मेहंदी
सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
…महकने लगा है भाग्य!
✍️ चिराग़ जैन
सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
…महकने लगा है भाग्य!
✍️ चिराग़ जैन
जिन्होंने यह कहना शुरू किया कि इस्लाम ख़तरे में है, उन्हीं के नुमाइंदों ने अफगानिस्तान पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। यूएनओ में स्थायी सदस्यता की डींगें हाँकनेवाले देशों के लिए यह शर्मिंदगी भरी लानत है। सबसे उम्दा हथियार बनानेवाले देशों के लिए यह डूब मरने की बात है। मानवाधिकार के नाम पर अन्य देशों की निजता में हस्तक्षेप करनेवाले चौधरियों के लिए यह निर्वस्त्र होने जैसा अनुभव है।
धार्मिक कट्टरता की ओट में सत्ता की गलियाँ तलाश रही बर्बरता का घिनौना चेहरा तालिबान की हरक़तों में साफ दिखाई दे रहा है। कट्टरता के खोल में छिपे ये लिजलिजे कीड़े अपने खोल की मज़बूती को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि अब ये पूरी मनुष्यता को चाटने की तैयारी में जुट गए हैं।
चूँकि वैचारिक स्तर पर विकसित होती मानवता इनके खोल के लिए सर्वाधिक हानिकारक है, इसलिए ज्यों ही कोई व्यक्ति इन्हें सोच के स्तर पर विकास करता दीख पड़ता है, ये तुरन्त बर्बर हो जाते हैं। मुस्कुराहट और ठहाके इनके आतंक पर सबसे बड़ा आघात हैं, इसलिए हँसानेवाले लोगों के विरुद्ध ये धर्म और संस्कृति के अपमान की निराधार दलीलें परोसने लगते हैं। उत्सव मनाते हुए लोग इन्हें अपने दहशती सम्मोहन से छूटते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए उत्सवों की हत्या के लिए ये बम फोड़ने लगते हैं। ज्यों ही मनुष्यता को यह एहसास होने लगता है कि वह इक्कीसवीं सदी में खड़ी है, ये तुरन्त उसे घसीटकर सोलहवीं शताब्दी में ले जाने की ज़िद्द करने लगते हैं। मनुष्यता मिल-जुलकर रहना चाहती है और बर्बरता उसे अलग-थलग कबीलों में बाँटने के लिए जी-जान लगाए बैठी है। लकड़ियों के गट्ठड़ को विभाजित करके उसे आसानी से तोड़ सकने की कला में बर्बरता माहिर है।
हमने इतिहास से सबक नहीं लिया तो आज वर्तमान हमें सिखा रहा है कि धार्मिक कट्टरता की ओट में पनपा एक तालिबान पूरी दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों की नपुंसकता पर से पर्दा हटा चुका है। यदि पूरी दुनिया के सारे देश मिलकर इस एक कबीले की जकड़ से अफगानिस्तान को मुक्त नहीं करा सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि अपने समाज को कट्टरता के दंश से मुक्त कराने के प्रयास तुरन्त प्रारम्भ कर दें ताकि इस तालिबानी फफूंद को अपने पैर पसारने का वातावरण न मिल सके।
और हाँ, गहरी श्वास लेकर सोचोगे तो समझ आएगा कि किसी भी धर्म को सबसे ज़्यादा नुक़सान उन्हीं लोगों से होता है जो उस धर्म के अनुयाइयों में यह बात प्रचारित करते हैं कि तुम्हारा धर्म ख़तरे में है।
✍️ चिराग़ जैन
कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन
अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा
✍️ चिराग़ जैन
प्रतिशोध एक अंतहीन प्रक्रिया है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, खानदान, राजनीति, विचारधारा, देश, समाज… इन सबका सौंदर्य और सुख प्रतिशोध की इस महाज्वाला में भस्म हुआ जाता है। देवासुर संग्राम से लेकर रामायण, महाभारत और चाणक्य ही नहीं, वरन प्रत्येक संस्कृति और समाज के पास प्रतिशोध की इस विकराल चिता में ज़िन्दा जली हुई ज़िन्दगी की भयावह दास्तान है।
राम, गौतम, महावीर, नानक, ईसा… इन सबने इसी प्रतिशोध के चक्र को गतिहीन करके निष्क्रोध होने के अलग-अलग मार्ग सुझाए। उन्होंने हमें दिखाना चाहा कि मनुष्य की मुस्कुराती हुई आँखों में सुख देखने का अभ्यास कर लो तो रक्तपात और परपीड़ा में आनन्द तलाशनेवालों का क़द छोटा होता चला जाएगा। उन्होंने हमें सिखाया कि घृणा फैलाकर कोई समाज सुखी न रह सकेगा। उन्होंने हमें बताया कि क्षमा को इतना विराट बना लो कि विद्रूपता उसके आकार को लांघने का साहस न कर सके। उन्होंने हमें बताया कि अपनी मनुष्यता को इतना प्रबल बना लो कि कोई अमानुष उसके संकल्प को विचलित न कर सके। उन्होंने हमें सुझाया कि अपनी आस्था को इतना पुष्ट कर लो कि अनास्था का कोई झंझावात उसे आहत न कर पाए।
लेकिन हम तो उल्टे चलने लगे। हमने अपने धर्म का आनन्द भोगने की बजाय दूसरे के धर्म को नष्ट करने में सारी ऊर्जा झोंक दी। हम अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय दूसरों की लकीरें मिटाने में जुट गए। हम क्षमा को ताक पर रखकर उद्दंडता के अखाड़े में दण्ड पेलने लगे।
हम घृणा को प्रेम से जीतने की बजाय, घृणा का उत्तर घृणा से देने पर उतारू हो गए। जिस क्षण हम अपने तरीके छोड़कर उसके तरीके से लड़ने लगे, बस उसी क्षण से हम पराजित हैं।
हमारी स्थिति उस विदुर की तरह है जो शकुनि के पासे बदलवाकर अब पछता रहा है। हम उन पांडवों की तरह हैं जो कौरव बनकर युद्ध जीत तो गए किन्तु उनके भीतर का पाण्डवत्व कुरुक्षेत्र में गिरनेवाला पहला शव बन गया।
हम कुरुक्षेत्र में प्रवेश करते समय केवल इतना भर संकल्प ले लें कि जब इस रण से बाहर निकलेंगे तो अपने भीतर के पाण्डवत्व को साथ लेकर लौटेंगे। हम अपनी क्षमा को बिसारकर उद्दंडता को सबक़ नहीं सिखाएंगे।
विश्वास कीजिये, यदि हम ऐसा कर पाए तो हमारे धर्मस्थलों में विद्यमान ग्रंथ जीवंत हो उठेंगे। फिर हमें हमारे महापुरुषों की वाणी का प्रचार करने के लिए लाउड स्पीकर नहीं लगाने पड़ेंगे। फिर हमारा आचरण ही हमारे धर्म का प्रतीक हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी
जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी
द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी
हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन