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ख़ास लकीरें ग़ायब हैं

जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं

जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं

जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं

बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं

✍️ चिराग़ जैन

ज़िंदगी है चार पहरों की तरह

कुल मिलाकर ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िंदगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह

✍️ चिराग़ जैन

ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना

निभाना, सहन करना, बाट जोहना सीख लेती थीं
बिना आवाज़ के छुप-छुप के रोना सीख लेती थीं
कहाँ ग़ुम हो गईं वो पीढ़ियाँ जब बेटियाँ माँ से
ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना सीख लेती थीं

✍️ चिराग़ जैन

वियोग

लाख दे कोई दलीलें, दिमाग़ की लेकिन
कुछ भी काफ़ी नहीं इस दिल के संभलने के लिए
ज़िन्दगी एक सफ़र है जहां का सच ये है
लोग मिलते ही हैं इक रोज़ बिछड़ने के लिए

✍️ चिराग़ जैन

जलवे सुनहरे बुझ गए

रौशनी की बेतहाशा बेरुख़ी को देखकर
झूमते-गाते दरख़्तों तक के चेहरे बुझ गए
तीरगी ने इस क़दर बाँहों में आलम भर लिया
धूप के जितने भी थे जलवे सुनहरे बुझ गए

✍️ चिराग़ जैन

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