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अल्बम

छुपी है याद की कितनी बड़ी जागीर अल्बम में
रखे हैं फूल, आंसू और कितने तीर अल्बम में
तुम्हारी याद की अल्बम उठाई तो हुआ मालूम
बहुत बतिया रही है आज हर तस्वीर अल्बम में

✍️ चिराग़ जैन

साहित्य सृजन

दीवानेपन में दुनिया के सफहे मोड़ गए हैं यार
आशिक अपने नाख़ूनों से पर्वत तोड़ गए हैं यार
ख़ाक़ कहेगा कोई अब इस महफ़िल में कुछ बात नई
तुलसी, मीर, कबीर सभी कुछ लिख कर छोड़ गए हैं यार

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

छप्पन इंची

अपमानित होना पड़ता सैनिक के खून पसीने को
रोक नहीं पाए हैं अब तक उग्रवाद के कीने को
आईएसआईएस ने मरहूम किया बेटों के जीने को
शहद लगाकर चाटेंगे क्या छप्पन इंची सीने को

✍️ चिराग़ जैन

सूरज को चेतावनी

किरणों के बूते गहरा अंधियार मिटाना नामुमकिन है
दिनकर अब तुमको ख़ुद ही अंधियारे बीच उतरना होगा

युग-युग से तुम जिन घोड़ों के रथ पर थे असवार दिवाकर!
उनका चाल-चलन भी जाँचो अब फिर से इक बार दिवाकर!
इनके चारे की थैली पर अंधियारे के चिन्ह मिले हैं
इनकी हर हरक़त पर तुमको पूरा अंकुश धरना होगा

ओ दिनकर! कानाफूसी में ये बातें उड़ने लगती हैं
इक निश्चित पथ पर कुछ किरणें इधर-उधर मुड़ने लगती हैं
कोष तुम्हारे श्वेत पसीने का यदि उलझा तंत्र-भँवर में
तुमको लाँछन की पीड़ा से आहत होकर मरना होगा

तुम बरसों से धधक रहे हो, फिर भी अंधियारा जीवित है
कुछ अंधी गलियों में शायद उजियारे का रथ कीलित है
पूरब से पश्चिम तक की निगरानी की मर्यादा छोड़ो
अब नभ से धरती तक तुमको आँखे खोल विचरना होगा

तुम तक आने की हर कोशिश की पाँखें घायल होती हैं
उजियारे की ओर निहारें तो आँखें घायल होती हैं
ख़ूब भरा है तुम पर उठने वाली आंखों में अंधियारा
पर अंधियारे की आँखों में आज उजाला भरना होगा

तुम ही तो इस अंधियारे की रक्षा हेतु नियुक्त नहीं हो
तुम ही ख़ुद काले वैभव के वेतन से तो युक्त नहीं हो
इन सब प्रश्नों के उत्तर दे-देकर अपमानित हो जाओ
इससे पहले तुमको जग का हर अंधियारा हरना होगा
✍️ चिराग़ जैन

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