धैर्य
हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर
न धैर्य छोड़ो,
न धनुष;
हो सकता है
सूर्य गया हो
जयद्रथ को बुलाने!
✍️ चिराग़ जैन
हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर
न धैर्य छोड़ो,
न धनुष;
हो सकता है
सूर्य गया हो
जयद्रथ को बुलाने!
✍️ चिराग़ जैन
उन्नत शिक्षा हेतु समर्पित
इस धरती का अभिनंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
जननी-तनय सरीखे ही हैं, आवश्यकता-आविष्कार
अनुभव का अवलंबन थामे बढ़ता अधुनातन आचार
भौतिकता के चक्र, कल्पना-अश्व, साधना का स्यंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
ज्ञान वही, जो मानवता हित सज्जन का निर्माण करे
शोध वही, जो जन-जन के हित सुविधा अनुसंधान करे
शिक्षा वह, जिससे बन पाये, सरल, सुगम, सुंदर जीवन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
अर्जित कर, संरक्षित करना और प्रसारित करना ज्ञान
यही स्वप्न है, यही सोच है, यही हमारा लक्ष्य प्रधान
ऊर्जा के मस्तक पर चंदन तिलक लगाता अनुशासन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
अलख तरंगों को लिखते हैं, अकथ स्वरों को सुनते हैं
प्राणहीन यंत्रों को समझें, हर स्पन्दन को गुनते हैं
एक साथ साधे हैं हमने जड़, चेतन और अवचेतन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
उद्यमस्य सम किमपि न भवति, कर-कर इसी मंत्र का ध्यान
सुकर बनाकर सुगम सूचना, स्वप्न लिए जग का कल्याण
अभिनव शिक्षा, अभिनव जीवन, अभिनव दर्शन, अभिनव मन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
संस्कृति की समृद्धि हमारी पृष्ठभूमि का तत्व प्रधान
मानव निर्मित बुद्धि, प्राकृतिक भाषा का करते संधान
आगत का स्वागत करते हैं और अतीत का आराधन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
विश्वामित्री के तट पर वट की नगरी है सुन्दरतम
शिक्षा के नित-नूतन-नय को करती है यह हृदयंगम
संस्कृति और विज्ञान यहाँ करते दिखते हैं आलिंगन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
✍️ चिराग़ जैन
जब 25वां साल चढ़ा
तब अपना भी पेट बढ़ा
जो खाता, वो लगता था
प्रतिदिन पेट निकलता था
लड़कीवाले आते थे
तोंद देख भग जाते थे
इक दिन इक लड़की के घर
जा पहुँचा रिश्ता लेकर
साँस खींचकर बैठा था
पेट भींचकर बैठा था
बटन काज में अटका था
दिल में हर पल खटका था
तभी अचानक वो आईं
मुझे देखकर मुस्काई
प्रणय भाव में उछल गया
दायित्वों को कुचल गया
पेट ख़ुशी से फूल गया
सारी सीमा भूल गया
बटन बेचारा हार गया
पेट शर्ट के पार गया
सपनों का संसार धुला
कहाँ तीसरा नेत्र खुला
निकला तीर कमान दिखी
भीतर की बनियान दिखी
जैसे-तैसे ब्याह हुआ
फिर मैं बेपरवाह हुआ
टायर का आकार बढ़ा
पूरा गोलाकार बढ़ा
कटि बढ़कर कटिहार हुई
हर इक सीमा पार हुई
पत्नी ने कुछ फील किया
मुझे प्यार से डील किया
तुम तो शोना-बाबू हो
खाने में बेकाबू हो
चाट पकौड़ी भाती है
ज़रा शर्म नहीं आती है
मटके जैसा पेट लिए
ख़ुद को इन्डिया गेट किए
ठुमक-ठुमककर चलते हो
स्मार्टनेस को खलते हो
थोड़ा तो कंट्रोल करो
अब मत टाल-मटोल करो
सेहत का अपमान है तोंद
बीमारी का भान है तोंद
बॉडी से मिसमैच है तोंद
