व्यवस्था के घुटने
घुट-घुट कर साँस लेते आदमी को
घुटने से बचाने के लिए
व्यवस्था के घुटने बहुत काम आते हैं
दहशत में साँस लेती जनता को
एक ही बार में
साँस की चिंताओं से
मुक्त कर जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : George Floyd Death Issue in America
घुट-घुट कर साँस लेते आदमी को
घुटने से बचाने के लिए
व्यवस्था के घुटने बहुत काम आते हैं
दहशत में साँस लेती जनता को
एक ही बार में
साँस की चिंताओं से
मुक्त कर जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : George Floyd Death Issue in America
सिर
बर्दाश्त कर रहा है
अपनी क्षमता से अधिक भार।
हथेलियाँ कर चुकी हैं
अपनी खुरदरी छुअन को स्वीकार।
पैर सीख गए हैं
बोझा लेकर चलने की कला।
पीठ जान चुकी है
कि देह पर बोझ बन जाने से
बोझा ढोना भला।
कानों को
सुनाई नहीं देता उपहास
नाक को
गंदगी से नहीं आती है बास
अपनी काया को देखकर
आँख भी
बिल्कुल नहीं रोती है
क्योंकि पेट को
भूख
बर्दाश्त नहीं होती है।
✍️ चिराग़ जैन
दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है
✍️ चिराग़ जैन
एक
सवाल था।
अनदेखी की
गोद में पलकर बड़ा हुआ,
और लापरवाही की
उंगली पकड़ कर
धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
जैसे ही सवाल पर
यौवन का ज्वार चढ़ा,
वह अपना
समाधान ढूंढने निकल पड़ा।
समाधान की चाह में,
उसे कुछ दोस्त मिल गए राह में।
समाजसेवा ने
उसे आवारागर्दी की लत लगाई,
राजनीति ने उसे
नशा करने की कला सिखाई।
मीडिया ने
समय बर्बाद करने का हुनर सिखाया,
तकनीक ने
अफवाह से उसका परिचय करवाया,
और आंदोलनों ने
उसके साथ मिलकर
सड़कों पर दंगा मचाया।
जवानी का महत्वपूर्ण समय
नष्ट करने के बाद,
जब सवाल बिल्कुल अकेला रह गया
तो उसे फिर से आई
समाधान की याद।
चक्कर काटते-काटते
देश की चिंता में व्यस्त दरबारों के,
उसे समझ आ गया
कि टोटके एक जैसे ही हैं इन सारों के।
एक दिन
दिन-दहाड़े
एक मीडिया स्टूडियो में
सभी राजनैतिक दलों ने
सवाल को घेर लिया,
फिर एंकर के साथ मिलकर
बंद स्टूडियो में
ऑन कैमरा उसे ढेर किया।
अपने पुराने यार की लाश देख
समाजसेवा और आंदोलन की आँख भर आईं,
उद्योगपतियों ने अनुदान देकर
उस सवाल की चिता सजाई,
लेखकों ने उसकी मौत पर
अलग-अलग तेवर के लेख लिखे,
संसद और विधानसभा
उसकी शवयात्रा में बहुत उदास दिखे।
एक नन्हें से नए सवाल के हाथों
उसकी चिता जली,
और इस दाह-संस्कार में
एक अदद समाधान की अनुपस्थिति
सबको खली।
अगले दिन
देश जब उसके फूल चुनने गया
तो देश का मन खिन्न था,
चिता की सुलगती हुई राख में
अस्थियों से बना
केवल एक प्रश्नचिन्ह था।
✍️ चिराग़ जैन
उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे
एक मुद्दत से मेरे पास नहीं आई है
एक मुद्दत से कई काम अधूरे हैं मेरे
वायदे, ख़्वाब, मुलाक़ातें कई हैं बाक़ी
एक तस्वीर अधूरी सी बनी रक्खी है
एक मिसरा-सा ग़ज़ल का है, बिना सानी के
एक किस्से का भी मफ़हूम लिखा रक्खा है
एक बूढ़ा है, कई बार बुलाता है मुझे
उससे हर बार बहाना-सा बना देता हूँ
अपने अरमान के पंछी को दग़ा देता हूँ
कितना मसरूफ़ बना रक्खा है मैंने ख़ुद को
वक़्त मिलता ही नहीं मुझको कभी इतना भी
अपनी टेबल पे रखे फालतू काग़ज़ छाँटूँ
मेज की तीनों दराज़ों को पलटकर इक दिन
उनमें तरतीब से सामान सजाकर रख दूँ
कितना बिखरा हुआ सा रहने लगा हूँ अब मैं
इन दराज़ों में भरे फालतू सामानों से
मुँह चुरा लेता हूँ मैं अपने ही अरमानों से
क्या-क्या बाक़ी है, कहाँ तक ये गिनोगे तुम भी
चलो फ़ुरसत से मिलूंगा तो बताऊंगा कभी
उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे
✍️ चिराग़ जैन
उस पल जब चीख़ बन गई थी
एक नन्हीं किलकारी
जब दहल उठा था सारा ब्रह्मांड
जब दरक गई थी धरती
उस पल केवल तुम आई थीं
उसकी छटपटाहट को आलिंगन में भरकर दुलारने
तुम दूर ले गईं उसे बर्बर वहशी की पहुँच से! …
तुमने उसे मारा नहीं; बचा लिया है मृत्यु!
✍️ चिराग़ जैन