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मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा

मेरे अन्तर्मन की पावन-सी कुटिया में
मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा बसती है
उसकी ऑंखों से बहती हैं ग़ज़लें-नज्में
कविता होती है जब वो खुलकर हँसती है

हर भाषा, संस्कृति, काल, धर्म और धरती की
हर उपमा उस सौंदर्य हेतु बेमानी है
सारे नष्वर लौकिक प्रतिमानों से ऊपर
सुन्दरता की वो शब्तातीत कहानी है

वो पावनता की एक अनोखी उपमा है
ज्यों गंगाजल से सिंचित तुलसी की क्यारी
वो शबरी के बेरों से ज्यादा पावन है
मन झूम उठे उससे मिल, वो इतनी प्यारी

सारे छल-बल से दूर प्रपंचों से ऊपर
उसके लहजे में इक भोली चालाकी है
शब्दों में वेदऋचा सी पावन सच्चाई
और संवादों में मीठी-सी बेबाकी है

वात्सल्य, प्रेम, अपनत्व, समर्पण से भरकर
उसने मेरी जीवन वसुधा महकाई है
मीरा, राधा, रुक्मणि, यषोदा की मिश्रित
जैसे कान्हा ने मूरत एक बनाई है

दुनिया भर के बौने सम्बन्धों से ऊँचा
मेरा उससे इक अलग अनोखा नाता है
ये नाता इतना पावन, इतना निष्छल है
शृंगार इसे छूकर वन्दन हो जाता है

जब कभी नेह आपूरित नयनों से भरकर
वो छठे-चौमासे मुझको अपना कहती है
तो रोम-रोम खिल उठता है और कानों में
इस सम्बोधन की गूंज देर तक रहती है

वो है मेरी प्रेरणा; इसी कारण शायद
मेरी रचनाओं में वैभत्स्य नहीं मिलता
शृंगार, हास्य, वात्सल्य झलकते हैं लेकिन
फूहड़ता का कोई भी दृष्य नहीं मिलता

उसके जीवन से जीवन ऊर्जा हासिल कर
मैं दुनिया भर की पीड़ाएँ सह लेता हूँ
तूफानी संघर्षों की थकन मिटाने को
मैं कुछ पल इस गंगा तट पर रह लेता हूँ

जब सब थोथे ग्रंथों से मन भर जाता है
तो चुपके से उसका चेहरा पढ़ लेता हूँ
सुन्दरता की सब उपमाएँ जब बौनी हों
तो गीतों में उसकी प्रतिमा गढ़ लेता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

तुझको कुछ भी याद नहीं?

तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं
मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी
बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी
तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था
तूने मेरी यादों में रातों को जगना सीखा था
वो सारी बातें अब तेरे जीवन की सौगात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

फिल्मी गाने हम दोनों को आत्मकथा-से लगते थे
मेरे आँसू तुझको अपनी मौन व्यथा से लगते थे
इक-दूजे से आँख मिला हम बिन कारण मुस्काते थे
मिलने की उत्सुकता में जल्दी सोकर उठ जाते थे
अब बेचैनी से मन में उठते वो झंझावात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

बस की पिछली सीट पे बैठे हम घण्टों बतियाते थे
इक-दूजे के कंधे पर सिर रखकर हम सो जाते थे
मेरे मन की बातें तू बिन बोले ही सुन लेती थी
मेरी मुस्कानों के मतलब मन ही मन गुन लेती थी
क्या अब तेरे अंतस में वो मधुर प्रेम का राग नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

घर वालों के लिए रोज़ हम नए बहाने गढ़ते थे
इक-दूजे के पत्र किताबों में रख-रखकर पढ़ते थे
हम दोनों को साथ देखकर दुनिया ताने कसती थी
लोगों की बातें सुनकर तू हौले-हौले हँसती थी
सोचा करते थे, छोड़ेंगे इक-दूजे का साथ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

✍️ चिराग़ जैन

मिलन का क्षण

प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया

पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया

जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया

सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया

✍️ चिराग़ जैन

संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह प्रेम

चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है
वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है
एक अहसास से दिल महकने लगा
गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है

हम मिलें और मिलते रहें हर जनम
ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने
मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों
तन भले ही प्रदाता बने ना बने
बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें
लब हिलें ना हिलें ये अलग बात है

शब्द पावन हवन की महक से भरे
मुस्कुराहट में है यक्ष का अवतरण
आँख में झिलमिलाती चमक दीप की
अश्रु हैं दिव्य पंचामृती आचमन
नित्य श्रद्धा निवेदित करूँ मैं उन्हें
वर मिलें ना मिलें ये अलग बात है

✍️ चिराग़ जैन

अनर्गल

चाहता था भावनाओं में जकड़ लूँ आपको
आप आगे बढ़ चुके, कैसे पकड़ लूँ आपको
लेकिन निर्णय के पथ पर अनुरोध अनर्गल लगता है
जीवन की नदिया के मग में अवरोध अनर्गल लगता है

मेरे मन की पीड़ा, मन में ही घुट कर रह जाएगी
अरमानों की डोली राहों में लुट कर रह जाएगी
मैं यादों के ताजमहल में शासक बन कर रह लूंगा
स्मृतियाँ दिल में उफ़नीं तो आँसू बन कर बह लूंगा
तुम बिन मुझको जीवन का हर मोद अनर्गल लगता है

तुम भी कभी-कभी यादों की गलियों में खो जाओगे
मन के आंगन में यादों की फुलवारी बो जाओगे
मेरा मन भी बीते कल में लौट-लौट कर आएगा
और आँचल उड़-उड़ कर तुमको मेरी याद दिलाएगा
प्रेममग्न उन्मुक्त हृदय को बोध अनर्गल लगता है

मैं भी हूँ लाचार, तुम्हारी भी अपने मज़बूरी है
क्योंकि इस भौतिक दुनिया में, पूंजी बहुत ज़रूरी है
लेकिन इस दौलत के मद में नेह धनधनी मत खोना
सौम्य सुकोमल अंतस् और हँसने की आदत मत खोना
जीवन नीरस हो तो फिर हर शोध अनर्गल लगता है

✍️ चिराग़ जैन

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