भोंदूपन का बैज है तोंद
कुंभकर्ण की फ्रेंड है तोंद
आलसियों का ट्रेंड है तोंद
कितना बैड रिजल्ट है तोंद
इक सोशल इंसल्ट है तोंद
ये सब सुनकर नाड़ झुकी
नाड़ झुकी तो तोंद दिखी
फटने को था गुब्बारा
मैंने ख़ुद को धिक्कारा
लानत है इस जीवन पर
कुछ कंट्रोल नहीं मन पर
खूब समोसे खाता है
पुचके पर ललचाता है
सीधी रेखा चाप हुई
शेप बिगड़कर शाप हुई
खुद को कुछ इस्ट्राँग किया
मैंने इक संकल्प लिया
तला-भुना सब छोड़ूंगा
मीठे से मुँह मोड़ूंगा
काम अजायब कर दूंगा
चर्बी ग़ायब कर दूंगा
चटखारे बिसरा दूंगा
ये ब्रह्मांड हिला दूंगा
ऐसा भीषण प्रण करके
कुछ संयम धारण करके
मैं घर से बाहर निकला
नुक्कड़ पर ही दिल पिघला
दृष्टि भूल से छली गई
तभी जलेबी तली गई
मुँह में पानी भर आया
बहुत तरस ख़ुद पर आया
तन और मन में ठन आई
ठीक सामने हलवाई
गरम जलेबी तलता था
मन उस ओर मचलता था
रस की भरी करारी थी
छोटी प्यारी-प्यारी थी
क्या बतलाऊं कैसी थी
ठीक मेनका जैसी थी
कठिन तपस्या भंग हुई
भीष्म प्रतिज्ञा तंग हुई
जब कंट्रोल न हो पाया
तब ख़ुद को यूँ समझाया
कल से नियम निभाऊंगा
आज जलेबी खाऊंगा
कई दिनों तक ट्राई किया
एक अर्थ-स्काई किया
कोई मन्तर नहीं चला
रोज़ किसी ने मुझे छला
कभी भठूरे-छोले ने
कभी बर्फ के गोले ने
गर्मागर्म समोसे ने
कभी मसाले डोसे ने
आलू, चाट, पकौड़ी ने
भजिया, पाव, कचौड़ी ने
केसर चढ़ी इमरती ने
भोजन भूषित धरती ने
तप में नित व्यवधान किया
नियमों का अपमान किया
पूरा जग रसवान दिखा
हर पदार्थ पकवान दिखा
झरने कलकल करते थे
शर्बत बनकर झरते थे
पर्वत जी का जाल लगे
वर्क सुसज्जित थाल लगे
किचन सूंघकर आती थी
पुरवा भूख बढ़ाती थी
पेड़ सुना, पेड़ा सूझा
गेंदे को लड्डू बूझा
सुबह-सुबह प्रण लेता था
शाम तलक तज देता था
लेकिन इक दिन मैं जीता
लार गटककर दिन बीता
पूरा दिन रुक पाने में
डाइट चार्ट निभाने में
बस थोड़ी-सी दूरी थी
मगर प्लेट में पूरी थी
पुनः प्रतिज्ञा छली गई
पूर्ण उदर में चली गई
इक दिन मुझको ज्ञान हुआ
भोजन का सम्मान हुआ
बेर राम को भाते हैं
कान्हा माखन खाते हैं
जो ईश्वर को भाता है
वह प्रसाद बन जाता है
फिर विचार कुछ करना क्या
तोंद-वोंद से डरना क्या
वही तोंद से बचता है
जिसको घी नहीं पचता है
लोग भसककर खाते हैं
तोंद उगा नहीं पाते हैं
नींद भूख जब पूर्ण मिलें
सुख के स्वर्णिम पुष्प खिलें
तब कुछ तोंद निकलती है
क्यों दुनिया को खलती है
तोंद बढ़ाना खेल नहीं
भूख-पेट का मेल नहीं
पतला खाना खाता है
मोटों के सिर आता है
तोंद उसी के लगती है
जिसको लक्ष्मी फबती है
गणपति की पहचान है तोंद
ईश्वर का एहसान है तोंद
वैभव का वरदान है तोंद
सेठों का अभिमान है तोंद
सबके ताने सहती है
फिर भी आगे रहती है
कृत्रिम होना ठीक नहीं
तोंद गिफ्ट है, भीख नहीं
नेचर का सत्कार करो
बस ख़ुद को स्वीकार करो
✍️ चिराग़ जैन
हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है।
सामने आ गए आज फिर हम
आज फिर से संभलना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ
काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ
चल न आना मेरी ओर सब भूलकर
बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ
नेह को कब दिखी कोई सीमा
