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शहर का बयान

सारी जिम्मेदारी मेरी, सब सहना लाचारी मेरी
प्राण लुटाकर गाली खाना, बस इतनी सी पारी मेरी
फिर भी जब अवसर होगा सब गाँवों का गुणगान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

जब सुविधा का प्रसव कराने, गाँवो ने इनकार किया था
तब मैंने ही आगे बढ़कर ये दुखड़ा स्वीकार किया था
शुद्ध हवा ने धमकी दी जब मुझको छोड़ चले जाने की
तब भी मैंने बस लोगों की सुविधा का सत्कार किया था
सुख से दूरी जारी मेरी, सुविधाओं से यारी मेरी
मुझको लगता था होएगी, मानवता आभारी मेरी
पर गाँवों की बिछड़ी यादों का निशदिन सम्मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

बरसातों में घर की पक्की छत के नीचे जीने वाले
गर्मी में एसी कमरों में ठंडे शर्बत पीने वाले
सर्दी में ब्लोअर की ऊष्मा से सुख की चाहत करते हैं
तब क्यों याद नहीं आते हैं कच्चे छप्पर झीने वाले
नदिया कर दी खारी मेरी, धरती कर दी भारी मेरी
मेरा शोषण करने वालों को चुभती अय्यारी मेरी
पक्की सड़कों पर दौड़ेंगे, पगडंडी पर मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

मेरी निंदा के चर्चे हैं मानवता के अखबारों में
मुझको माना है खलनायक वक्तव्यों के व्यापारों में
पैसे की व्यवहारिकता को कविताओं में जी भर कोसा
गाँव सुखों का मोल लगाता, रोज़ाना इन बाजारों में
किसने शक्ल सुधारी मेरी, कब समझी दुश्वारी मेरी
भोलेपन की चालाकी को, खलती है हुशियारी मेरी
अंगूरों को खट्टा कहकर कुंठा का रसपान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा का अनुमान

जिस बिरवे की हर कोंपल को अपने हाथों से दुलराया
उस बिरवे के मुरझाने पर माली पर क्या बीती होगी
चहक भरी जिसने जीवन में, तिनका-तिनका नीड़ बनाकर
उस चिड़िया के उड़ जाने पर, डाली पर क्या बीती होगी

कतरा-कतरा जोड़ा हिम ने, तब नदिया का रूप बना था
धरती का सीना छलनी कर इक मीठा जलकूप बना था
जिन हाथों में होंठों तक भी जाने का दम शेष नहीं था
उन हाथों से गिर जाने पर, प्याली पर क्या बीती होगी

दिन भर खून-पसीना देकर, जिस सूरज के प्राण बचाए
प्राची कितना सिसकी होगी, जब वो पश्चिम के मन भाए
जिसका तेज दमकता चेहरा सारी दुनिया में रौशन था
उस सूरज के ढल जाने पर, लाली पर क्या बीती होगी

जिसके नखरे पूरे करके रीझा करती रोज़ रसोई
ताती रोटी, नर्म पराँठे, चार परत आटे की लोई
जो रोटी पोए जाने तक खाली बासन खनकाता था
उस बेटे के मर जाने पर, थाली पर क्या बीती होगी

✍️ चिराग़ जैन

ओ विकलता!

ओ विकलता!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

नींद का तुझसे पुराना वैर है री!
श्वास ने लय खोई तेरे साथ चलकर
धड़कनों की ताल द्रुत होती अचानक
रह गई है शांति अपने हाथ मलकर
मान भी जा!
एक क्षण भीषण प्रतिज्ञा तोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

अनवरत मस्तिष्क में हलचल मची है
मौन के क्षण को कभी सम्मान तो दे!
तू समूची बुद्धि से मन तक बसी है
धैर्य टिक पाए कहीं पर स्थान तो दे!
या चली जा!
या हृदय को इक दफा झखझोर दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

