Protected: रावण का अन्तर्द्वन्द्व
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परवानू से केबल कार में सवार होते ही रस्सियाँ हमें मोक्ष की ओर ले चलीं। मन आजकल अध्यात्म की यात्रा पर है, इसलिए ऐश्वर्य की वीथियों पर भी दृष्टि को दर्शन का योग मिल ही जाता है।
रूम चेक-इन करके बालकनी का दरवाज़ा खोला तो यकायक अपने आपको शिवालिक की पहाड़ियों से कुछ ऊँचा महसूस किया। सामने प्रकृति का विराट वैभव पसरा हुआ है। नीलाभ सौंदर्य के बीच श्वेत बादलों का अस्तित्व बड़े से कैनवास पर बेतरतीब किन्तु सार्थक ब्रश स्ट्रोक्स का आभास करा रहे हैं।
स्वयं को ऊंचाई पर देखकर अहंकार ने अंगड़ाई लेकर गर्दन ऊपर उठानी चाही ही थी, कि सूर्य की किरणों ने आँखों को छूकर सिर नीचा कर दिया।
मैं अपने बौनेपन से शर्मिंदा नहीं हुआ। बल्कि मन ही मन प्रकृति के गुरुत्व को प्रणाम किया।
अब हवाएं मेरे बालों में उंगलियां फिराती हुई मेरे साथ बालकनी में बैठी हैं। सामने एक प्याला चाय है। बादलों का अनवरत बदलता आकार कोई बिना स्क्रिप्ट का नाटक कर रहा है।
मैं ऊँची बालकनी में बैठकर विहंगम दृष्टि से विहंग विहार का सुख भोग रहा हूँ। सीढ़ीनुमा खेतों के बीच छिटकी हुई आबादी दिखाई दे रही है। एक सर्पिली सड़क एक पहाड़ को दूसरे पहाड़ से जोड़ती हुई सांप-सीढ़ी खेल रही है। दृष्टि एक क्षण में खेतों की सीढ़ियां चढ़ती है और दूसरे ही क्षण सड़क के घुमावदार फिसलाव पर फिसल जाती है।
सूरज की चमक अब शीतल होने लगी है। सामने अस्ताचल अपने यायावर का स्वागत करने को तैयार हो रहा है।
सन्नाटे में सुई की आवाज़ का तो नहीं पता लेकिन शांत मन में सांसों की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही है।
हवा की पालकी पर सवार अलग-अलग परिंदों के स्वर एक अलौकिक संगीत की सर्जना कर रहे हैं। तोतों और गौरैया के स्वर इस संगीत में अलग पहचाने जाते हैं।
एकाध टिटहरी और एक जंगली मुर्गा लगातार संगीत के बीच कुछ अलग राग अलाप रहे हैं।
और मैं एकांत में अपने अस्तित्व को भोग रहा हूँ!
हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
आधा मन लेकर विभीषण बनोगे
ज्यादा मन लेकर रावण बनोगे
सादा मन लेकर राम बन जाओगे
✍️ चिराग़ जैन
रावण घर में नहीं घुसता, वो सीता को ही बाहर बुलाता है।
✍️ चिराग़ जैन
महंगाई के लिए सरकार को कोसने का चलन पुराना हो गया। ज़रा सी महँगाई क्या बढ़ी कि राशन-पानी लेकर सरकार पर चढ़ गए। अब समय बदल रहा है।
अब ऐसी बातों पर लाइक और कमेंट नहीं आते। इसलिए कुछ अलग ढंग से सोचो। महँगाई के लिए सरकार को नहीं, विपक्ष को कोसो।
सरकार तो कब से कह ही रही थी कि ईंधन के दाम बढ़ने के कोई चांस नहीं हैं। ये विपक्षी नेता ही हैं जो बार-बार कहते थे कि वोटिंग ख़त्म होते ही दाम बढ़ जाएंगे।
कितनी बार कहा है, शुभ-शुभ बोला करो। चौबीस घंटे में एक बार जिह्वा पर सरस्वती बैठती है। अब ले लो मजे। हो गई ना ये मनहूस बात सच्ची!
