Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।
सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!
जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।
और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।
शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
जिन्दगी
एक खूबसूरत लड़की है
इसकी प्रशंसा करोगे
तो ये चहक उठेगी।
इसे एकटक निहारोगे
तो इसके मुखड़ा सज उठेगा
हया के रंग से।
इसे अनदेखा करोगे
तो ये उदास हो जाएगी।
इसे कोसोगे
तो चुपके से
दूर चली जाएगी तुमसे।
बहुत प्यारी है रे जिन्दगी
इसे चहकने दो,
इससे मुस्कुरा कर मिलो
कभी कचमचा कर
चूम लोगे इसे
तो झूम उठेगी
इसकी चिरौरी करो
इसे चिकौटी काट लो
…लेकिन कोसना मत इसे कभी
कुम्हला जाएगी बेचारी।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
विकासवादियो!
पर्यावरण के नाम पर
मुट्ठी न भींचो,
तुमसे किसने कहा है
कि दुनिया के भले के लिए
कोई पेड़ सींचो?
तुम तो अपनी बालकनी में
तुलसी का इक पौधा लगा लो
और अपने परिवार के लिए
थोड़ी सी सांसें उगा लो।
मत सोचो
कि किस तरह बचाई जाए
दादी नानी की कहानी,
पर ये तो विचार करो
कि तुम्हारे नौनिहाल
कहाँ से पिएंगे
साफ-शुद्ध पानी।
माना
कि तुम्हारी विकास उगलती फैक्ट्रियां
नहीं रोक सकती
काला जहरीला धुआँ,
लेकिन बचाई तो जा सकती है नदी
सहेजा तो जा सकता है कुआँ।
हमारी पढ़ी लिखी सोसाइटी से
ज्यादा समझ थी
पिछले जमाने के असभ्य-अनपढ़ों में
जो जानते थे
कि स्वस्थ भविष्य के बीज छुपे हैं
पीपल और बरगद की जड़ों में।
आओ
विकास और विनाश के बीच
एक स्पष्ट रेखा खींच आएं
आओ
स्मार्ट सिटी की ग्रीन बेल्ट पर लगे
गुलमोहर को सींच आएं।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दो घड़ी को
मैं किसी आकाश के रोमांच की
बांहें पकड़ कर;
उस धरा द्वारा मुझे सौगात में सौंपे गए
अविरल सुरक्षा भाव का
अपमान कर आया;
जो कि मुझको हर दफ़ा
अस्थिर उड़ानों से
पुनः नीचे उतर आने पे
बढ़कर थाम लेती है।
वे उड़ानें
(मैं जिन्हें उन्माद में
ऊँचाइयों पर ठहर जाने का
तरीका मान बैठा हूं)
महज ज़िद पर उतर आए
किसी बालक की ऐसी कूद भर है
जो थका कर मौन करती है मुझे
क्योंकि अभी
धरती के आकर्षण की सीमा
लांघ जाने का
अतुल साहस नहीं है
मेरी बचकाना उड़ानों में।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
ऐसा संवत्सर आया है
बूढ़ा अमुवा बौराया है
छोटी छोटी कैरी आई
झड़बेरी पर बेरी आई
शहतूतों का रंग लाल हुआ
सहजण का पेड़ कमाल हुआ
गेंदा फूला, गुडहल फूला
चिड़ियों ने फिर झूला झूला
पीपल पर कोंपल नई नई
पिलखन पर चिड़िया कई कई
नम हुए सूखते हुए सोत
झूमे तोते, झूमे कपोत
ककड़ी का हरियाला मौसम
आया खीरों वाला मौसम
खरबूजे की मीठी सुवास
तरबूज सजे हैं आसपास
कांजी, नीबू, जलजीरा भी
आम्बी का पना, कतीरा भी
लस्सी, शर्बत, सत्तू, मट्ठा
चुस्की, कुल्फी, चटनी चट्टा
नुक्कड़ पर प्याऊ की मढ़िया
अमराई में बैठक बढ़िया
पिकनिक का मूड बनाया है
छुट्टी से मन हर्षाया है
ऐसा संवत्सर आया है
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं लड़कियाँ।
…मतलब
बचपन में हमें ग़लत पढ़ाया गया था
कि रौशनी
सीधी रेखा में ‘ही’ यात्रा करती है।
✍️ चिराग़ जैन