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विचार और मूर्त

दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है
हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है
कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो
जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है

सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते
युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते
अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है
वो ध्यान से खिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

अन्तस् में हो गया जब, विश्वास का उजाला
अमृत बना दिया था, मीरा ने विष का प्याला
वरदान में न रखना, संकोच और शंका
विश्वास से मिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

ये स्वर्ग-नर्क की सब, चर्चा उधार की है
जिस पर जहाँ टिका है, ताक़त विचार की है
मस्तिष्क में उपज कर, जो सोच में पला है
सच में वही घटेगा, ये सृष्टि का नियम है

✍️ चिराग़ जैन

अपनेपन का स्वांग

यूं तो सारी राहें मैंने सोच समझ कर चुन रखी थीं
चंद मुश्क़िलें अपनेपन का स्वांग रचाकर साथ आ गईं

पथ में कोई वबेला कब था
राही भला अकेला कब था
किसको, कब, क्या कहना होगा
-इन प्रश्नों का रेला कब था
किस बीहड़ में, किस पोखर पर, कितना पानी, कब पीना है
इन सारे प्रश्नों की चिंता आंख बचाकर साथ आ गई

जीवन में संत्रास न होता
पीड़ा का एहसास न होता
राहों से भी बातें करते
मंज़िल का ही पास न होता
इसकी ख़ातिर ये करना है, उसकी ख़ातिर वो करना है
कई योजनाएँ ऐसी ही, नेह बढ़ाकर साथ आ गई

केवल श्वास ज़रूरी रहती
और न कुछ मजबूरी रहती
दुनिया वाले क्या सोचेंगे
-इन प्रश्नों से दूरी रहती
इस दुनिया की जो परिपाटी, हम दुनिया को दे आए थे
वो परिपाटी भी दुनिया से, हाथ छुड़ाकर साथ आ गई

✍️ चिराग़ जैन

नेह का दर्प

प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते
काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते

जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें
जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें
क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में
कौन सा अधिकार था उनकी तहों में
काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते

जब किसी घटना से आहत हो गया मन
जब क्षणिक आवेश में रत हो गया मन
जब मेरे मन में घना विक्षोभ जागा
जब मेरी वाणी ने तुम पर क्रोध दागा
काश मेरे नेह का तुम दर्प सह पाते

✍️ चिराग़ जैन

पूजा के हक़दार

जिस डाली का काटा जाना आज अखर जाता है तुमको
उस डाली के कटने से ही कल को तुम फलदार बनोगे
जिस छैनी के छूने भर से चीख़ निकलती है पत्थर की
उस छैनी की चोटों से तुम पूजा के हक़दार बनोगे

अनुभव के दो हाथ समूचे माटी-माटी सन जाएंगे
तब जाकर मिट्टी के ढेले को किंचित आकार मिलेगा
मिट्टी से पहले हाथों की भाग्य लकीरें घिस जाएंगी
तब बर्तन कहला पाने का मिट्टी को अधिकार मिलेगा
जिन जलते शोलों से तन-मन सब कुछ झुलसेगा भीतर तक
उनके कारण ही तुम प्यासे ओंठों पर बौछार बनोगे

गंगा बनकर पुजना है तो, गोमुख से झरना ही होगा
बूंदों को बारिश बनना है, बादल को मरना ही होगा
रामशरण स्वीकार नहीं हो, और मुक्ति की इच्छा हो तो
कंचन मृग का स्वांग रचा कर, सीता को हरना ही होगा
अपने सारे सुख को अपने हाथों वनवासी कर दोगे
तब सम्भव है तुम जीते जी धरती पर अवतार बनोगे

✍️ चिराग़ जैन

इश्क़ की महफ़िल

दुनिया को भूल जाओ
ये इश्क़ की महफ़िल है
आओ हुज़ूर आओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

जो होश में हैं उनको
दुनिया के ग़म मुबारक़
हुमको तो तुम मुबारक़
तुमको तो हम मुबारक़
हाथों में जाम उठाओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

दिल की सुनो घड़ी भर
लोगों की फ़िक्र छोड़ो
अपनों की बात सुन लो
औरों का ज़िक्र छोड़ो
ख़ुद के क़रीब आओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी की शिक़ायत

उम्र भर मौत से भागते जो रहे
मौत आई तो बस मौत के हो गए
मेरे हर रोम में अपना अहसास भर
एक पल में पिया सौत के हो गए

एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया
एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया
मौत को देखकर तुम पिघल से गए
और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया
मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया?
या सफल मौत के टोटके हो गए?

मौत ने कौन सा रस पिलाया कि फिर
ज़िन्दगी की तुम्हें याद आई नहीं
हाल तक पूछने की न कोशिश हुई
इतनी भी दुनियादारी निभाई नहीं
पीढ़ियाँ तुमको थाली चढ़ाती रही
और तुम मौत के गोत के हो गए

✍️ चिराग़ जैन

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