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आख़िर क्यों माँ?

माँ
दुनिया तुझको अक्सर
ममता की इक मूरत कहती है
मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का
क़द्रदान हूँ।

लेकिन माँ
इतना बतला दे
तब वो सारी नेह-दिग्धता
भीतर का सारा वात्सल्य
कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने
जब तूने
इक सच्चे दिल से
दोनों हाथ बलैयाँ लेकर
अपने रब से दुआ करी थी
इक बचपन के मर जाने की…

जब तूने चाहा था
तेरा राजा बेटा
जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाए

कहाँ मर गई थी
तब
तेरी सारी ममता?

✍️ चिराग़ जैन

इक लड़की

प्यार की बयार में ये दिल झूम नाचता है
जब दिल में उतरती है इक लड़की
नित नए रंग, नित नई मुस्कान लिए
मन में उमंग भरती है इक लड़की
जीवन की सूनी बगिया महकती है जब
पारिजात बन झरती है इक लड़की
दिल ट्रिन-ट्रिन बजता है रोज़-रोज़ जब
सांझ ढले फोन करती है इक लड़की

✍️ चिराग़ जैन

राखी का त्यौहार

महानगर में इस तरह, बदला हर त्यौहार
अब तोरण करते नहीं, खड़िया का शृंगार

रेडिमेड में ढँक गया, सारा हर्ष-किलोल
सोन बनाती बेटियाँ, खड़िया-गेरू घोल

ना मोली की सौम्यता, ना रेशम की डोर
अब राखी पर दिख रहा, प्लास्टिक चारों ओर

कितना डेवलप हो गया, ये पुरख़ों का देस
चॉकलेट ने कर दिया, बरफ़ी को रिप्लेस

✍️ चिराग़ जैन

वायरस

जब से डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम
…शायद फाइल में वायरस था

जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
..स्लो कर दी
मेमोरी

…शायद
इंस्टॉल करनी पड़ेगी
नई विंडो

✍️ चिराग़ जैन

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया
जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया

लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे
चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया

यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला
सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया

कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ
फिर माँ की उंगलियों ने ज़ायक़ा बढ़ा दिया

मंज़िल थी मिरे रू-ब-रू, रस्ता था दो क़दम
अपनों की क़ोशिशों ने फासला बढ़ा दिया

✍️ चिराग़ जैन

तुम्हारा आगमन

ये हवा कल भी बही थी
ज़िन्दगी कल भी यही थी
कुछ कमी कल भी नहीं थी
पर तुम्हारे आगमन ने बीहड़ों में जान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

बिन तुम्हारे भी अधूरापन नहीं था ज़िन्दगी में
पर ख़ुषी का भी कोई कारण नहीं था ज़िन्दगी में
ये महक, ये बदलियाँ, ये बारिषंे कल भी यहीं थीं
कैसे मैं कह दूँ कोई सावन नहीं था ज़िन्दगी में
तुमने ही इन बारिषों को इक नई झनकार देकर
बदलियों को रंग, दिल को संग, मुझको प्यार देकर
मस्त मौसम में अचानक इक नई पहचान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

शब्द-सा बेकार था, तुम अर्थ बन मुझमें समाईं
आँसुओं का गीत था, तुम दर्द बनकर छलछलाईं
तुम समन्दर के हृदय पर लहर बनकर डोलती हो
आम्र-तरु की डालियों पर कोयलों-सी गुनगुनाईं
आपके आने से पहले मुस्कुराना भी कठिन था
खेलना, हँसना, मनाना, रूठ जाना भी कठिन था
तुमने अपनाकर ये मेरी ज़िन्दगी आसान कर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

✍️ चिराग़ जैन

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