दशहरा
भय शत्रु पक्ष का गौण रहे
अरि की चर्चा जब मौन रहे
विश्वास स्वयं के शस्त्रों पर
योद्धा का गहरा होता है
तब विजय सुनिश्चित होती है
बस तभी दशहरा होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished Geet
भय शत्रु पक्ष का गौण रहे
अरि की चर्चा जब मौन रहे
विश्वास स्वयं के शस्त्रों पर
योद्धा का गहरा होता है
तब विजय सुनिश्चित होती है
बस तभी दशहरा होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
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इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है
तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है
भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं
इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं
शब्द से सच का सहज चेहरा उकेरा जा रहा है
झूठ सुन ले, यह किसी षड्यंत्र की चौसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
इस जगह पर कामना के पर कतरने का नियम है
लाभ से दामन छुड़ाकर कर्म करने का नियम है
कान सबके दूसरों के आँसुओं की आह पर हैं
ध्यान सबका सृष्टि भर के अप्रतिम उत्साह पर है
इस धरा पर स्वार्थ को पूरा निचोड़ा जा रहा है
वासनाओं के लिए यह धाम कुछ हितकर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
इस समय वात्सल्य का उल्लास-उत्सव चल रहा है
रच रहे हैं आज नटवर रास; उत्सव चल रहा है
कृष्ण के आनंद में सुख से भरी हैं कुंजगलियाँ
पीर की काया बड़ी है, संकरी हैं कुंजगलियाँ
द्वेष से मिलने कन्हैया आएंगे मथुरा स्वयं ही
कंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
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