Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मैं तुम्हारी आँख में कुछ स्वप्न अपने आँज आया
तुम मेरे सपनों को अपने आँसुओं में मत बहाना
जब तुम्हें आभास हो, गंतव्य दुर्गम हो रहा है
या सफलता के प्रयासों के जकड़ ले पाँव कोई
राह का मौसम गुलाबी हो करे कर्तव्य विस्मृत
या तुम्हें आकृष्ट कर बैठे, मनोहर गाँव कोई
तब घड़ी भर देखना दर्पण में अपनी पुतलियों को
तब घड़ी भर इस अनोखे स्वप्न से आँखें मिलाना
एक दिन तुमको समूची साधना मिथ्या लगेगी
एक दिन उलझाएगी तुमको इसी पथ की पहेली
एक दिन थककर तुम्हारे पाँव भी दुखने लगेंगे
एक दिन तुम भी चलोगी साधना-पथ पर अकेली
बस उसी दिन जान लेना, है बहुत नज़दीक मंज़िल
बस उसी दिन और भी जीवट जुटाकर पग बढ़ाना
मन्त्र हैं निष्प्राण उनमें साधना के प्राण भर दो
शब्द को अनुभूतियों का स्पर्श दो, वह जी उठेगा
जिस समंदर ने तुम्हारे वक़्त की नैया डुबोई
चंद्रमा की ओर बढ़ता ज्वार उससे ही उठेगा
जब नई आभा छलक आए सफलता के नयन में
तब नयन की कोर पर उसको सजाकर मुस्कुराना
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कितना कष्ट उठाया मैंने, मुझको इसका भान नहीं है
इतना सा है खेद कि इसका तुमको ही संज्ञान नहीं है
दुनिया का चेहरा तकने में, आँखों की पुतली दुखती है
लेकिन दर्द हवा होता जब ये तुम पर आकर रुकती है
पुतली का बह चला पसीना, फिर भी तुमको ध्यान नहीं है
एक दिवस मन के रंगों ने, भावुकता से होली खेली
उसके बाद अहर्निश मन ने, मिलने की व्याकुलता झेली
इस व्याकुलता की क्या तुमसे, थोड़ी भी पहचान नहीं है
तुम हारे तो धीर बँधाई, तुम जीते तो उत्सव गाया
पीर तुम्हारी लिखते-लिखते, मैं अपना मन देख न पाया
जो कुछ गीतों में उतरा है, वो मेरा निज गान नहीं है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जी भर कर पड़ताल करो तुम
मन में उपजी शंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी
मीठी झीलें आशाओं की
जब भी प्रश्न करोगे कोई उत्तर तुमको मिल जाएगा
पर संदेहों के कंकर से अपनापन तो हिल जाएगा
इक हलचल सी मच जाएगी, पाल हिलेगी नौकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की
ख़ुद से पूछो अग्नि परीक्षा से आख़िर किसने क्या पाया
सीता ने सम्मान गँवाया, राघव ने अधिकार गँवाया
धोबी के लांछन से कम थी, सारी पीड़ा लंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की
यह भी सच है, राम छुएं तो प्राण पुनः संचारित होंगे
यह भी सच है पीड़ित दोषी से पहले अभिशापित होंगे
पत्थर बनकर रह जाएगी, देह अभागी अबलाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की
क्वारे सच पर प्रश्न उठाना क्या सचमुच संत्रास नहीं है
कैसा क्षण है, पतवारों को नाविक पर विश्वास नहीं है
शंका के बीहड़ में पनपी, नागफनी आशंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की
खुद को साबित करते-करते, ढल जाएगी धूप सुनहरी
आक्रोशों की हुई गवाही, भावुकता की लगी कचहरी
चतुराई तो हत्यारिन है, निश्छल सी अभिलाषाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब किसी राधिका ने सुरों को छुआ
लोक बस बाँसुरी में मगन हो गया
प्रेम ने फुसफुसा कर कहा जो कभी
अनहदी राग वह इक कथन हो गया
द्वार पर एक जोगी खड़ा भरतरी
एक पल में पराया किया प्रीत को
था कठिन द्वार पर भूल कर प्रेम को
पीठ पर लाद लाना किसी जीत को
पींगला की व्यथा आंख से बह चली
गोरखों को लगा आचमन हो गया
एक अनजान पथ पर बढ़ा जब कदम
दिल धड़कता रहा, पाँव कँपते रहे
अपशगुन इस घड़ी दिख न जाए हमें
आँख मूंदे हुए मन्त्र जपते रहे
प्रीत ने मुस्कुरा कर कहा- ‘बढ़ चलो!’
