शरद पूर्णिमा
शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर
सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर
सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बहुत ज़्यादा न हो पर कुछ तो हसरत सबको होती है
जहाँ में नाम और शोहरत की चाहत सबको होती है
मरासिम हर दफ़ा ताज़िन्दगी निभता नहीं लेकिन
किसी से इक दफ़ा सच्ची मुहब्बत सबको होती है
मन अपने आप से भी इक ना इक दिन ऊब जाता है
किसी अपने की दुनिया में ज़रूरत सबको होती है
हर इक मुज़रिम को लगता है, उसी पर सख़्त है मुन्सिफ़
नहीं तो हर सज़ा में कुछ रियायत सबको होती है
किसी को बादशाहत दी, किसी को झोपड़ों के सुख
मगर फिर भी मुक़द्दर से शिक़ायत सबको होती है
फ़क़त इक मौत जीवन को कोई मौक़ा नहीं देती
वगरना एक-दो लमहों की मोहलत सबको होती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
किसी की ज़िन्दगी अपने ठिकाने तक नहीं पहुँची
किसी की मौत ही वादा निभाने तक नहीं पहुँची
बुज़ुर्गों की क़दमबोसी मेरी फितरत रही लेकिन
मेरी हसरत कभी उनके ‘सिराने तक नहीं पहुँची
ज़माने के लिए जो शख्स घुट-घुट कर मरा आख़िर
ख़बर उस शख्स की ज़ालिम ज़माने तक नहीं पहुँची
हवा के साथ उसकी ख़ुश्बुएँ आती रहीं लेकिन
कभी वो शय हमारे आशियाने तक नहीं पहँची
लहर से जूझना ही क्यों लिखा था मेरी क़िस्मत में
मेरे किश्ती कभी भी क्यों मुहाने तक नहीं पहुँची
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
माँ के आँचल में था महफ़ूज़ हमारा बचपन
आ के दुनिया में कहीं खो गया प्यारा बचपन
इस ज़माने की हर इक चाल से हारा बचपन
कैसे जी पाएगा ऐसे में बेचारा बचपन
देखकर डर गया दुनिया का नज़ारा बचपन
फिर कभी लौट के आया न दुबारा बचपन
जिस घड़ी हो गए हालात ज़ेह्न पर क़ाबिज़
उस घड़ी आँसुओं में बह गया सारा बचपन
‘हम भी जल्दी से बड़े हों तो मज़ा आ जाए’
-ऐसे मासूम ख़यालात ने मारा बचपन
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
शब्द
शिव हैं।
जब कभी
बहती है भावना
उद्विग्न हो
मन के भीतर से
तो उलझा लेते हैं उसे
व्याकरण की जटाओं में।
रोक देते हैं
उसका सहज प्रवाह।
सीमित कर देते हैं
उसकी क्षमताएँ।
कविता वेग है
आवेग है
उद्वेग है।
वो तो
शब्दों ने उलझा लिया
वरना,
बहा ले जाती
सृष्टि के
सारे कचरे को।
शब्द ब्रह्म नहीं हैं,
शब्द शिव हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
काऊ ने भोग लिए मन के सुख, काऊ ने देह के रोग कमाए
दौलत में सुख खोजने वालों ने केवल भौतिक भोग कमाए
काऊ ने प्रेम में जीते नारायण, काऊ ने मात्र वियोग कमाए
जीवन सिर्फ़ उन्होंने जिया, जिनने जग में कुछ लोग कमाए
✍️ चिराग़ जैन