Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सपनों की नौका है, अपनों का पाल
जीवन की धारा पर, साँसों की चाल
बीत गया एक और साल
भोर की किरण आई, अर्घ्य बन गया पानी
दोपहर तपी, लेकिन शाम हो गई धानी
रात ने बिखेर दिया तारों का थाल
बीत गया एक और साल
देह हो गई गठरी, शीत की गलन झेली
पानी को छू-छूकर, ग्रीष्म की जलन झेली
बरखा ने ओढ़ लिया सिर पर तिरपाल
बीत गया एक और साल
आहट का डर देखा जंगलों के पेड़ों में
मौत का बसेरा था लहर के थपेड़ों में
घाट-घाट घटनाएँ, पग-पग भूचाल
बीत गया एक और साल
धारा के चेहरे पर नैय्या की छाया है
सोच कर समझ आया, कुछ नहीं पराया है
अपनी ही मछली है, अपना ही जाल
बीत गया एक और साल
एक-एक अनुभव को, भर रहे हैं झोले में
एक पल भँवर में हैं, एक पल हिंडोले में
साथ ले के उतरेंगे यादों की टाल
बीत गया एक और साल
✍️ चिराग़ जैन
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उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे
एक मुद्दत से मेरे पास नहीं आई है
एक मुद्दत से कई काम अधूरे हैं मेरे
वायदे, ख़्वाब, मुलाक़ातें कई हैं बाक़ी
एक तस्वीर अधूरी सी बनी रक्खी है
एक मिसरा-सा ग़ज़ल का है, बिना सानी के
एक किस्से का भी मफ़हूम लिखा रक्खा है
एक बूढ़ा है, कई बार बुलाता है मुझे
उससे हर बार बहाना-सा बना देता हूँ
अपने अरमान के पंछी को दग़ा देता हूँ
कितना मसरूफ़ बना रक्खा है मैंने ख़ुद को
वक़्त मिलता ही नहीं मुझको कभी इतना भी
अपनी टेबल पे रखे फालतू काग़ज़ छाँटूँ
मेज की तीनों दराज़ों को पलटकर इक दिन
उनमें तरतीब से सामान सजाकर रख दूँ
कितना बिखरा हुआ सा रहने लगा हूँ अब मैं
इन दराज़ों में भरे फालतू सामानों से
मुँह चुरा लेता हूँ मैं अपने ही अरमानों से
क्या-क्या बाक़ी है, कहाँ तक ये गिनोगे तुम भी
चलो फ़ुरसत से मिलूंगा तो बताऊंगा कभी
उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे
✍️ चिराग़ जैन
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छोड़ कर घर-द्वार मत जा
आस के उस पार मत जा
राग मत बैराग से कर
नेह को यूँ हार मत जा
घर बिना तेरे यकायक हो गया खंडहर
देख ले इक बार तो मुड़कर
विश्व को रौशन बनाने के लिए सूरज बहुत है
बाहरी दीवार पर उजियार की सजधज बहुत है
घर समूचा डूब जाता है अंधेरे में तेरे बिन
इस अभागी देहरी को सिर्फ़ तेरी रज बहुत है
घर में अंधियारा भरा है, दीप है बाहर
देख ले इक बार तो मुड़कर
उर्मिला को सौख्य भी दे, राम को परमार्थ भी दे
विश्व को सर्वार्थ भी दे, राधिका को स्वार्थ भी दे
सृष्टि का करुणेश तू, घर के लिए करुणा बचा ले
सौंप दे जग को तथागत, नीड़ को सिद्धार्थ भी दे
तू हुआ मधुमास, घर पतझर
देख ले इक बार तो मुड़कर
✍️ चिराग़ जैन
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दुनिया को भरमाने वाले
सारा खेल रचाने वाले
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है
जग का कर्ता-धर्ता तू है, जग में कष्ट अपार भरे हैं
पहले तूने पापी भेजे, फिर तूने अवतार धरे हैं
पहले आग लगाने वाले
फिर पानी बरसाने वाले
तेरा, सुख देने के दावा
कोरा आडम्बर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है
सब कुछ सहज चले दुनिया में, यह तुझको स्वीकार न होगा
कष्ट नहीं हो तो दुनिया में, तेरा कारोबार न होगा
हँसते लोग रुलाने वाले
दुःख देकर इतराने वाले
सुख की मांग बढ़ाता फिरता
तू इक सौदागर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है
आँसू, पीड़ा, कष्ट, विवशता -इनसे रिश्वत लेता है तू
सुख के झोला देता है तो, उनमें दुःख रख देता है तू
सुख के स्वप्न दिखाने वाले
दुख के पेड़ लगाने वाले
सबके सुख के परिधानों में
क्यों दुःख का अस्तर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है
✍️ चिराग़ जैन
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राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी
राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी
जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी
भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को
सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को
✍️ चिराग़ जैन