दृष्टि को भीतर उतरने की गरज है
भंगिमा को सरल होने का समय दे!
मुस्कुराहट खिल उठे व्याकुल अधर पर
त्यौरियों को तरल होने का समय दे!
घूम-फिर आ!
भृकुटियों को सहजता से जोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव का संयोग

कवि के आँगन में पीड़ा के उत्सव का संयोग हुआ है
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

आँसू ने पलकें धो दी हैं, मुस्कानों के आमंत्रण पर
सपने आँगन पूर रहे हैं, आशा सज आई तोरण पर
वीणा के सोए तारों को छूकर निकली है बेचैनी
कुछ पल ठहरो इन तारों पर पावनतम संगीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

सब कुछ खो देने की पीड़ा एक दिलासा ढूंढ रही है
नदिया की धारा सागर की अमर पिपासा ढूंढ रही है
आलिंगन में बांध लिया है अपनेपन ने हारे मन को
तय है इस किस्से में इस पल एक नया मनमीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

वरदानों की सिद्धि; तपस्या की क्षमता पर आधारित है
जिसने सब कुछ खोया उसका सब कुछ पाना निर्धारित है
मरने की सीमा तक यदि संग्राम किया है इक काया ने
तो अगले पल उस काया में जीवन आशातीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा
✍️ चिराग़ जैन

प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं

स्वप्न तो खो गए बुद्धि के द्वार पर
प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं
बच गई साथ की झुंझलाहट जहाँ
उस जगह प्रीत को दूरियाँ खा गईं

पारलौकिक सुखों की बड़ी प्यास को
कंदरा का महानंद जकड़े रहा
सुन सको तो सुनो काव्य एकांत का
बस जिसे मौन का छंद पकड़े रहा
ज़िन्दगी की समूची हिरन चैकड़ी
प्राण में व्याप्त कस्तूरियाँ खा गईं

प्रीत का रंग वैधव्य ने धो दिया
अनकही पीर अभ्यर्थना हो गई
आँसुओं पर लगी चैकसी आंख की
चाहतें सत्य को ओढ़ कर सो गई
धीर जितना बंधा था उसे एकदम
रेहड़ियों पर टंगी चूड़ियां खा गईं

भूख का इक ठहाका चुभा देर तक
जब कभी भी सड़क पर बसौड़ा पुजा
रीतियाँ ढोंग की ओट में नग्न थीं
पेट आँतों के पीछे दुबककर तुजा
अन्न के मूल्य की हर प्रबल सूक्ति को.
चौंक पर सड़ रही पूरियाँ खा गईं
✍️ चिराग़ जैन

आलोचना-आमंत्रण

सिर्फ़ प्रशंसा से निश्चित ही धार बिगड़ती है लेखन की
तुम मेरे गीतों की अब से निर्मम-निठुर समीक्षा करना

बगिया के जो बिरवे माली की कैंची से दूर रहे हैं
वो बगिया की उर्वर भू से हटने को मजबूर रहे हैं
छँटने-कटने की पीड़ा से ही मिलता है रूप सुदर्शन
तुम बस घावों पर नव पल्लव उगने तलक प्रतीक्षा करना

मेरे अक्षर कवि-गुरुकुल में सद्य प्रविष्टित राजकुँवर हैं
इनके केशों का मुण्डन भी अंतर्मन पर इक पत्थर है
पर शिक्षा के अनुशासन हित इनको भिक्षुक बनना होगा
इन सुकुमारों की भी बाकी सब जैसी ही दीक्षा करना

लाड़-दुलार अधिक होने से पीढ़ी नष्ट हुई जाती है
धूल सना जीवन जीकर ही सौंधी महक सृजन पाती है
अलग नियम से राजकुँअर पर कायरता का दोष लगेगा
हो पाए तो इनकी, सबसे बढ़कर कठिन परीक्षा करना

✍️ चिराग़ जैन

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