकर किसी अन्य का आकलन क्यों करने लगते हैं?
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक की यात्रा तो बड़ी बात है हमने तो एक ही अशोक का चंड रूप भी देखा है और विरक्त रूप भी। हमने एक ही अंगुलिमाल में दो चरित्र देखे हैं। यदि बुद्ध भी अंगुलिमाल के प्रति जजमेंटल हो गए होते तो उसके गले से अंगुलियों की माला उतारकर उसे कांचुकीय पहनाने में कभी सफल न हुए होते।
धारणाएँ बनाकर समाज को देखना बन्द करना होगा। पूरी दुनिया की राजनीति ने ऐसी ही पूर्वग्रह ग्रसित धारणाओं के आधार पर समाज को बाँटा है और पूरी दुनिया के अध्यात्म ने इस बँटवारे को पाटने के लिए मनुष्यता का भराव किया है।
जो बाँट रहा है, वह अपना कोई भी नाम रख ले, लेकिन उसके मूल में सियासत मिलेगी। और जो जोड़ रहा है, वह चाहे अपना कोई भी रूप बना ले, उसके मूल में मनुष्यता मिलेगी।
यह समय व्यक्तियों के प्रति धारणाएँ बनाने का नहीं अपितु मनुष्यता को पोसने का है। विपत्ति का यह कालखण्ड यदि मनुष्य को मनुष्यता का सम्मान करना सिखा गया तो इसके लिए चुकायी गयी क़ीमत की टीस काफ़ी कम हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

मदद के हाथों को घायल मत करो

कोरोना से जूझते लोगों और उनके परिवारों की मदद में जुटे सभी वालंटियर्स का आभार व्यक्त करते हुए एक विनम्र अनुरोध यह है कि हम सब अपनी-अपनी सीमित क्षमताओं में प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में किसी ज़रूरतमंद का संदेश अनदेखा रह जाए तो कृपया उस पर कटाक्ष करने की बजाय, अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास करें।
ये सब लोग जो अपनी सोशल प्रोफ़ाइल, अपना समय और अपने समस्त सम्पर्कों को झोंककर लोगों के लिए सहायता जुटा रहे हैं इन्हें कोई लोभ-लालच नहीं है। ये सब मनुष्यता के नाते मनुष्य के प्रति करुणाभाव लिये दिन-रात जाग रहे हैं। सम्भव है कि इनको हर जगह सफलता न मिले, लेकिन इनकी कोशिश सदैव स्तुत्य रहेगी।
कहीं संपर्क नहीं हो पा रहा तो कहीं कुछ अमानवीय लोगों द्वारा फैलाए हुए श्फेकश् सम्पर्कों के कारण भ्रामक स्थिति बन रही है। इन सब चुनौतियों से जूझते हुए ये सब पावनमना मनुष्य अपने घर-परिवार को ताक पर रखकर जी-जान से इस अभियान में जुटे हुए हैं।
आप इनके सम्बल बनिये। यदि इनकी किसी पोस्ट पर किसी ज़रूरतमंद की कोई गुहार दिखाई दे तो वहीं रिप्लाई में उसे यथासम्भव सहायता पहुँचाने की कोशिश करें। जो जहाँ परेशान है उसे उस जगह का कोई स्थानीय संपर्क सूत्र ही उपलब्ध करा दें। सम्भव है आपका यह कृत्य किसी के लिए जीवनदायी सिद्ध हो।
ये देश आपका भी उतना ही है, जितना इस अभियान में जुटे लोगों का। इसके चरमराते ढांचे को बचाने में हाथ न लगा सकें तो कृपया लात भी न मारें।
अपनी तमाम नकारात्मकता के साथ एक बार सोचें जिनको रात के दो बजे भी सहायता के लिए कोई नम्बर मिल पा रहा हो उसे कैसा लग रहा होगा। एक बार सोचें कि जिसकी टूटती उम्मीद के आखिरी छोर पर सहायता खड़ी मिल रही हो उसे कैसा लग रहा होगा।
हाँ, ये सब आप जितने अनुभवी नहीं हैं कि ग़लती होने के भय से कुछ करें ही नहीं। ये तो बेचारे सारी ग़लतियों का रिस्क लेकर भी आगे बढ़कर सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। सैंकड़ों लोगों तक इन तीन-चार दिनों में सहायता पहुँचाने में सफल भी हुए हैं।
ये नन्हें-नन्हें हाथ तूफान से जूझकर कश्ती खेने चले हैं। इनको आशीष दो!

