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ऋतुराज आया है

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं
फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं
श्वास में सरगम सजाता साज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है
प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है
पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है
वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है
ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है
कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है
ठूठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो
बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है
दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है
प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है
ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयां लेने लगी है
श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है
मोतियों के थाल में पुखराज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

✍️ चिराग़ जैन

स्वीकार

पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
अधखुली-सी इक कली धीरज गँवाकर
पुष्प से प्रतियोगिता पर अड़ गई है

पंखुरी दर पंखुरी खिलना उचित है
डाल ने दिन-रात समझाया कली को
गंध निश्चित ही बिखरनी है हवा में
कौन-सी जल्दी पड़ी है बावली को
होड़ तज कर गंध को सींचो हृदय में
जो बसी भीतर, वही बाहर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

जब तलक संघर्ष है, जीवन तभी तक
राह की कठिनाइयों का मान करना
घुल गया मकरंद जिसका भी हवा में
उस कुसुम के धैर्य का सम्मान करना
साधना पथ पर नहीं विचलित हुआ जो
ख्याति उस इंसान की घर-घर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

मंद बहकर ही नदी सरगम बनेगी
वेग तो तटबंध को ही तोड़ देगा
रूह को महकाएँगी मंथर हवाएँ
और अंधड़ देह को झकझोर देगा
जो नियति की चाल से आगे बढ़ी है
वह कली अल्पायु में ही झर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

ताप सहकर ही बनेगी वज्र, माटी
फिर भला दहती लपट से रूठना क्या
कर्म का अधिकार ही हमको मिला है
स्वप्न की फिर सर्जना क्या, टूटना क्या
हठ पकड़ बैठा कोई जब भी नियति से
भाग्य की त्यौरी उसी क्षण चढ़ गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा की गली

प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी

जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी

उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी

✍️ चिराग़ जैन

उस पल मुझको रोना आया

जब तुम चल दी राह बदल के
दो आँसू ना आँख से छलके
जब मैंने घर वापस आकर, ख़ुद घर का दरवाज़ा खोला
घर के भीतर घर ग़ायब है, ये घर का हर कोना बोला
जब तुमको आवाज़ लगाई
और न कोई उत्तर पाया

उस पल मुझको रोना आया
यादों के सौन्धे बिस्तर पर, मैं बिल्कुल एकाकी सोया
तब समझा, मैंने क्या खोया, तब मैं फफक-फफक कर रोया
पीठ दुखी तो बाम उठाकर
मेरा हाथ लेप ना पाया
उस पल मुझको रोना आया

जब मैंने अपना बोझा ख़ुद अपने ही कंधों पर ढोया
टूटा बटन लगाने को जब ख़ुद सूईं में धागा पोया
सुबह-सुबह भागादौड़ी में
बटुआ साथ नहीं ले पाया
उस पल मुझको रोना आया

देर रात घर वापिस आकर, जब-जब मैंने खाना खाया
फ्रिज से निकली दाल गर्म करने में मुझको आलस आया
जब भोजन के बाद किसी ने
जूठा बर्तन नहीं उठाया
उस पल मुझको रोना आया

जब इस जीवन से उकताकर, मरने की इच्छा हो आई
कहीं किसी ने आँखें पढ़कर मेरी थकन नहीं सहलाई
‘मरें तुम्हारे दुश्मन’ कहकर
मुझको ढांढस नहीं बंधाया
उस पल मुझको रोना आया

✍️ चिराग़ जैन

प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

नियति

रोज़ नया अनुभव जुड़ता है
रोज़ उमर घटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

जब यह तय है कुछ दिन पीछे हम सबको निश्चित मरना है
फिर इतने सारे अनुभव का आख़िर हमको क्या करना है
बिन मतलब के अनुभव से ही
निश्छलता छँटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

सागर युग-युग तक गरजेगा, लहरें आएंगी-जाएंगी
कुछ सागर तट को चूमेंगी, कुछ पहले ही मिट जाएंगी
लहर नियत सीमा तक बढ़कर
ख़ुद पीछे हटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

श्रम में जीवन बीत गया तो, कब तन को विश्राम मिलेगा
काया केवल कष्ट सहेगी, और चेतन को राम मिलेगा
जो पाया उसको बिसराकर
दुनिया क्या रटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

✍️ चिराग़ जैन

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