Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘हुज़ूर पैदल चलते मजदूरों के लिए सरकारें क्या कर रही हैं?’
‘सरकारें मजदूरों की सहायता के लिए योजना बना रही हैं।’
‘लेकिन जब तक योजना बनेगी तब तक मजदूर कई योजन चल चुके होंगे।’
‘यह सब जनहित में किया जा रहा है। सरकारें जानती हैं कि मजदूरों का स्वस्थ रहना आवश्यक है। स्वस्थ रहने के लिए उचित पोषण की आवश्यकता होती है। मजदूर ड्राईफ्रूट खाएँ, दूध पीयें, फल-फ्रूट खाएँ, देसी घी के पराठें खाएँ ताकि उन्हें पोषण मिले। डॉक्टर कहते हैं कि इतना सब खाने के बाद उसे पचाने के लिए पैदल चलना चाहिए। इसलिए मजदूरों का पैदल चलना उनके हित में है।’
‘लेकिन हुजूर, मजदूरों को तो दो वक़्त की सूखी रोटी भी नसीब नहीं हो रही!’
‘ओफ्फो! यही समस्या है इस देश की। सब कुछ सरकार से चाहते हैं। अरे भाई, भोजन जुटाना जनता का काम है और उसे पचाना सरकारों का। सरकारें सिर्फ पचाना जानती हैं। जिसका जो काम है, उसे वही करने दो।’
‘हुज़ूर, लोग कह रहे हैं कि सरकार ने मजदूरों की सहायतार्थ बसें भेजने की प्रक्रिया में अड़ंगा लगाया है।’
‘यह सरासर ग़लत है। विपक्ष राजनीति करना चाहता है। वह ऑटो को बस बताकर जनता की आँखों में धूल झोंकना चाहता है। जब देश में एक चुनी हुई सरकार है, तो इस काम के लिए विपक्ष को मेहनत करने की क्या ज़रूरत है।’
‘लेकिन इन बसों से पैदल चलते मजदूरों को कुछ सहायता मिल सकती थी।’
‘देखो साहब! हमारा धर्म है कि सौ अपराधी छूट जाएँ लेकिन एक निर्दाेष को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। इसी प्रकार हज़ार बसें खड़ी रह जाएँ तो स्वीकार कर सकते हैं लेकिन बसों के नाम पर ऑटो रिक्शा भेजकर भोले-भाले मजदूरों को छलने के विपक्षी मनसूबों को हम कभी सफल नहीं होने देंगे।’
‘लेकिन हुज़ूर…’
‘अब बस करो यार, सवाल पर सवाल ही पूछे जा रहे हो। सवाल न हुए कोरोना हो गया, रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। जिन मजदूरों को कोई नहीं पूछता था, आज वे टीवी पर दिख रहे हैं, यह विकास दिखता ही नहीं आपको। और फिर लोग घर बैठकर बोर हो रहे हैं, ऐसे में इन मजदूरों को खुले आसमान के नीचे साँस लेने का अवसर मिल रहा है… और क्या चाहिए। जाइये, चुपचाप इंटरव्यू छापिए, और हाँ छपवाने से पहले हमें दिखा लेना, कहीं अपनी मर्ज़ी से कुछ सच वगैरा लिखकर जनता को गुमराह न कर दो।’
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कलाएँ, समाज की वन्दनवार हैं। ये इस्तेमाल की जाती हैं, समाज के उत्सवों को श्वास देने के लिए। ये काम आती हैं, समाज की उदासी में मुस्कान भरने के लिए। इन्हें निमंत्रित किया जाता है, समाज का सिंगार करने के लिए। लेकिन जब कोई आपदा आती है तब इन वन्दनवारों को कोई नहीं बचाता। किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि जिन तोरणद्वारों से आते-जाते शुभाशीष लिया है, उनका जीवन भी संकट में है।
वन्दनवार भागते-दौड़ते लोगों के माथे चूम-चूमकर अपने अस्तित्व की याद दिलाती हैं, आपदा से लड़ने के लिए भागते हुए समाज को आशीष देने का कर्तव्य निभाती रहती हैं। समाज को, यह मस्तक चूमकर आशीष देना, अखरने लगता है। वन्दनवार माथे चूम-चूमकर टूट जाती हैं और समाज इस जर्जर शुभकामना को छोड़कर स्वयं को सुरक्षित करने में व्यस्त हो जाता है।
आपातकाल व्यतीत करने के बाद, जब तक समाज लौटता है, तब तक उसके मंगल की कामना करते-करते वन्दनवार प्राण त्याग चुकी होती है।
समाज सामान्य होने लगता है और वन्दनवारों की नई पीढियाँ उनके द्वार-देहरियों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। इसी प्रक्रिया में कुछ वन्दनवारों के वंश समाप्त हो गए। कठपुतली, नौटंकी, तमाशा, क़व्वाली, नट और न जाने कितने वंश लुप्तप्रायः हैं।
