+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

आदमी बौना अच्छा

जिनको लगता न हो धरती का बिछौना अच्छा
ऐसे शिखरों से तो फिर आदमी बौना अच्छा

मैंने ये देख के मेले में लुटा दी दौलत
मुर्दा दौलत से तो बच्चों का खिलौना अच्छा

मेरे होते हुए भी कोई मेरा घर लूटे
फिर तो मुझसे मेरे खेतों का डरौना अच्छा

राम ख़ुद से भी पराए हुए राजा बनकर
ऐसे महलों से था जंगल का बिछौना अच्छा

उसकी ममता से मेरा मन भी सँवर उठता था
अब के सिंगार से अम्मा का दिठौना अच्छा

✍️ चिराग़ जैन

ख़ूब रोता हूँ

मैं अब जिन दोगलों के बीच रहकर ख़ूब रोता हूँ
मैं उनसे देर तक लम्बी ज़िरहकर ख़ूब रोता हूँ
मेरी मासूमियत तो बहुत पहले मर चुकी लेकिन
मैं सच बतलाऊँ अब भी झूठ कहकर ख़ूब रोता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

ग्लोबल वार्मिंग

मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग
धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग

तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल
रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल

मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन
तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन

तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप
धीरे-धीरे धर रहे, इतिहासों का रूप

रिमझिम, झर-झर, झमाझम, बरसा था आकाश
इन बातों पर कल किसे, होएगा विश्वास

✍️ चिराग़ जैन

तो भी मैं ग़लत

मैं अगर ख़ुद अपना सच बतलाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत

ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत

बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे
और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत

बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत नहीं
पर तुम्हारे शब्द ही दोहराऊँ तो भी मैं ग़लत

तुमने हर संबंध को व्यवसाय कर डाला मगर
मैं कहीं व्यवसाय करने जाऊँ तो भी मैं ग़लत

मेरा मुन्सिफ़ सारी बातें जानकर भी मौन है
और मैं बिन बात चुप हो जाऊँ तो भी मैं ग़लत

आंधियों का सामना कर लूँ तो बेगैरत ‘चिराग़’
और गर चुपचाप मैं बुझ जाऊँ तो भी मैं ग़लत

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया : एक चेहरा ये भी

हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था

✍️ चिराग़ जैन

मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से

न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से

वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से

ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से

वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!