सुरों की आह
ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है
कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है
बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के
जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है
कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है
बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के
जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
मटक-मटक लट झटक-झटक; हिया-
पट खटपट खटकाती है गुजरिया
ठक-ठक-ठक खटकात नटखट
मोरे हिवड़ा के पट, बतलाती है गुजरिया
लाग न लपट, तज अंगना का वट
झट जमना के तट, चली आती है गुजरिया
लेवे करवट जब मन का कपट
उस पल झटपट नट जाती है गुजरिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
आज उस चेहरे पे मंज़िल की ख़ुशी भी देखी
और उन आँखों में कल तक की नमी भी देखी
लोग बस जिस्म तक आते थे चले जाते थे
इक मगर तूने मेरे दिल की ज़मीं भी देखी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
नानक, कबीर, महावीर, पीर, गौतम को
पंथ-देश-जातियों का नाम मत दीजिए
जिनने समाज की तमाम बेड़ियाँ मिटाईं
उन्हें किसी बेड़ी का ग़ुलाम मत कीजिए
मन के फ़कीर अलमस्त महामानवों को
रूढ़ियों से जोड़ बदनाम मत कीजिए
प्राणियों के प्रति प्रेम ही प्रभु की वन्दना है
भले किसी ईश को प्रणाम मत कीजिए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
अभिनन्दन की मालाओं के फूलों की गंध नहीं भाती
अनुशंसा और प्रशंसा से मुख पर मुस्कान नहीं आती
कोई अभिलाषा शेष नहीं, यश-वैभव-कीर्ति प्रसारण की
ये दुनियादारी की बातें मन को न घड़ी भर ललचाती
या पूर्ण समर्पित होने दो, या मुझको पूर्ण समर्पण दो
सम्मान नहीं, अपनापन दो!
झूठे अनुशंसी शब्दों में भावों का तत्व नहीं मिलता
झूठी चिपकी मुस्कानों में अन्तस् का सत्व नहीं मिलता
माना पत्तल के भोजन से उत्तम हैं छप्पन भोग मगर
दुर्योधन के आमंत्रण में, वैसा अपनत्व नहीं मिलता
मेरे भीतर के कान्हा को निश्छल निस्पृह वृंदावन दो
सम्मान नहीं, अपनापन दो!
मेरे भीतर के बालक को मुखरित कर दे; कोई ऐसा हो
अभिभावक बन मेरे सिर पर कर तल धर दे; कोई ऐसा हो
बौद्धिकता के झंझावातों से जीवन शुष्क हुआ सारा
मेरी चंचलता की वंशी में स्वर भर दे; कोई ऐसा हो
मेरी कृत्रिम तस्वीर हटा, मुझको अन्तस् का दर्पण दो
सम्मान नहीं, अपनापन दो!
मालाओं और दुशालों से अब कंधे थककर चूर हुए
फोटो खिंच जाने तक हम सब मुस्काने को मजबूर हुए
हाथों की रग-रग दुखती है, अब अभिवादन की मुद्रा से
तमगों की पाॅलिश उतर गई, सम्मान सभी बेनूर हुए
छोड़ो झूठी व्यवहारिकता, इक नेह भरा आलिंगन दो
सम्मान नहीं, अपनापन दो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
प्रेम, शांति और सौम्यता, सबका हो विस्तार
सबके जीवन में भरे, प्यार, प्यार और प्यार
✍️ चिराग़ जैन