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गुनाह

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं
क़ुसूरवार हूँ, कोई गुनाहगार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इन्तज़ार नहीं

✍️ चिराग़ जैन

बनिये

बुझा दें प्यास औरों की वो मिट्टी के घड़े बनिये
रहे अन्तस् में कोमलता भले बाहर कड़े बनिये
हमारा क़द हमारी भावनाओं से निखरता है
भले संख्या में कम हों हम मगर दिल के बड़े बनिये

नहीं ऐसा नहीं हम लोग केवल दान करते हैं
हक़ीक़त ये है हम प्रतिभाओं का सम्मान करते हैं
हमें भगवान बनने की कोई ख्वाहिश नहीं लेकिन
वो हर सत्कर्म करते हैं जो बस इन्सान करते हैं

जो दुनिया को फतह कर ले, वो बल-उत्साह हममें है
सभी के घर जले चूल्हा, ये इक परवाह हममें है
जो इक हारे हुए राणा को अपनी सम्पदा दे कर
पुनः लड़ने की हिम्मत दे, वो भामाशाह हममें है

✍️ चिराग़ जैन

नमक

यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक
है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक

तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे
लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक

आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ
दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक

दावतें धोखे की हरगिज़ हो न पाएंगीं लज़ीज़
ग़र न होगा उनमें कुछ यारों के वादों का नमक

दिल की धरती पर अमन के फूल महकेंगे नहीं
जम गया मिट्टी पे ग़र क़ातिल इरादों का नमक

✍️ चिराग़ जैन

विवशता

चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को
हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी
साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार
प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी
इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग
फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी
लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में
मनवा में उठती हिलोर से विवश थी

✍️ चिराग़ जैन

फागुन की शाम

फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम
जोगियों का दिल धक-धक करने लगा
सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई
मन को खुमार चकमक करने लगा
पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल
झूम-झूम मार बक-बक करने लगा
और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले
प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा

✍️ चिराग़ जैन

हम हाथ मल रहे हैं

हमको हमारे ऐसे हालात खल रहे हैं
रग-रग में बेक़ली के सागर मचल रहे है
उनकी झिझक ने इतना लाचार कर दिया है
सब हाथ में है फिर भी, हम हाथ मल रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

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