Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
अब तक पथ पर फूल बिछे थे
नयन लुभावन चित्र खिंचे थे
अब इक कंकड़ चुभ जाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
जिस क्यारी को हाथ लगाया,
उसमें फूल खिले; क्या कम है?
जिस पगडण्डी को अपनाया,
उस पर मीत मिले; क्या कम है?
रेले-मेले, खेल-तमाशे, उत्सव के पल पाये यहाँ से
अब कुछ सन्नाटा छाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
झोली भरकर सुख पाया है
चुटकी भर दुःख पर क्या रोना
इस दुःख से सँवरेगा शायद
जीवन का इक सूना कोना
वटवृक्षों की छाँव मिली है, हर धारा पर नाव मिली है
सीने तक पानी आने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
मेरा काम सफ़र करना है
पथ का निर्धारण उसका है
मैं अपना किरदार जिऊंगा
बाक़ी निर्देशन उसका है
शिखरों को छूने की इच्छा इन राहों ने पूरी की है
थोड़ी साँसें चढ़ जाने से
मैं रस्ते को दोष न दूंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
बचपन में
मेरी मजबूरियों ने
मुझसे कुछ सपने छीनकर
फेंक दिये थे
ज़मीन पर
कुछ समय तक
देखता रहा मैं उन्हें
दूर से ही
फिर उन पर
चढ़ गयीं कई परतें
…व्यस्तताओं की
…समय की
…और बेख्याली की
मुझे लगा
कि समा गये हैं
वे सब सपने
क़ब्र में।
लेकिन मैं ग़लत था
बीते कुछ दिन से
मेरे मन के ठीक नीचे
कुछ हलचल सी
महसूस होती थी
मैंने अपनी व्यस्तता की
परत हटाकर देखा
तो वे सब सपने
गहरे तक
फैला चुके थे अपनी जड़ें
विराट हो चुका था उनका स्वरूप
जिसे मैं क़ब्र समझ रहा था
वह क्यारी निकली
और जिन्हें मैं देह समझता रहा
वे बीज निकले।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
कब उगेगा दिन, तुम्हारे आगमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कब कोई आकार होगा इस सपन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
मैं युगों से रोज़ लिख-लिखकर संदेशे
बादलों के हाथ भेजे जा रहा हूँ
शुद्धतम जल से चरण धोऊँ तुम्हारे
आँसुओं को भी सहेजे जा रहा हूँ
कब मुझे अवसर मिलेगा आचमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
‘भोर की पहली किरण पर आओगे तुम’
-रात से हर रात ये ही कह रहा हूँ
सूर्य का उत्साह ठण्डा पड़ रहा है
और मैं भीतर ही भीतर दह रहा हूँ
हँस रहा मुझ पर हर इक तारा गगन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
चौखटों का नूर बुझने लग गया है
देहरी की आँख पथराने लगी है
बेर की हर डाल चुभने लग गयी है
मालती की देह कुम्हलाने लगी है
हो रहा नीरस निरंतर स्वर सृजन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कौन जाने एक दिन मेरी कथा का
अंत, शबरी की कथा जैसा रहेगा
या निरन्तर बढ़ रही इस पीर का पथ
सिर्फ़ राधा की व्यथा जैसा रहेगा
बेर हूँ मैं या सुमन हूँ कुंजवन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
विचारों के भाजी बाज़ार से दूर,
मस्तिष्क के
पिछवाड़े वाले तहख़ाने में
भरे पड़े हैं
ऐसे हज़ारों बिम्ब
जिन्हें आँखों ने
चित्त के शिकंजे से बचाकर
यहाँ छिपा दिया था।
जब कभी
सहजता की सवारी करके
प्रिविष्ट हुआ हूँ
इस तहख़ाने में
बस तभी
बटोर लाया हूँ
…ढेर सारे बिम्ब
…ढेर सारी कविताएँ!
आपके भीतर भी होगा
ऐसा ही इक तहख़ाना;
बस इसमें
कभी मुखौटा लगाकर
मत जाना!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Lapete Mein Netaji, Poetry
कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं
अब तो लाशों में गंगा बह रही है।
कौन कहता है कि प्रशासन
साम्प्रदायिक भेदभाव करता है
प्रशासन तो सब लाशों से
एक जैसा बर्ताव करता है।
कौन कहता है
नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है
अब तो नदी तट पर
मानवता की रूह दहलती है।
साहेब!
एक बात बताओगे
अगर हर घाट पर मुर्दे दफ़्न होंगे
तो अगली दिवाली पर
दीये कहाँ जलाओगे?
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सत्य के आधार पर खड़े
चार-चार शेर भी
झूठ बोलनेवालों को
कुछ नहीं कहते।
देश की हर सरकारी मुहर पर
एक झूठ लिखा है –
‘सत्यमेव जयते’।
✍️ चिराग़ जैन