Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हम तरसते रहे रेशमी भोर को
रात भर सिलवटें कसमसाती रहीं
इक सुक़ूं के लम्हे की तमन्ना लिए
साँस आती रही साँस जाती रही
आँख में इक समंदर सँजोए हुए
घाट का रोज़ अपमान करती चली
प्यास की कोर पर अश्रु ठहरा रहा
पर नदी सिर्फ़ मद में अकड़ती चली
चाल भारी हुई, देह खारी हुई
डूब कर देर तक थरथराती रही
बालपन कट गया यौवनी आस में
और यौवन बुढ़ापे की चिंताओं में
कर्म निर्भर रहा बाजुओं पर मगर
हाथ उलझे रहे भाग्य रेखाओं में
ज़िन्दगी मौत की राह तकती रही
मौत जीवन से बचती-बचाती रही
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै
मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है
राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
प्रेम में प्राप्ति की जब चली बात तो
पीर सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् हो गई
दर्द सहने की ताक़त बची है मगर
दर्द कहने की ख़्वाहिश ख़तम हो गई
वेदना प्राण में कुलबुलाती रही
देह व्यापार में ही फँसी रह गई
एक लावा रगों में पिघलता रहा
होंठ पर शेष सूखी हँसी रह गई
भीड़ में बेसबब मुस्कुराना पड़ा
जब अकेला हुआ आँख नम हो गई
कब सफलता का पूरा भरोसा रहा
कब विफलता की मन में हताशा रही
नींद जब भी नदारद हुई आँख से
मूल कारण महज एक आशा रही
दीप के प्राण पल-पल सुलगते रहे
हर घड़ी एक उम्मीद कम हो गई
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जिस सपने से डर लगता था
उसको ही साकार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
मैं कहता हूँ- ‘तुम चाहो तो अब भी परिवर्तन संभव है
स्थितियों का अपने हित में फिर से संयोजन संभव है’
तुम कहती हो- ‘छोड़ो भी अब, सारा सोच-विचार कर लिया’
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
तुम कहती हो- ‘इतना समझो, ऐसा ही ये जीवन मग है
अपना साथ यहीं तक का था, आगे अपनी राह अलग है’
इतनी आसानी से तुमने जब ख़ुद को तैयार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
‘अपना क़िस्सा ख़ास नहीं है, ऐसा तो सौ बार हुआ है
जब संवेदी मन पर हालातों का निष्ठुर वार हुआ है’
आज तुम्हारी इन बातों का मन ही मन सत्कार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
करता हूँ मनुहार अगर मैं तो तुम झुंझलाने लगती हो
स्वर ऊँचा करके मन की सच्चाई झुठलाने लगती हो
ज्ञात मुझे है, तुमने ऐसा क्यों अपना व्यवहार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
तुम पर मैं अधिकार जताऊँ, ऐसे तो हालात नहीं हैं
मेरे गीतों में तुम उतरो, अब ये अच्छी बात नहीं है
मन के अहसासों का मैंने, सीमित अब संसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
‘व्यवहारिकता की चैखट पर, भावुक होने से क्या होगा
दिल में पीर भरी है लेकिन, नयन भिगोने से क्या होगा’
-इन कड़वे तर्कों को मैंने जीवन का आधार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
वैसे तुम व्यवहारिक हो तो आँखों में गीलापन क्यों है
मेरे दुख को देख तुम्हारे मन में इतनी तड़पन क्यों है
अब तक सच के साथी थे, अब पर्दा भी इकसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सत्य का पथ हमें क्यों जटिल सा लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए
जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टालकर चल दिए
हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए
हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए
भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डालकर चल दिए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Poetry
फिर से मन में अंकुर फूटे, फिर से आँखों में ख़्वाब पले
फिर से कुछ अंतस् में पिघला, फिर से श्वासों से स्वर निकले
फिर से मैंने सबसे छुपकर, इक मन्नत मांगी ईश्वर से
फिर से इक सादा-सा चेहरा, कुछ ख़ास लगा दुनिया भर से
फिर इक लड़की की रुचियों से, जीवन के सब प्रतिमान बने
फिर इक चेहरे की सुधियों से, सुन्दरता के उपमान बने
मुझको लगता था ये सब कुछ शायद इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा
फिर से मेरे मोबाइल में इक नम्बर सबसे ख़ास बना
फिर इक सोशल प्रोफ़ाइल से, मन का मधुरिम अहसास बना
फिर से मोबाइल की घंटी, आँखों की चमक बढ़ाती थी
फिर से इक लड़की की फोटो, मुझसे घण्टों बतियाती थी
उसको मैसिज कर सोना था, उसके मैसिज से जगना था
उसके भेजे हर इक मैसिज को अलग सहेजे रखना था
सोचा था हम पर पागलपन हावी इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा
फिर से इक चंचल लड़की की हर बात सुहानी लगती थी
वो लड़की बहुत सयानी, पर दुनिया दीवानी लगती थी
उसकी ख़ुशियाँ, उसके सपने, उसकी हर चीज़ ज़रूरी थी
बाकी के सारे काम महज दुनिया की इक मजबूरी थी
फिर से मैं सारी दुनिया की नज़रों में इक बेकार हुआ
फिर से ख़र्चों का ग्राफ़ बढ़ा, आमदनी बंद, उधार हुआ
मेरा मस्तिष्क कभी दिल के हाथों लाचार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा
फिर से कुछ बेमतलब बातें, इन अधरों पर मुस्कान बनीं
फिर से इक लड़की की यादें, तन्हाई में वरदान बनीं
फिर से नयनों की कोरों पर, इक आँसू आ ठिठका, ठहरा
फिर से उसकी मुस्कानों ने सपनों पर बिठलाया पहरा
फिर से मेरी कविताओं का रस बदला औ’ शृंगार सजा
फिर से गीतों में पीर ढली, फिर से ग़ज़लों में प्यार सजा
मेरे कवि पर इक लड़की का, इतना अधिकार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा
शायद मेरी मन-बगिया में कुछ पावन पुष्प महकने थे
शायद मेरे काव्यांगन में कुछ अनुपम गीत उतरने थे
शायद यह फूल मुहब्बत का खिलना था और बिखरना था
शायद यह सब निर्धारित था, मिलना था और बिछड़ना था
शायद अहसासों की मेरे मन में इक खण्डित मूरत थी
शायद मुझको इस अनुभव की पहले से अधिक ज़रूरत थी
शायद मुझसे फिर कोमल भावों का सत्कार नहीं होता
सब अनुभव आधे रह जाते गर फिर से प्यार नहीं होता
✍️ चिराग़ जैन