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आलोचना-आमंत्रण

सिर्फ़ प्रशंसा से निश्चित ही धार बिगड़ती है लेखन की
तुम मेरे गीतों की अब से निर्मम-निठुर समीक्षा करना

बगिया के जो बिरवे माली की कैंची से दूर रहे हैं
वो बगिया की उर्वर भू से हटने को मजबूर रहे हैं
छँटने-कटने की पीड़ा से ही मिलता है रूप सुदर्शन
तुम बस घावों पर नव पल्लव उगने तलक प्रतीक्षा करना

मेरे अक्षर कवि-गुरुकुल में सद्य प्रविष्टित राजकुँवर हैं
इनके केशों का मुण्डन भी अंतर्मन पर इक पत्थर है
पर शिक्षा के अनुशासन हित इनको भिक्षुक बनना होगा
इन सुकुमारों की भी बाकी सब जैसी ही दीक्षा करना

लाड़-दुलार अधिक होने से पीढ़ी नष्ट हुई जाती है
धूल सना जीवन जीकर ही सौंधी महक सृजन पाती है
अलग नियम से राजकुँअर पर कायरता का दोष लगेगा
हो पाए तो इनकी, सबसे बढ़कर कठिन परीक्षा करना

✍️ चिराग़ जैन

विध्वंस के बाद

पेड़ की डालियो! नवसृजन में जुटो
पत्तियों को मिला टूटने का हुनर
रात भर मत बिलखियो री सूरजमुखी
सूर्य को भा गया रूठने का हुनर

जो गुंथे एक ही तार में वो सुमन
एक दिन सूखकर तो बिखर ही गए
किन्तु जब तक जिए, तब तलक़ यूं जिए
उत्सवों के सुअवसर संवर ही गए
तुम किसी फूल से सीख लेना प्रिये
मुस्कुराते हुए छूटने के हुनर

चाक ने ही अगर संतुलन खो दिया
प्यास का हर समाधान खो जाएगा
हर कलश, हर सुराही तड़क जाएगी
तृप्ति का साज-सामान खो जाएगा
व्यर्थ अवशेष चुभ जाएंगे याद में
पात्र सीखे न गर फूटने का हुनर

भाग्य की कुछ लकीरों के अवरोह पर
चाह की श्वास हर पल सिसकती रही
सत्य कटुता का बाना पहनता रहा
प्राण की डोर गर्दन जकड़ती रही
नियति की डुगडुगी पर दिखाता रहा
इक जमूरा खुशी लूटने का हुनर

✍️ चिराग़ जैन

घर कैसे बचेगा?

देहरी ने झूठ बोला है कपाटों से
सांकलों ने सी लिए हैं होंठ
घर कैसे बचेगा?

धूल आंगन की छतों के सिर चढ़ी है
और चैखट मूकदर्शक बन खड़ी है
नींव तक हर रोज़ पानी रिस रहा है
फर्श बेचारा निरंतर घिस रहा है
रोज़ टलता जा रहा विस्फोट
घर कैसे बचेगा?

नींव का बिसरा चुकी है प्यार देखो
दूसरों पर लद गई दीवार देखो
खिड़कियां घर से अभी रूठी हुई हैं
दूसरों की दृष्टि से जूठी हुई हैं
भा रहा मन को पराया खोट
घर कैसे बचेगा?

बिस्तरों पर सिलवटें संदेह की अब
एड़ियां फटने लगी हैं स्नेह की अब
दूर ले जाती सड़क को तक रहे हैं
साथ चलने में सभी अब थक रहे हैं
आन पर हर रोज होती चोट
घर कैसे बचेगा?

इक अहम का भाव घर में तन चुका है
अन्तरंगता में झरोखा बन चुका है
आपसी विश्वास भी जर्जर हुआ अब
चाय की चर्चा हमारा घर हुआ अब
उफ़! उघड़ती जा रही हर ओट
घर कैसे बचेगा?

✍️ चिराग़ जैन

इस राह चलकर देखते हैं

चलो, इस राह चलकर देखते हैं
कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं

कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है
मेरे आँसू छलककर देखते हैं

हमें तो दिख रहा है कंठ नीला
यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं

हमारे हौसलों की थाह मत लो
कहाँ तक है समंदर, देखते हैं

अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको
तो जिगरी यार जलकर देखते हैं

अगर मुस्कान से परहेज रखूँ
तो फिर बच्चे सहम कर देखते हैं

अभी मजबूरियों की चल रही है
इरादे आह भरकर देखते हैं

यही एहसास दिल को खुश रखे है
वो हमको छुप-छुपाकर देखते हैं

✍️ चिराग़ जैन

अतिक्रमण

जिस चेहरे पर आगत के स्वागत का कौतूहल होता था
उस चेहरे पर आशंका के डर ने डेरा डाल लिया है

इच्छा बिरहन सी फिरती है, दूर हुआ उत्साह अचानक
जिन श्वासों में स्वर रहते थे उनमें व्यापी आह अचानक
जिन आँखों की आभा से मन का अंधियारा मिट जाता था
उन आँखों के नीचे चिंताओं ने घेरा डाल लिया है

संदेहों के विषधर लिपटे क्यों सम्बंधों के संदल पर
भूचालों से जूझ गया जो, वो कैसे चुप है हलचल पर
जिस साथी के हेतु निछावर स्वप्न किए अपनी आँखों के
उस साथी ने अपने मन में तेरा-मेरा डाल लिया है

द्रुत गति से उडती काया अब धीरे-धीरे सरक रही है
बांध उगा ऐसा जिससे नदिया की कलकल दरक रही है
उत्सव के जल-जीवों से शोभित था मन का मानसरोवर
अब इसमें पीड़ा ने अपना जाल घनेरा डाल दिया है

रातों को नींदों ने त्यागा, धीरज को मन ने ठुकराया
आशा त्याग चली पल भर में हिम्मत के आँचल का साया
हाथों की जिन रेखाओं में उज्ज्वल कल की बात लिखी थी
उनमें आज अचानक किसने घोर अंधेरा डाल दिया है

✍️ चिराग़ जैन

स्मॉग

चाह पूनम की थी तो अमा दे गए
रौशनी से रहित चन्द्रमा दे गए
फॉग बनकर जिन्होंने बुलाया निकट
स्मॉग बनकर वही अस्थमा दे गए

✍️ चिराग़ जैन

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