देह को ही समझना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
उस घड़ी किस तरह से जिया जाएगा
तुमको परिचय हमारा दिया जाएगा
साँस की चाल कैसे रहेगी सहज
होंठ को किस तरह से सिया जाएगा
जब संभाले न संभलेंगे आँसू
उस घड़ी खूब हँसना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
अपनी चाहत से नज़रें चुराते हुए
जी रहे थे स्वयं को भुलाते हुए
भाग्य, जिसने हमें तब अलग कर दिया
आज हिचका न हमको मिलाते हुए
तब बिछड़कर सिसकते थे हम-तुम
आज मिलकर सिहरना पड़ेगा
✍️ चिराग़ जैन
अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते।
राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने की प्रवृत्ति हमें संस्कृति ही नहीं, अपितु शहीदों के अपमान की भी आदत डाल देगी।
जिनकी लेखनी पर हिन्दी का साहित्य अभिमान कर सकता है उन मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के ‘गबन’, ‘क़फ़न’ तथा ‘ईदगाह’ जैसे शीर्षक आपकी घृणा से मिटाए नहीं जा सकेंगे।
संस्कृति और लोगों के दिलों से उर्दू को ग़ायब करने का सपना देखने वालों को पहले न्यायपालिका से उर्दू की शब्दावली हटाने का प्रयास करना होगा। और न्यायपालिका भी छोड़िए साहिब, अपनी ख़ुद की बोलचाल से जिस दिन उर्दू को ग़ायब कर दो, उस दिन उर्दू के मुँह पर कालिख पोतने का दुस्साहस करना।
आप घृणा उलीचकर एकाध क्यारी ध्वस्त कर सकते हो लेकिन भाषाई सौहार्द के बगीचे को ध्वंस नहीं कर सकते। क्योंकि उर्दू ‘हिन्दी’ के नाम में सुरक्षित है। आपकी कड़वाहट उर्दू की मिठास पर कभी हावी नहीं हो सकेगी, क्योंकि उर्दू हमारे थानों में संरक्षित है, उर्दू हमारी अदालतों में सुरक्षित है। आप उर्दू का नाम नहीं मिटा पाएंगे, क्योंकि उर्दू वीर शिरोमणि सिख गुरुओं के नाम में है। आप कभी भी उर्दू को हमारे देश से दूर नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उर्दू के बाबा ‘शेख फ़रीद’ की कविताओं को हमने ‘सबद’ कहकर गाया है।
उर्दू को पराया कहना ठीक ऐसा ही है ज्यों कोई अपने घर में जन्मी बिटिया को ‘पराया’ कहकर तिरस्कृत करे। उर्दू को मिटाना है तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस से ‘जय हिंद’ का उद्घोष छीनकर दिखाओ। उर्दू से घृणा करनी है तो ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ जैसे तरानों से घृणा करो। उर्दू को उखाड़ना है तो क्रांतिकारियों के दिलों में बसे ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे को उखाड़ने की कोशिश करो। उर्दू को मिटाना है तो चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से ‘आज़ाद’ उपनाम को मिटाने का जतन करो।
छोड़िए साहिब, राजनीति चंद वोटों के लिए घृणा का तेज़ाब छिड़कने से नहीं रुकेगी और ये देश हमें सिखाता रहेगा कि राम ने रावण की लंका में रहनेवाले विभीषण से भी परहेज नहीं किया। लंका के वैद्य से अपने भाई का इलाज करवाने में भी संदेह नहीं किया। लंका की ओर से लड़नेवाले इन्द्रजीत तक के शव का अपमान नहीं होने दिया। यह राम का देश है साहिब, यहाँ जूठे बेर भी सानन्द ग्रहण किये जाते हैं, यहाँ घृणा का कारवां बहुत दूर तक नहीं चल सकता।
✍️ चिराग़ जैन