Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
पेट को जब भूख लगती है
तो अक्सर पाँव सबके
घर से बाहर आ निकलते हैं
भूख के कारण सभी
प्राणी, परिन्दे, जानवर
सब कीट और इन्सान तक
संघर्ष करते हैं
तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से
चींटियाँ चलतीं कतारों में
निकलकर बांबियों से
साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं
शेर, तजकर मांद को
भीषण दहाड़ें मारते हैं
भेड़िये, चीते, बघेरे
मृग, मगर और मीन
सब भोजन कमाने को
घरों का त्याग करते हैं
परिन्दे, दानों की ख़ातिर
खोलते हैं पर
फुदककर नीड़ से बाहर निकलते हैं
और इन सबकी तरह
इंसान भी
दो वक़्त की रोटी कमाना चाहता है
हाँ,
कमाने के तरीक़े भी
सभी के एक से हैं।
छीनना, लड़ना, झपटना, मांगना
या सोखना और चाटना
जूठन उठाना
या किसी की हसरतों का क़त्ल करके
पेट की ज्वाला बुझाना
फ़र्क़ है तो सिर्फ़ इतना
और सब
सुब्ह निकलकर
शाम तक घर लौट आते हैं
फिर से सूनी बांबियों में
घोसलों में
प्यार की दुनिया बसाते हैं
आदमी, पर इक दफ़ा
जब रोटियाँ लाने निकलता है
तो फिर घर लौट कर
वापिस नहीं आता!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया
फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया
कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया
टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया
जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिये जिया
हर एक शख़्स अपनी नज़र में था बेलिबास
दुनिया के दिखावे को लबादा लिये जिया
रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिये जिया
इक वो है जिसे दौलतो-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिये जिया
तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिये जिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके
ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की
शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए
बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की
लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए
भला फिर आँख बिन पानी किस काम की
जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए
ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जहां तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहां हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तेरा दर मिला है
हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
जिन शिखरों को हो पिघलने से ऐतराज़
उन्हें कभी नदी-सा बहाव नहीं मिलता
अनुभूति अनकही रहती हैं जब तक
अक्षरों से उनका स्वभाव नहीं मिलता
जोड़-तोड़ करने से कविता तो बनती है
किन्तु ऐसी कविता में भाव नहीं मिलता
काव्य तो है ऐसी पीड़ाओं की प्रतिध्वनि जहाँ
टीस उठती है पर घाव नहीं मिलता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
मुझपे अब मेहरबान हो कोई
मेरे सपनों की जान हो कोई
मेरे मन में उतर-उतर जाए
जैसे बन्सी की तान हो कोई
✍️ चिराग़ जैन