सुना है, ‘सब कुछ सामान्य होने के बाद’ समाज इन वंशों के अवशेषों को महंगे दाम पर बेचता है। सुना है, कला की क़ीमत तब बढ़ती है, जब वह मर जाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक राजा, एक रानी
कुछ वज़ीरों की कहानी
चंद घोड़े, चंद हाथी
बस यही है राजधानी
ऊँट रस्ता तक रहे, चुपचाप भादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
कोई मजबूरी जताकर मार डालोगे हमें तुम
कल बिसातों पर मगर फिर से सजा लोगे हमें तुम
दाँव पहला, हर दफ़ा हम ही चलेंगे खेल में पर
हम घिरे तो खेल से बाहर निकलोगे हमें तुम
जानते हैं रंग हम सबके लबादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
हाँ, ज़माने के लिए तुम हर तरह हम से बड़े हो
पर हक़ीक़त में हमारी ओट में दुबके पड़े हो
जंग के मैदान में दोनों तरफ़ से घिर गए हम
सामने दुश्मन खड़ा है, और पीछे तुम खड़े हो
वार सहना है हमें सबके इरादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
भूलना मत, हम नहीं हैं अब तुम अपने आसरे हो
भूलना मत, जिस जगह हम थे, वहाँ अब तुम धरे हो
भूलना मत ढाल तुमको, बोझ लगने लग गई थी
हम तुम्हारे मोहरे थे, तुम किसी के मोहरे हो
अब दिखेगा नूर सारे शाहज़ादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
थम गया संसार सारा
हो रहा ओझल किनारा
साँस डर कर ले रहे हैं
विष घुला है हर नज़ारा
किन्तु हम ख़ुद को पुनः सुकरात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
मानते हैं, आदमी से भूल भारी हो रही थी
एक अंधी दौड़ की सब पर ख़ुमारी हो रही थी
इस हवस का अंत होगा, होड़ का अवसान होगा
फिर नई दुनिया बसेगी, फिर सृजन का गान होगा
खेत, वन सबका सही अनुपात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
देख लेना इस नए जग की सुरीली तान होगी
श्वास में विश्वास होगा, आँख में मुस्कान होगी
प्रेम का व्यवहार होगा, प्रीत का सत्कार होगा
फिर नए बिरवे उगेंगे, फिर नया संसार होगा
हर तरफ़ उल्लास को तैनात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
लोभ का प्रतिकार करना जानता हो, वो बचेगा
सत्य को स्वीकार करना जानता हो, वो बचेगा
जो बचेगा, वो मनुजता के लिए वरदान होगा
जो बचेगा, वो नए युग का नवल उत्थान होगा
साथ मिलकर फिर वही हालात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
धड़कनें इस बात की पहचान है, जीवन अमर है
ज़िन्दगी क्या है, शिराओं में लहू का वेग भर है
श्वास में संगीत होगा
धड़कनों में ताल होगी
तन समूचा स्वस्थ होगा
ज़िन्दगी ख़ुशहाल होगी
देह को उपचार में निष्णात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ससुरे दफ़्तर है गए बन्द
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड
देसी घी के परठाँ में भी कमी बताने वारे
साँझ-सबेरे लूखी रोटी चाब रहे बेचारे
भूल गए रबड़ी श्रीखण्ड
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड
आसपास की ग्वालिन के संग रास रचाना छूटा
कलियाँ सबरी ग़ायब है गई, भँवरे का दिल टूटा
कलियन को बन गौ गुलकंद
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड
बीड़ी भई पराई, दारू हुई पहुँच से दूर
सूख-सूख कर भए छुआरे, रस से भरे खजूर
सबका ठंडा हुआ घमंड
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
ऐसी दारी की आई बीमारी अबै, सब देस के आँगन-द्वार बंधे हैं
कौन गली भर्तार बंधे, काऊ खोह में सोलह सिंगार बंधे हैं
इत गाय के मौह पे छीको बंधो, उत खूटे पे दूर बिजार बंधे हैं
जमुना जी के पार फँसी बंसुरी, अरु ओंठ मुए इस पार बंधे हैं
✍️ चिराग़ जैन