यूँ लगा ज्यों घटित इक शगन हो गया
था अनैतिक किसी ब्याहता के लिए
पर पुरुष से हृदय नेह को जोड़ना
नीतियाँ एक निर्णय पे सहमत हुईं
इस दिवानी को जीवित नहीं छोड़ना
हो गया जिससे मीरा का नैतिक पतन
अनुकरण योग्य वह आचरण हो गया
पीर अपनी सुनें और कविता लिखें
वक़्त इतना किसे मिल सका प्यार में
मन स्वयम् को अभी सुन नहीं पाएगा
व्यस्त है आज प्रियतम के सत्कार में
एक मन की ख़ुशी छंद में बंध गई
गीत में प्रीत अवतरण हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
शब्द तो कह रहे हैं बहुत ख़ुश हो तुम
मौन लेकिन गवाही नहीं दे रहा
देखना चाहता जो शिखर पर तुम्हें
वो तुम्हें रास्ता ही नहीं दे रहा
एक अपनत्व का बोझ ढोते हुए
चाह को एक डर में डुबोते हुए
तुम सिहरती हो पलकें भिगोते हुए
दर्द को आसरा ही नहीं दे रहा
लक्ष्य से तीर भी चूकता है मगर
स्वप्न नगरी समय फूँकता है मगर
प्यास से कंठ तो सूखता है मगर
भाग्य बढ़ कर सुराही नहीं दे रहा
जग तुम्हारा पुरस्कार पोसा करे
कर्म तुमको सफलता परोसा करे
भाग्य तुम पर ज़रा सा भरोसा करे
ये इजाज़त सखा ही नहीं दे रहा
साधना पर निछावर न संबंध हो
किन्तु श्वासों पे कोई न प्रतिबंध हो
लक्ष्य औ‘ भावना में नहीं द्वन्द हो
मीत दिल से दुआ ही नहीं दे रहा
पत्थरों पर स्वयं को निछावर किया
आप अपने हुनर का अनादर किया
जिसको रौशन स्वयं को जलाकर किया
वो तुम्हें हौसला ही नहीं दे रहा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
अब नहीं आना हमको सारी दुनिया के समझाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
दुनिया की सारी दौलत ठुकरा बैठी दीवानी थी
उसको अपने नटवर नागर के सँग प्रीत निभानी थी
मिश्री सा मीठापन पाया उसने विष पी जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
थाम लुकाठी हाथ कबीरा साखी गाया करता था
ढोंगी को झीनी चादर से ख़ूब छकाया करता था
अपना ही घर फूंक लिया दुनिया के दीप जलाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
बिगड़े मस्त दिमाग़ों में ही ख़ुशियों वाले लच्छे हैं
हमको पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं
रंग बसंती गहराएगा फाँसी पर चढ़ जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जब आँखों की एक झलक से सारी दुनिया हल्की हो
जब कोई हिचकी पलकों से आंसू बनकर ढलकी हो
उसके बिन जीने से अच्छा है उस पर मर जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जिन आँखों में रंग ख़ुशी का भरना अच्छा लगता है
उसकी हर इक चाहत पूरा करना अच्छा लगता है
अपने सारे काम भुला कर उसका हाथ बँटाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
मन करता है हाथ उठाकर मुक्त गगन में बह जाएँ
समझ मना करती है जिनको, वो सब बातें कह जाएँ
कितनी इच्छाएँ कैदी हैं मन के पागलखाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जब कोई बेचारा केवल आँख सेकता रह जाए
बंदर बोटी ले भागे और शेर देखता रह जाए
किसी और की पटी प्रेमिका को लेकर भग जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
✍️ चिराग़ जैन