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समाधान

बहुत समझदार हो तुम
जब कभी
उदासी का आँचल ओढ़कर
जवान होने लगता है
मेरा कोई दर्द

तो चुपचाप
बिना किसी शोर-शराबे के
‘कंधा देकर’
पहुँचा आते हो उसे वहाँ
…जहाँ से
लौट नहीं पाया कोई
आज तक।

✍️ चिराग़ जैन

विपक्षी

ग़ायब से हो गए हैं, अख़बार से विपक्षी
चुन-चुन के आ गए हैं, बेकार से विपक्षी
बचने लगे हैं क्यूंकर तकरार से विपक्षी
शायद मिले हुए हैं, सरकार से विपक्षी

✍️ चिराग़ जैन

संसद की कार्रवाई

हँस-हँस के कर रहे हैं, आपस में वो लड़ाई
हम जिनको सौंपते हैं ख़ुद अपनी रहनुमाई
लगता है हो रही है, भारत की जगहँसाई
टीवी पे चल रही है, संसद की कार्रवाई

✍️ चिराग़ जैन

अभिव्यक्ति

तुम्हारी अनुपस्थिति में
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!

अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।

और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।

और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!

✍️ चिराग़ जैन

परदेसी जीवन

1
ये है हासिल विदेश जाने का
ध्यान रखता हूं दाने-दाने का
कौन मुझको दुलारता आकर
फायदा क्या था कुलबुलाने का

2
जाने क्या बन के रह गया हूँ मैं
ध्यान रखता हूँ दाने-दाने का
घर कहीं, मैं कहीं, सुक़ून कहीं
ये है हासिल विदेश जाने का

✍️ चिराग़ जैन

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