सरकार का एक-एक मंत्री, एक-एक नुमाइंदा दिन-रात यही बात दोहराता रहा कि दाम नहीं बढ़ेंगे। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।
समझदारी इसी में है कि जो हो गया उसे स्वीकार कर लो। बीती ताहि बिसार के आगे की सुध लेय। अंतिम सत्य यही है कि दाम बढ़ चुके हैं। इतिहास गवाह है, बढ़े हुए दाम कभी कम नहीं होते। इसलिए रोना-पीटना करके कंगाली में आटा गीला मत करो, बल्कि इस बात में दिमाग़ लगाओ की इन बढ़े हुए दामों को चुकाना कैसे है।
विपक्ष आपको बरगलाने के लिए तैयार बैठा है। अरे भई, सिलेंडर महंगा हो गया तो क्या राजघाट पर जाकर डांस करोगे? किराये महंगे हो गए तो क्या बैलगाड़ी पर दफ्तर जाने का ड्रामा करेंगे? यह आचरण आपको शोभा नहीं देता।
ईश्वर ने क्या हमें खाने-पीने और घूमने-फिरने के लिए यह अनमोल मनुष्य जीवन दिया है। अरे भाई, इतनी सड़ी गर्मी में बाहर निकलोगे तो लू लग जाएगी। अपने घर में रहो। टीवी पर बढ़िया-बढ़िया मनोरंजक कार्यक्रम देखो।
अब आप रोना रोने लगो कि प्याज महंगी हो रही है। दरअसल ये सोच ही गलत है। विपक्ष चाहता है कि आप प्याज के दामों की तुलना प्याज के ही दाम से करें। ये भी कोई बात हुई।
प्याज का सदुपयोग करना आपको नहीं आता और कोस रहे हैं सरकार को। विपक्ष ने इतने साल तक आपको यही सिखाया कि प्याज दिखे तो उसे खा जाओ। प्याज कोई खाने की चीज है, अरे प्याज तो गर्मी के मौसम में जेब में रखकर घूमने की चीज है।
लेकिन विपक्ष ये बात आपको नहीं बताएगा, क्योंकि अगर आपने प्याज जेब में रखकर गर्मी का इलाज ढूँढ लिया तो हज़ारों रुपये के एसी कौन खरीदेगा।
विपक्ष तो है ही नकारात्मक। इसे सरकार के हर निर्णय में बुराई ही दिखती है। अरे भाई, कॉमर्शियल सिलेंडर महंगा करने से अब लोग घर का शुद्ध खाना खाएंगे। ये किसी को दिखाई नहीं देता।
घर की रोटी छोड़कर बाहर ढाबों में, होटलों में, ठेले पर लार गिराते फिरना कोई सभ्य लोगों का काम है। हाँ, कभी-कभार झालमुड़ी खा ली, कभी एकाध लिट्टी-चोखा खा लिया तो दस-बारह रुपये खर्च हो भी गए तो कौन सी आफ़त आ जाएगी।
‘रूखी-सूखी खाय के ठण्डा पानी पी’ -यही निरोगी जीवन का मूल सिद्धांत है। ऊटपटांग तला-भुना खाओगे तो बीमार पड़ जाओगे। बीमार पड़ोगे तो अस्पताल जाना पड़ेगा, दवाइयां खानी पड़ेंगी। फिर शोर मचाओगे, कि दवाएं महंगी हैं।
ऐसे कर्म ही क्यों करते हो कि तुम्हें दवाई खरीदनी पड़े। सरकार बेचारी कहाँ तक हथेली लगाएगी।
बस एक बात ध्यान रखो। महँगाई केवल एक भ्रम है। असली बात ये है कि विपक्ष आपको बीमार करना चाहता है, और सरकार आपको स्वस्थ रखना चाहती है।
✍️ चिराग़ जैन