Chirag Jain Writings, Jainism, Poetry
प्रश्न उठा है जैन धर्म के संत नग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जग में रहकर आत्ममग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जैन धर्म में बिल्कुल ढील नहीं है क्या
सभ्य जगत् में नग्न विचरना; ये अश्लील नहीं है क्या
सच समझे बिन बकबक करना, थोथा मान तुम्हारा है
त्याग वेश पर नाक चढ़ाना ये अज्ञान तुम्हारा है
काम अगर सर चढ़ जाए तो जीव व्यथित हो जाता है
मन भीतर से निश्छल हो तो त्याग घटित हो जाता है
वस्त्र त्यागना क्या कोई करतब फ़िल्मी हीरो का है
काम विजित कर नग्न विचरना; ये टेवा वीरों का है
शुद्ध आचरण की बातें, अभिमानी नहीं सुनी तुमने
संतों का बस बाना देखा, बानी नहीं सुनी तुमने
चखने वाले ने जूठे बेरों में मीठा प्रेम चखा
जिसके मन में जो मूरत थी उसने वैसा रूप लखा
सच बतलाओ, बचपन में जब नंगे डोला करते थे
तब भी क्या तुम ऐसी ओछी भाषा बोला करते थे
बचपन में हर नारी तुमको क्या केवल तन लगती थी
माँ का दूध पिया तब भी क्या कामवासना जगती थी
कह सकते हो तब तुमको इन बातों का आभास न था
कह सकते हो तब अन्तस् में कोई कामविलास न था
मन का पाप उजागर ना हो इस हित साधन जोड़ लिए
जब मन में कालिख आई तो उजले कपडे ओढ़ लिए
तुमको भय है काम भावना पर तुम पार न पाओगे
मन में पाप उठेगा तो तुम उसे मार ना पाओगे
लेकिन नग्न विचरने वाले संतों को ये फ़िक्र नहीं
धर्मध्यान से सिक्त ह्रदय में, काम-पाप का ज़िक्र नहीं
आत्मसाधना में बाधक अभिशाप भस्म हो जाएगा
तप की ज्वाला में जलकर हर पाप भस्म हो जाएगा
तुम क्या जानो जैन धर्म का क्या इतिहास सुनहरा है
तुम क्या समझो पंचेद्रियों पर धर्मध्यान का पहरा है
केशलोच पर वो बोले जो खुद को नोच नहीं सकते
कितनी कठिन तपश्चर्या है, तुम ये सोच नहीं सकते
हम वो नहीं जिन्होंने केवल धन वैभव ही जोड़ा है
हम उनके वंशज हैं जिनने जीत-जीत कर छोड़ा है
तोरण पर पशुकष्ट देखकर हममें करुणा जागी है
हमने चक्रवर्ती की सब संपत्ति जीत कर त्यागी है
जैन धर्म का साधक केवल क्षमा सुधा ही पीता है
हमने कमठ सरीखा दानव आचरणों से जीता है
हमको अपने मुनिराजों से क्षमाधर्म का ज्ञान मिला
हमें कठिन उपसर्ग समय में संयम का वरदान मिला
हम हिंसक हो जाते तो तुम इतना बोल नहीं पाते
हम बदला लेने लगते तो मुंह तक खोल नहीं पाते
हम भी तुमको गाली दें तो तुम जैसे हो जाएंगे
हम तुम जैसे होकर अपने कुल को नहीं लजायेंगे
तुम इक बार विचारो फिर से अहंकार ही चूका है
उसका चेहरा घृणित हो गया, जिसने नभ पर थूका है
हाथी निकला, श्वान बौराये; कहो लफंगा कौन हुआ
दर्पण में जाकर तो देखो सचमुच नंगा कौन हुआ
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Jainism, Poetry
चलो बताएं आज तुम्हें वैज्ञानिक धर्म हमारा है
क्या हैं व्रत उपवास और क्या नियम त्याग संथारा है
हमें फर्क पड़ता है छोटी चींटी तक की पीर से
हमें अहिंसा मिली विरासत में भगवन् महावीर से
वृक्षों में जीवन होता है; अब ढूंढा विज्ञान ने
हमें बताया युगों पूर्व ये ऋषभदेव भगवान् ने
हमें लैंस की नहीं ज़रूरत जल के जीव बांचने को
हमें मिले हैं गुणस्थान अन्तस् का ताप जांचने को
शाकाहारी जीवन शैली, परहित का उपदेश मिला
हमें हमारे पुरखों से मानवता का सन्देश मिला
श्रावक श्रमण व्यवस्था वाला इक समाज विज्ञान मिला
जियो और जीने दो जैसा अद्भुत अविरल ज्ञान मिला
परिग्रह को जब पाप कहा तो साम्यवाद को नींव मिली
क्षमाभाव सर्वोपरि रक्खा; प्रेम-प्यार को जीभ मिली
हमने राणा के प्रताप को दानी भामाशाह दिए
जो अणुव्रत की नाव चलाएं तुलसी से मल्लाह दिए
हमने भारत के गौरव को चन्द्रगुप्त का मान दिया
बिम्बिसार, संप्राति, भोज और वीर अशोक महान दिया
हमने दिव्य प्रकाश पुंज; जब जब अंधियारी छाई; दिए
हमने अंतरिक्ष को भेदा विक्रम साराभाई दिए
