Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सागर खारा, नदिया सूखी
ताल-तलैया में कीचड़ था
लेकिन प्यास नहीं बुझने का,
हर आरोप ओक ने झेला
पेट अन्न को तरस रहा था
और शिरा में रक्त नहीं था
प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी
आलिंगन का वक़्त नहीं था
चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी
पर फिर भी बंध्या जीवन का, सारा दंश कोख़ ने झेला
मुस्कानों में आडम्बर थे
उत्सव थे कोरी मजबूरी
हवन बिना मन के होते थे
और अर्चना रही अधूरी
श्रम ने भाग्य भरोसे रहकर, कोशिश का अपमान किया था
लेकिन फिर भी अपशकुनों का, सारा दोष शोक ने झेला
इन्द्रासन, त्रैलोक्य, अमरता
शस्त्रों का संधान दे दिया
मंशा की अनदेखी करके
सबको ही वरदान दे दिया
निशदिन कठिन साधना करके, असुरों ने वरदान जुटाए
फिर इन सारे वरदानों का, हर अभिशाप लोक ने झेला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उथल-पुथल सी मची हुई है
हल जीवन को रौंद रहा है
शायद ईश्वर की आँखों में
फिर से सावन कौंध रहा है
जितना ज़्यादा जोता जाए,
उतना सृजन निराला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
मिट्टी के कण-कण को निर्मम, दो बैलों के खुर कूटेंगे
फाल निरंतर चोट करेगी, परतों के तन-मन टूटेंगे
जिनमें फलने की इच्छा हो, उन बीजों को गड़ना होगा
तब इस धरती के दामन में आशा के अंकुर फूटेंगे
माटी का तन सीला होगा,
धरती का मुँह काला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
दिन भर अम्बर आग उगलता, तब आती है शाम सलोनी
फिर सूरज के छिप जाने को, हम कह देते हैं अनहोनी
लेकिन ऐसी हर अनहोनी केवल आँखों का धोखा है
दिन से किस दिन रात रुकी है, रातों ने कब दिन रोका है
कुछ पल रात बितानी होगी,
फिर भरपूर उजाला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए
न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
गारा गूँदो, चाक चलाओ
चाहे मिट्टी में सन जाओ
पर जिस दिन वह रूप धरेगी, जब वह एक सुराही होगी
उस दिन उसको छू लेने की तुमको सख़्त मनाही होगी
जब उसके भीतर का पानी जग की प्यास बुझाता होगा
जब हर आता जाता उसकी तारीफ़ें कर जाता होगा
तब उसको पछतावा होगा
उसके मन में लावा होगा
जिसने भट्ठी में सुलगाया
उसके ऊपर धावा होगा
जब उसकी मनचाही होगी, तनिक नहीं कोताही होगी
तुम पर निर्णय दुनिया देगी, उसकी सिर्फ़ गवाही होगी
तुम मत याद दिलाना उसको सौंपा है आकार तुम्हीं ने
उसके कोमल कच्चेपन को थामा है हर बार तुम्हीं ने
तब वह यही समझती होगी
निश्चित ही मैं सागर होती
हाथ तुम्हारा ना लगता तो
मैं अब से कुछ बेहतर होती
जब उसकी वाहवाही होगी, तब कुछ लापरवाही होगी
तब तुम उसकी फ़िक्र करोगे, तो वह तानाशाही होगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ओ ईश्वर कहलानेवाले
सारा विश्व बनानेवाले
क़िस्मत के पर्दे में छुपकर
सारा खेल रचानेवाले
अपना नाटक ख़ुद ही खेले मानव को इतना अवसर दे!
कर पाए, तो इतना कर दे!
तेरी मर्ज़ी होती है तो हम इस धरती पर आते हैं
तेरी मर्ज़ी से जीते हैं, तू कहता है, मर जाते हैं
तेरे हाथों की कठपुतली
जैसे चाहा वैसे उछली
पल भर को ढीली भी कर दे
हर इक कठपुतली की सुतली
एक दफ़ा पुतलों की डोरी, पुतलों के हाथों में धर दे
कर पाए, तो इतना कर दे!
सुनते हैं तूने ही सारी दुनिया को वरदान दिए हैं
कहने को इक जीभ बनाई, सुनने को दो कान दिए हैं
आवाज़ें सुंदरतम भर दीं
साँसों तक में सरगम भर दी
हर ख़ामोशी के ज़ख़्मों में
तूने सुर की मरहम भर दी
जो मन में ताण्डव करते हैं, उन शब्दों को भी तो स्वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
हो सकता है ऐसा हो तो, हम जीवन को दुःख से भर लें
हो सकता है यह सब कुछ हम शायद तुझसे बेहतर कर लें
या तो मन से जी लेने दे
या फिर मन से मर लेने दे
जो होगा देखा जाएगा
हमको मन की कर लेने दे
सुख-दुख जो भी हो, वो होगा खुद हासिल करने का वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
✍️ चिराग़ जैन