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मेरी ख़ामुशी पहचानो

अब उनका इंतज़ार छोड़ भी दो शानो तुम
ख़ुदकुशी कर लो कहीं अब मिरे अरमानो तुम

जुबां से कुछ न कहूँगा कभी, ये जानो तुम
जो हो सके तो मेरी ख़ामुशी पहचानो तुम

अब अपने बीच नहीं है वो मरासिम क़ायम
कि ख़ुद को मेरी उदासी की वजह मानो तुम

कभी तो दुनिया से मतलबपरस्ती भी सीखो
सदा दीवाने ही रहोगे क्या दीवानो तुम

किसी ‘चिराग़’ को जलने नहीं देना हरगिज़
नहीं तो जान गँवा बैठोगे परवानो तुम

✍️ चिराग़ जैन

मित्रता

सुदामा जैसा मित्र मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र के हिस्से के चने खा गया
और जवानी में मित्रता का हिस्सा मांगने आ गया

कृष्ण जैसा मित्र भी मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र की चालाकी पर प्रतिकार किया
और जवानी में मित्र के गिड़गिड़ाने का इंतज़ार किया

मित्रता तो दुर्योधन की बड़ी थी
जिसने कर्ण को तब अंगराज बनाया
जब उसकी प्रतिभा रंगक्षेत्र में असहाय खड़ी थी

मित्रता तो कर्ण सी होनी चाहिए
जिसने दुर्योधन का साथ देते हुए यह विचारा ही नहीं
कि उसका मित्र ग़लत है या सही

✍️ चिराग़ जैन

बुलंदशहर बलात्कार कांड

फट गया कलेजा धरती का
आकाश हिला दिग्गज डोले
ममता की कोरें बिलख उठीं
पत्थर पिघले, पर्वत बोले
फिर क्यों ऐसा कुछ नहीं हुआ
जो हवस की तंद्रा तोड़ सके
ऐसी आंधी क्यों नहीं उठी
जो वहशत को झखझोर सके
मजबूर पिता की चीखों से
अम्बर तक चोट हुई होगी
लाचार बिलखती बेटी जब
बर्बर ने हाय छुई होगी
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
भीषण हुंकार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
कैसा संहार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
वहशत की लाश पड़ी होती
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
ताण्डव की एक घड़ी होती
वह क्रुद्ध पिता उस इक पल में
उन सबकी बलि चढ़ा देता
वह क्रुद्ध पिता उस इक क्षण में
सारा ब्रह्माण्ड हिला देता
उसने अरदास लगाई थी
पर हाय विधाता सोता था
और वो रस्सी से बंधा हुआ
बस फूट फूट कर रोता था
उसकी पत्नी, उसकी बेटी
वहशत से रौंदी जाती थी
उसकी रग-रग में ज्वाला की
बिजली सी कौंधी आती थी
उस माँ की पीड़ा कौन कहे
जो ख़ुद वहशत की ज़द में थी
और उसकी छोटी सी बेटी
बर्बरता की सरहद में थी
उसकी पीड़ा लिखना चाहूँ
तो शब्द गौण हो जाते हैं
भाषा हिचकी भर रोती है
व्याकरण मौन हो जाते हैं
यह वह क्षण था जिसको सहना
मानव के वश का रोग नहीं
यह वह क्षण था जिसका जग की
सारी पीड़ा से जोग नहीं
यह वह क्षण था जिसको लखकर
खुद काल आत्महत्या करता
यह वह क्षण था जिसको सुनकर
ईश्वर भी लज्जा से मरता
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ
धरती अब तक जस की तस है
अख़बार टीस से रंगे मगर
मजबूरी अब तक बेबस है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
इस पर हो रही सियासत है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
सब सह लेने की आदत है
जिनने मानवता जर्जर की
वे तो समाज की व्याधि हैं
लेकिन जो अब ख़ामोश रहे
वे भी समान अपराधी हैं
इतनी दहशत आवश्यक है
वहशत इज़्ज़त से दूर रहे
बेटी-बहनें घर से निकलें
तो हिम्मत से भरपूर रहें
वहशी ने आँख उठाई तो
गर्दनें छाँट दी जाएंगी
इज़्ज़त को हाथ लगाया तो
बोटियाँ काट दी जाएंगी

✍️ चिराग़ जैन

मेह-निमंत्रण

ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

✍️ चिराग़ जैन

बोझा

स्कूटर के पीछे सधकर बैठी अधेड़ महिला
बचाती जा रही थी स्वयम् को
ट्रैफिक जाम में फँसे
अपने पति की बेफिक्री से।

रह-रहकर
आशंका और भय से भरी आँखें
मुस्कुरा कर
क्षमायाचना कर लेती थी
गाड़ी वालों से

ताकि उनकी झल्लाहट
पहुँचने न पाए
उसके पति तक।

आख़िरकार
मेरी गाड़ी के किनारे से
टकरा ही गया उसका पाँव।

…ज़ोर से लगी होगी उसे
लेकिन उसने एक पल भी नहीं देखा अपने पैरों की ओर
बल्कि झटाक से
दोनों हाथ जोड़कर मुझे देखा
फिर कसकर पकड़ ली स्कूटर की स्टॅपनी!

…और पति महाशय
ट्रैफिक जाम से गुस्साये
झल्लाते जा रहे हैं
उन्हें लगता था
वो कोई बोझा-सा ढो रहे हैं
अपने स्कूटर पर!

✍️ चिराग़ जैन

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