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बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता

कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता

भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता

चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता

किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
✍️ चिराग़ जैन

लरजिश हमारे लहजे में

कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है
जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है

महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है
सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है

जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है
किसी तरह भी समझने से जो, समझ न आए, ख़ुदा वही है

शराब पीकर बहकने वालों को उस नशे की ख़बर नहीं है
वो उम्र भर फिर सँभल न पाया, रसूल की जिसने मय चखी है

नज़र में शोख़ी, ज़ुबां में नरमी, बदन में मस्ती, लबों पे सुर्ख़ी
ये हुस्ने-जाना है या ख़ुदा ने, कोई सरापा ग़ज़ल कही है

✍️ चिराग़ जैन

तेरी दुश्मनी भी क़माल है

न जहाँ में तेरा जवाब है, न नज़र में तेरी मिसाल है
तेरी दोस्ती भी क़माल थी, तेरी दुश्मनी भी क़माल है

क्या हसीन खेल है ज़िन्दगी, कभी ग़मज़दा, कभी ख़ुशनुमा
कभी एक उम्र का ग़म नहीं, कभी एक पल का मलाल है

मेरी सोच बदली तो साथ ही, मेरी ज़िन्दगी भी बदल गई
कभी मुझको उसका ख़याल था, कभी उसको मेरा ख़याल है

ज़रा ये बता दे कहाँ गईं, तेरी दोस्ती, तिरी उल्फ़तें
मुझे अपने ग़म से गरज़ नहीं, तेरी रहमतों का सवाल है

तेरी राह मुझसे बदल गई, कि ये वक़्त थोड़ा बदल गया
तब दूर जाना मुहाल था, अब साथ रहना मुहाल है

✍️ चिराग़ जैन

पाप

सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है

शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है

काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है

दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है

किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है

पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है

✍️ चिराग़ जैन

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

✍️ चिराग़ जैन

सीधे प्रसारण की तरह

जीत आए जब हर इक मुश्क़िल इलेक्शन की तरह
तब मिले हैं आप भी बाहरी समर्थन की तरह

अब तो फ़रमाइश भी बतलाते हैं ज्ञापन की तरह
हो गए बच्चे सभी धरने-प्रदर्शन की तरह

पहले हर रिश्ते पे मर्यादा का सेंसर बोर्ड था
आज सब कुछ चल रहा सीधे प्रसारण की तरह

झूठ ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनकर छा रहा है हर तरफ़
और सच ग़ायब हुआ है दूरदर्शन की तरह

अब तो बातों का न कोई आदि है ना अंत है
लोग बातें कर रहे हैं कालचिंतन की तरह

✍️ चिराग़ जैन

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