✍️ चिराग़ जैन

जनता ख़ामोश है।

पूरे देश का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। बेशर्मी से झूठ बोलनेवाले राजनेता, एक साथ मिलकर सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं और देश की जनता ख़ामोश होकर तमाशा देख रही है।
प्रश्न समूची राजनीति की उस ढिठाई का है जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करने में हिचकती नहीं है। प्रश्न जनता की उस मानसिकता का है जो किसी भी राजनैतिक निर्णय की चर्चा शुरू होने से पूर्व किसी दल या विचारधारा का चश्मा पहनना नहीं भूलते।
अरे भाई, सही हर स्थिति में सही होता है और ग़लत हर हाल में ग़लत? इतनी सी बात हम समझना नहीं चाहते। कांग्रेस के शासन में कम किसानों ने आत्महत्या की थी, भाजपा के शासन में ज़्यादा किसान मर रहे हैं। इस बात को कहकर कांग्रेसी भला कैसे इतरा सकते हैं? राजनीति ने जनता को विवेकशून्य बनाया है या फिर विवेकशून्य जनता ने राजनीति को इतना मक्कार और बेशर्म कर दिया है इस पर ढंग से विचार करना ज़रूरी हो गया है।
उन्हें पता है कि चुनाव के समय उनका कोई एक पैंतरा देखते ही तुम उनकी बदतमीज़ियों के पोथे भूल जाओगे। उन्हें पता है कि पैदल चलकर घर जाती जनता को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि बिहार में चुनाव आते ही राजनीति इन सब कीड़े-मकोड़ों को वोट में तब्दील कर लेगी। उन्हें पता है कि न्यायपालिका की पेचीदा भूल-भुलैया में फँसा नागरिक कभी इतनी फ़ुरसत ही न पाएगा कि व्यवस्था के सुधार की मांग कर सके।
उन्हें पता है कि लाखों-करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा करने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इस देश की जनता की इतनी हिम्मत ही नहीं है जो उस पैकेज के अस्तित्व पर प्रश्न पूछ लेवे। और अगर इतने वर्ष की मेहनत के बाद भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस जनता के बीच बचा रह गया है तो उसको धराशायी करने के लिए इसी जनता के बीच अपने-अपने लीडर पर अटूट श्रद्धा रखनेवाले लोगों की कोई कमी थोड़े ही है।
राजनीति बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करेगी और हम दो पाटों में बँट जाएंगे। राजनीति मजदूरों के लिए बसों की लिस्ट लेकर आएगी, उसमें बसों के नाम पर बसें न हों तो भी हम भाजपा-कांग्रेस करने में व्यस्त हो जाएंगे।
हमारे लिए सवाल यह है ही नहीं कि तपती दुपहरी में जानवरों की तरह घिसटने को मजबूर इंसान तक सहायता पहुँची या नहीं पहुँची, हम तो इस तमाशे में व्यस्त हैं कि इसमें कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटाई या बीजेपी ने कांग्रेस को। इससे आगे हमारी संवेदनात्मक सोच का इंजन चल ही नहीं पाता।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन में भी वही लालचमण्डी है जो अन्य किसी प्रदेश में है। लेकिन हम इससे खुश हो जाते हैं कि अमित शाह की चाल फेल हो गयी।
कोई अमित शाह को फेल करके खुश है, कोई राहुल गांधी को, कोई केजरीवाल को तो कोई मोदी या दीदी को। लोकतंत्र के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी पर किसी का ध्यान नहीं है।
राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की जनता रिमोट से चलती है। जब तक राजनीति किसानों को अन्नदाता कहती रहती है तब तक कोई खेतों में पड़ रहे जानलेवा कैमिकल्स पर सवाल नहीं कर सकता। जब राजनीति ने किसानों को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया तो कोई टीवी चैनल उनके विरोध की आवाज़ प्रसारित नहीं कर सका।
रामदेव के आंदोलन पर रात में लाठीचार्ज करवानेवाली कांग्रेस, भाजपा को आन्दोलन से निपटने की नैतिकता सिखाती है और कुल दो लोगों की तानाशाही पर चल रही भाजपा, कांग्रेस को पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित करने का ज्ञान देती है।
कितनी आदर्श स्थिति है, इस देश के महान राजनेता यकायक चुनाव से ठीक पहले अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ‘नये दल’ में चले जाते हैं। जो चुनाव से पहले आत्मा की आवाज़ न सुन पाए वो चुनाव जीतने के बाद उस आवाज़ को सुन लेते हैं। सब कुछ खुल्लमखुल्ला चल रहा है लेकिन अपना-अपना चश्मा पहने जनता इस बात पर ख़ुश है कि अमित शाह ने ममता बनर्जी की पार्टी का दिवाला निकाल दिया।
सब अपनी-अपनी कांग्रेस और अपनी-अपनी भाजपा में इतने लिसड़े हुए हैं कि देश की बर्बादी उन्हें दिखाई ही नहीं देती। जिन्हें यह बर्बादी दिख रही है, जिन्होंने अपने चश्मे हटाकर देश को देखने की कोशिश की है उन्हें उनकी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। उनको गद्दार, राष्ट्रद्रोही, हिन्दू विरोधी और ऐसे ही तमाम अलंकरणों से सँवारने के लिए पूरी टोली सक्रिय है।
लोकतंत्र में सत्ताधारी पक्ष की निरंकुशता पर लगाम लगानेवाला विपक्ष भी इस पूरी स्थिति में बराबर का हिस्सेदार है क्योंकि जिसे इस निरंकुशता के विरुद्ध खुलकर बोलने से डर लगता है समझ लो कि उसने अपने होंठों में अपना ख़ुद का कच्चा चिट्ठा भींच रखा है।
भारत की महानता के ढोल पीटते हुए सदियाँ बीत गईं, लेकिन आज भी दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग तक कोई कस्बा, कोई शहर, कोई गाँव, कोई मुहल्ला ऐसा न मिलेगा जहाँ इस महान देश का कोई नागरिक जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीने को मजबूर होगा।
विचारधाराओं के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करनेवाले इन सियासतदानों से पूछो कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनाकर भी ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अहल्या की भाँति पत्थरों में ही क्यों सुबक रही है? इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद गांधी का ‘रामराज’ कोरी कल्पना ही क्यों बनकर रह गया? न लोहिया का समाजवाद आया, न अंबेडकर का संविधान ही शत प्रतिशत लागू हो सका!
फिर क्यों चल रहा है ये ढोंग? यह प्रश्न न पूछ लिया जावे इसीलिए राजनीति आपको चुटकुलों, जुमलों और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा में उलझाए रखेगी। इस उलझन से आपको स्वयं बाहर आना होगा अन्यथा ये उलझन एक दिन आपकी आगामी पीढ़ियों के लिए फाँसी बन जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

