+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

जब क़त्ल हुए थे जंगल

एक मज़हब को पनाह दी थी कभी बस्ती ने
आज तक ज़ात को क़ीमत चुकानी पड़ती है

इक हसीं शाम की ख़्वाहिश में क़दम बहके थे
अब तो हर रात को क़ीमत चुकानी पड़ती है

ग़ैब ख़ामोश था जब क़त्ल हुए थे जंगल
इसकी बरसात को क़ीमत चुकानी पड़ती है

गर कलम शाही तमन्नाओं की परवाह करे
फिर तो हर हाथ को क़ीमत चुकानी पड़ती है

सबकी मुस्कान बनाए रखूँ इस चाहत की
मेरे जज़्बात को क़ीमत चुकानी पड़ती है

✍️ चिराग़ जैन

ठहाकों का दौर

ग़मों का दौर है आफत में जान है लेकिन
कुछ ऐसी बात चले रंग और हो जाए
फिर एक बार फुर्सतों पे नूर आया है
चलो कि फिर से ठहाकों का दौर हो जाए

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव रूठ जाएगा

अगर व्यवधान होगा तो ये उत्सव रूठ जाएगा
कोई इक पल कई रातों की मेहनत लूट जाएगा
ये तनहाई की बातें आई हैं महफ़िल में हिम्मत से
हुई अनदेखी तो इनका मनोबल टूट जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ

नज़र की शोख़ियों को, मस्तियों को चूम आता हूँ
जे़ह्न में तैरती कुछ कश्तियों को चूम आता हूँ
ठहाकों के मुहल्ले में सजी महफ़िल से उठकर मैं
हसीं ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

पुरवा

एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा

उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल
यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा

हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है
अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा

तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा

आज उन लोगों के आंगन में बसी है पछुआ
जिनके पुरखों ने कलेजे में संजोई पुरवा

✍️ चिराग़ जैन

करीने की बात

मरने की बात हो चुकी जीने की बात कर
गाली-गलौज छोड़, करीने की बात कर
सीने के नाप से ये सियासत न चलेगी
अब आम आदमी के पसीने की बात कर

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!