Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जिस दरपन ने तुम्हें निहारा, उस दरपन का खालीपन
और सघन कर देता है इस अंतर्मन का खालीपन
कल तक आंगन में उनके आने की कोई आस तो थी
अब तो भुतहा सा लगता है इस आंगन का खालीपन
सारा कुछ खोकर भी जाने किसे जीतने निकला हूँ
शायद मुझमें घर कर बैठा है रावन का खालीपन
मेरा सब कुछ लेकर भी उनका मन रीता-रीता है
मेरे भीतर भरा हुआ है, उनके मन का खालीपन
शाम उदासी ओढ़ खड़ी है, बादल ग़ायब, हवा अचल
एक परिंदा भर सकता है नीलगगन का खालीपन
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है
चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है
फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है
सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है
मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है
कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है
न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है
जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है
वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है
मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है
लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है
जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है
दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बस इतना सोचकर हम लोग अब ख़ामोश रहते हैं
कि जब हम बोलते हैं और सब ख़ामोश रहते हैं
वो चुप हैं तो समझ लेना उन्हें सब कुछ पता होगा
जिन्हें थोड़ा पता होता है कब ख़ामोश रहते हैं
मिरे आदाब तक को लोग बेअदबी समझते हैं
यही सब देखकर हम बाअदब ख़ामोश रहते हैं
मुहब्बत एक दिन ऐसा भी मंज़र पेश करती है
निगाहें बोलती हैं और लब ख़ामोश रहते हैं
कभी हम भी सभी से हर ख़ुशी-ग़म बाँट लेते थे
मगर अब देखकर दुनिया के ढब, ख़ामोश रहते हैं
बड़ी मुद्दत से अपने दिल में जाने क्यों नहीं उठती
किसी को कुछ बताने की तलब, ख़ामोश रहते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
….सिर्फ़ कोशिश।
कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
…और कभी-कभी
अपना भी मन।
इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।
उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!
✍️ चिराग़ जैन