चरित्रहीन अभिनेता

एक प्रश्न देश के लगभग प्रत्येक मस्तिष्क को परेशान किये हुए है कि चुनावी रैलियों में कोरोना क्यों नहीं फैल रहा। और जैसा कि हमारे समाज का चलन हो गया है, इस प्रश्न में भी प्रश्न से पहले मोदी विरोधी या मोदी समर्थक की तलाश की जाने लगी है। जबकि हक़ीक़त यह है कि आमूल-चूल राजनीति इस विषय पर एक साथ है। जनता मरती है तो मरे, हमें रैलियों में भीड़ जुटाकर न्यूट्रल वोट डायवर्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।
लोककल्याणकारी गणराज्य के इस भौंडे नाटक में चरित्रहीन अभिनेता की भूमिका निभानेवाला चुनाव आयोग भी चुनावी रैलियों के लिये बनाए गए कोविड नियमों को बिसराकर देश के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तक के हठयोग का लुत्फ़ उठा रहा है।
न्यायपालिका ने अपने लिए कॉमेडियन की भूमिका चयन की है। वह ऐसे-ऐसे नियम बना रही है कि उनमें लॉजिक तलाशने की गरज से निकलो तो अपने सिर के बाल नोचने से पहले हाथ नहीं रुकेंगे।
बहरहाल, राजनीति और व्यवस्था के इस आचरण ने जनता का केवल एक नुकसान किया है कि जनता कोविड की गम्भीरता को लेकर संशय में आ गयी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यदि कोविड इतना ख़तरनाक है तो राजनेता जैसी डरपोक स्पीशीज़ को इससे डर क्यों नहीं लग रहा।
संशय जायज़ है, किन्तु चुनाव एक ऐसा नशा है जिसमें जनहित तो क्या आत्महित की भी बलि चढ़ाने से राजनेता नहीं चूक सकते। इसलिए राजनीति के आचरण को देखकर कोविड के इस काल में अपने आप को ख़तरे में न डाले।
कोरोना वायरस एक बार शरीर को जकड़ ले तो पोर-पोर दुःखता है। जीवन का संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। घर-परिवार में अजीब सी दहशत व्याप्त हो जाती है। इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता का ध्यान रखिये और अपने आप को कोविड तथा राजनीति दोनों से बचाए रखें।
स्थितियाँ इतनी विकट हैं कि रैलियाँ लिखो तो भी ‘रंगरलियाँ’ टाइप हो रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

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