जो हिंसा के घोर विरोधी, जन-गण के उन्नायक थे
वो बाबा गांधी भी तो इस जैन धर्म के गायक थे
अर्थमार्ग और मोक्षमार्ग का इक समतल आभास दिया
हमने अपनी भारत माँ को गौरवमयी इतिहास दिया
किसी जीव को नहीं सताएँ ये पावन संकल्प लिया
तर्कहीन धर्मांध न होवें ऐसा शास्त्र प्रकल्प लिया
जो मानवता की द्योतक है, मानव मन तक फैली है
वही अहिंसा जैनधर्म की मौलिक जीवन शैली है
लखनऊ में महावीर की प्रतिमा टूटी तब क्यों मौन रहे
वोटों की मंडी में सत्तर लाख की पीड़ा कौन कहे
भीतर माल ठूंस कर बाहर दाँत दिखाने बंद करो
मानवता की चिंता है तो बूचड़खाने बंद करो
हमने सदा पैरवी की है; पुरखों के सन्देश की
हमें ज़रूरत नहीं किसी न्यायालय के आदेश की
हम मानवता की रक्षा हित नियमों के मोहताज नहीं
हम तन-मन-धन से मानव हैं, कोरे ड्रामेबाज़ नहीं
हमने कभी नहीं पोसा है कर्मकांड के दूषण को
हमने शीश चढ़ाया केवल तर्कयुक्त आभूषण को
लो महत्व समझो सागर में मिलती जीवन धारा का
लो वैज्ञानिक मतलब समझो जैनों की संथारा का
जब शरीर अक्षम हो जाए बचने का कुछ ठौर न हो
जब मृत्यु प्रत्यक्ष खड़ी हो, राह कहीं पर और न हो
तब बेचैनी त्याग आत्मचिंतन दायित्व हमारा है
जीवन के अंतिम क्षण में निज का चिंत्वन संथारा है
जीवन के अंतिम अवसर का मधुर गान है संथारा
स्वास्थ्य शोथ कर देह समर्पण का विधान है संथारा
यह ऐसी तकनीक है जिससे जीवन का सुख नष्ट न हो
देह और अशरीर छूटने लगें तो किंचित कष्ट न हो
आत्मघात और संथारा के चिंतन में है इतना भेद
आत्मघात में मृत्यु प्रमुख है संथारा में मृत्यु निषेध
आत्मघात जैसी कायरता वीरों का तो तौर नहीं
हम वंशज हैं महावीर के कायर या कमज़ोर नहीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Jainism, Poetry
महावीर स्वामी की पुरातन परंपरा के
वर्तमान युग में निशान देख लीजिए
संत के समागम का कैसा है प्रभाव आज
सज उठा कैसे बियाबान देख लीजिए
आभा का प्रभाव है या तप का चमत्कार
सबके दुखों का है निदान देख लीजिए
जहां-जहां चरण पड़े हैं दिव्य श्रमणों के
वहां-वहां तीरथ महान देख लीजिए
पुण्य का उदय है आपके हमारे जीवन में
ऐसे दिव्य पावन सुखद क्षण उतरे
धर्म की सभा में धार्मिकों का समागम है
जैसे महावीर का समोशरण उतरे
अहिंसा के बल पर शासन हो कैसे भला
धरती पे इसके उदाहरण उतरे
महावीर और महाप्रज्ञ की विरासत को
साथ लिए देखिए महाश्रमण उतरे
सादगी का नूर भी है, ज्ञान का कपूर भी है
अहिंसा का देते हैं पैग़ाम भी महाश्रमण
धर्मसंघ की कमान साधते हैं दिन-रैन
साधना में रहें आठों याम भी महाश्रमण
धर्म की पकड़ डोर, नापें धरती का छोर
घूमें गली-गली गाम-गाम भी महाश्रमण
कहाँ आखरों में बंध पाएंगे ऐसे महान
श्रमण; कि जिनका है नाम भी महाश्रमण
त्याग, तप, साधना से ऐसे हो गए प्रबल
कामना पे लगाते विराम भी महाश्रमण
भीतर से बाहर तलक दिव्यरूप संत
आत्मा भी, हाड़-मांस-चाम भी महाश्रमण
हर क्षण, हर पल, एक सा सलोना रूप
सुब्ह भी महाश्रमण, शाम भी महाश्रमण
जिसने समर्पण के झरोखों से निहारा
उसके लिए तो चारों धाम भी महाश्रमण
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
गर्भ में आने से पूर्व कुबेर नगर भर में बहुरत्न लुटावे
जन्म समय धर नेत्र हज़ार निहारे तउ सुर पार न पावे
जा की उठाने को पालकी देव मनुष्य न होने का सोग मनावे
ताहि सती इक बेड़िन में बंधी कारा में सूखा आहार करावे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Jainism, Poetry
बारूदों के ढेर पर दुनिया खड़ी है देखो
ज़ख़्मों का एक ही इलाज है अहिंसा
धाँय-धाँय, धड़-धड़, धूम-धूम की ध्वनि में
वीणा के सुरों-सा एक साज है अहिंसा
तोप-टैंक-बम-परमाणुओं की कुण्डली में
साढ़ेसाती जैसी एक गाज है अहिंसा
ऐरों-गैरों-नत्थूखैरों-कायरों का काम नहीं
वीर-महावीरों की आवाज़ है अहिंसा
✍️ चिराग़ जैन