Chirag Jain Writings, Ghazal, Lapete Mein Netaji, Poetry
कुर्सी का घमासान इधर भी है, उधर भी
दो लोगों का गुणगान इधर भी है, उधर भी
जो डेडिकेट है वो सिर्फ झंडे उठाए
दल बदलुओं का मान, इधर भी है उधर भी
जो हाँ में हाँ मिलाए, वही पद पे रहेगा
सच कहने में नुक़सान इधर भी है, उधर भी
किस्मत न बदल पाओ तो क्यों दल बदल रहे
सिद्धू तो परेशान इधर भी है उधर भी
मुफ्ती, पंवार, ठाकरे, अखिलेश या जयंत
पंजे के संग कमान इधर भी है, उधर भी
शाहों की ख्वाहिशों पे ही प्यादे निसार हों
ये खेल का विधान, इधर भी है उधर भी
जिसकी भी घुड़चढ़ी हो वहीं नाच रहे हैं
दो-चार पासवान इधर भी हैं, उधर भी
मैं जिनके साथ हूँ वही ईमानदार हैं
सिब्बल का ये बयान इधर भी है, उधर भी
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
सभी की आँख में
अंगार बोये जा चुके हैं
सभी की बोलियों में ख़ार बोये जा चुके हैं।
सभी की मुट्ठियाँ भिंचने लगी हैं
लकीरें बेसबब खिंचने लगी हैं
सभी के दाँत अब पिसने लगे हैं
पुराने ज़ख़्म फिर रिसने लगे हैं
ये जलवा भी सियासत कर चुकी है
हर इक दिल में शिक़ायत भर चुकी है
सुना है आदमीयत डर रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है
वो जो हमको बताते फिर रहे हैं
कई नश्तर चुभाते फिर रहे हैं
जो जज़्बातों से खेले जा रहे हैं
लपट में घी उंडेले जा रहे हैं
समझ लोगे तुम उनकी आदतों से
उन्हें हँसना मना है मुद्दतों से
जिन्हें रहबर बताया जा रहा है
उन्हीं को बरगलाया जा रहा है
हमीं से आग लेकर नफ़रतों की
हमारा घर जलाया जा रहा है
जो पत्थर मारने को चल पड़े हैं
उन्हीं की अक्ल पर पत्थर पड़े हैं
मगर सबको बताया जा रहा है
सबक़ ऐसा सिखाया जा रहा है
सुनो, पत्थर नहीं हैं, फूल हैं ये
बुजुर्गों की पुरानी भूल हैं ये
इन्हें लपटें उठाकर भस्म कर दो
अदा तुम भी ज़रा-सी रस्म कर दो
तुम्हें भगवान की सोहबत मिलेगी
इसी रस्ते तुम्हें जन्नत मिलेगी
दया का भूलकर मत नाम लेना
उठे हाथों को मत तुम थाम लेना
क्षमा के दायरे से दूर रहना
उबलते-खौलते भरपूर रहना
अहिंसा की ज़रा मत फ़िक्र करना
न ही इंसानियत का ज़िक्र करना
डगर करुणा की हरगिज़ मत पकड़ना
कोई नारा लगाकर कूद पड़ना
तुम्हारी ही ज़रूरत पड़ रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है
हमारी क़ौम को शैदा किया है
जिन्होंने इश्क़ को पैदा किया है
ज़माने से यही बस कर रहे थे
चमन में खुशबुएँ ही भर रहे थे
पराए आँसुओं से भीगते थे
पराई हर हँसी पर रीझते थे
सभी की पीर में शामिल रहे थे
वो सब विश्वास के क़ाबिल रहे थे
न ऐसा दौर अब आगे रहेगा
चमन कुछ और अब आगे रहेगा
ज़माने को नयी हम सोच देंगे
चमन से खुशबुओं को नोच देंगे
ज़हर के बीज फलने लग गए हैं
सुनो, त्योहार जलने लग गए हैं
सभी साँचे में ढलने लग गए हैं
बिना मतलब उबलने लग गए हैं
हर इक पोखर में कीचड़ भर रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
होली के हुड़दंग में
रंग में भंग पड़ गयी
इधर ठण्डाई गले से नीचे उतरी
उधर भांग सिर पर चढ़ गई
भोले की बूटी ने ऐसा झुमाया
कि हाथ को लात
और सिर को पैर समझ बैठा
चूहा भी ख़ुद को शेर समझ बैठा
नशे की झोंक में लफड़ा बड़ा हो गया
पत्नी के सामने तनकर खड़ा हो गया
पत्नी ने आँखें दिखाई
तो डरने की बजाय अकड़ने लगा भाई
तू क्या समझती है
तेरी आँखों से डर जाऊंगा
तू जो कहेगी, वो कर जाऊंगा
ख़ुद को बड़ी होशियार समझती है
मुझे अनाड़ी, मूरख, गँवार समझती है
अरे, तेरी बेवकूफियों को हज़ारों बार इग्नोर कर चुका हूँ
क्योंकि तुझसे शादी करके
सबसे बड़ी बेवकूफी तो मैं ख़ुद कर चुका हूँ
जब नशा उतरा
तो उसकी दुनिया का पूरा भूगोल डोल गया
लेकिन मन ही मन ख़ुश था
कि नशे में ही सही
एक बार तो पत्नी से सच बोल गया।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक
याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक
जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक
लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक
सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Jainism, Poetry
हम जैन धर्म के अनुयायी
हम नियम निभाने वाले हैं
श्रावक अणुव्रत के धारी हैं
श्रमणों ने महाव्रत पाले हैं
हम सिद्धशिला का लक्ष्य बना, अरिहंतों की पूजा करते
आचार्य कथित पथ को तजकर, नहीं काम कोई दूजा करते
पाठक परमेष्ठी से पढ़कर
मुनि मार्ग को जाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
वैभव के मग चलते-चलते हम राह अचानक मोड़ गये
हम बाहुबली के वंशज हैं, जो जीत-जीत कर छोड़ गये
हम भामाशाह, राष्ट्रहित में
सर्वस्व लुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
दिन ऐसा एक नहीं जाता, जब हम जपते नवकार नहीं
जिसमें हो अहित चराचर का, ऐसा करते व्यापार नहीं
हो लोभ न जिसमें उतना ही
हम लाभ कमाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
रत्नत्रय को धारण करके, हम चार कषाय अहित मानें
पाँचों पापों से दूर रहें, छह द्रव्य, तत्व सातों जानें
कर नष्ट अष्ट कर्मों को हम
अष्टम भू पाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
हम शांत सहज जीवन जीते, लड़ने की देते राय नहीं
कैसी भी कठिन समस्या हो, अड़ने से कोई उपाय नहीं
हम अनेकांत के साधक हैं
स्याद्वाद सिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
हम चेतन से मतलब रखते, तन से रखते हैं मोह नहीं
इसलिए हमें सुख-दुःख देते, ये लौकिक मिलन-बिछोह नहीं
जिसको अपना कहते उसको
शिवमार्ग दिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
हम पर्व मनाते हैं ऐसे, पूरे दिन का उपवास करें
निस्पृह जीवन जीने वाले, दश धर्मों का अभ्यास करें
हम मृत्यु महोत्सव से पथ का
पाथेय जुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी
✍️ चिराग़ जैन