बहार आई है
पूरे गुलशन की फ़िज़ाओं में ख़ुशी छाई है
हर दिशा नूर न जाने कहां से लाई है
शाख से फूल सजे हैं, कि फूल से शाखें
कुल मिलाकर ये हुआ है कि बहार आई है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
पूरे गुलशन की फ़िज़ाओं में ख़ुशी छाई है
हर दिशा नूर न जाने कहां से लाई है
शाख से फूल सजे हैं, कि फूल से शाखें
कुल मिलाकर ये हुआ है कि बहार आई है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Poetry
ये जो शादी है ना सनम हाय इसमें झंझट बड़ा है
दो रोज़ का है मज़ा फिर सबको रोना पड़ा है
यूं तो मेरा पड़ा नहीं था कभी ग़मों से पाला
शादी की इस दुर्घटना को मैंने कितना टाला
अच्छी पत्नी की चाहत में विश्व भ्रमण कर डाला
आखि़र इक दिन इक कन्या ने पहना दी जयमाला
ऐसा उतरा मेरा ख़ुमार, फिर आज तक ना चढ़ा है
जो होता है चाट पकौड़ी, तले-भुने का आदी
मूंग दाल की खिचड़ी उसको कर जाती है बादी
बीवी की झिकझिक ने मेरी सुख की नींद उड़ा दी
सब हंसते हैं मुझ पर बेटा, और कराले शादी
मेरी खुल न पाती ज़ुबां, यहां उसका ताला जड़ा है
मैं कहता हूं पूरब को चल वो पश्चिम को दौड़े
मैं कमरे का फैन चलाउं तो वो कंबल ओढ़े
ना तो मेरे साथ चले और ना ही मुझको छोड़े
जिसने ये कुण्डली मिलाई उसके निकलें फोड़े
मेरी पत्नी से मेरा छत्तीस का आंकड़ा है
क्वारा हो तो कर सकता है रोज़ नवेली सैटिंग
शीला, मुन्नी सबसे करता रहता घंटों चौटिंग
ईलू-ईलू, इश्क़-मुहब्बत, मूवी-पिकनिक-डेटिंग
शादी होते ही बंदे की गिर जाती है रेटिंग
क्वारे थे तो वृंदावन में नाचे ता-था-थैया
चौन की बंसी, हंसी-ठिठोली, मीठी जमना मैया
गांव की गोरी, माखनचोरी, गोपी, ग्वाले, गैया
शादी होते ही पचड़ों में फँस गए कृष्ण कन्हैया
यहां न जाओ, वहां न जाओ- कोई न इतना टोके
क्वारों के जीवन में चलते मस्त हवा के झोंके
जैसे चाहे सो सकते हैं आड़े-तिरछे होके
एक ज़रा सा सुख मिलता है, इतना सब कुछ खो के
कितना भी समझा ले दुनिया, नहीं समझता कोई
जिसके पैरों पड़ी बिवाई, पीर जानता सोई
बिन बिस्तर की नींद भली या चादर नीर भिगोई
जिल्लत के जीवन से बेहतर सूनी पड़ी रसोई
इस देश का हर युवा, क्यों ख़ुदकुशी पर अड़ा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
बूंद बारिश की उसको छूती है
मन मेरा ज़ार-ज़ार जलता है
मैं उसे प्यार करूं तो बेहतर
और लोगों का प्यार खलता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
जाने क्या-क्या सह के लिक्खे
ये जो गीत विरह के लिक्खे
मेरा तो बस नाम लिखा है
तूने मुझमें रह के लिक्खे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
तुमसे सिंचित कली
हौले-हौले खिली
चहकी …महकी
इतराने लगी।
हवाओं में
बिखरने लगी उसकी ख़ुश्बू।
…अरे!
तुम रूठ क्यों गए हरसिंगार?
काॅम्प्लेक्स में आ गए हो क्या?
बर्दाश्त न हुई
अपने जने की ख़ुश्बू?
भार लगने लगा
अपना ही अंश?
तुम्हारी तो कीर्ति ही बढ़ाता था!
वरना कौन देखता था तुम्हारी ओर?
तुमने उसे ही गिरा दिया
ज़मीन पर!
देखो कैसा बिछ गया है बेचारा!
अनवरत निहारता
तुम्हारी ओर।
तुम मुँह फेरे खड़े हो!
ठूँठ कहीं के!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आग्रह एक जंक्शन है
यहाँ से संबंध
बदल सकता है गाड़ी…
घृणा के लिए भी
घनिष्ठता के लिए भी
विस्तार के लिए
घुटन के लिए भी…
हर जगह की गाड़ी है हुज़ूर
आपको कहाँ का
टिकट चाहिए?
✍️ चिराग़ जैन