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नुक्कड़ का पनवाड़ी, चाय की मढ़ैया, बीड़ी-सिगरेट का खोखा, सिटी बस, लोकल ट्रेन और सार्वजनिक शौचालय की लाइन -ये सब चर्चाओं के स्वर्ग हैं। जैसे संसद में पक्ष और विपक्ष होते हैं, ऐसे ही इन चर्चाओं में भी पक्ष और विपक्ष होते हैं। विपक्ष के बिना चर्चा हो ही नहीं सकती। विपक्ष के अभाव में तो केवल गुणगान किया जा सकता है।
कुछ साल पहले तक, ‘केवल चर्चा को जारी रखने के लिए’ हर नुक्कड़ के पान की दुकान पर कुछ लोग ख़ुद को भाजपाई समझ लेते थे, और कुछ ख़ुद को कांग्रेसी। कभी पनवाड़ी फोन पर बतियाने लगता था तो भीड़ बढ़ने पर एकाध सपाई और बसपाई भी मिल जाता था। अगर पनवाड़ी का फोन कॉल लंबा चल जाए तो मनसे, झामुमो, जद, बीजद वगैरा की भी हाज़िरी लग जाती थी। फोन कॉल समाप्त होते ही पनवाड़ी तेज़ी से काम करके सब क्षत्रपों को निबटा देता था और राष्ट्रीय दलों के प्रतिनिधि चर्चा करते रहते थे। जो चर्चा से ऊब जाता था, वो अपने काम पर चला जाता; और जो काम से ऊब जाता था, वो चर्चा करने चला आता था। इन चर्चाओं में पनवाड़ी स्पीकर की भूमिका निभाता था और चर्चा को जीवित रखते हुए दोनों पक्षों को उकसाता रहता था। इस तरह वह चर्चा और पान पर एक साथ चूना लगाता रहता था।
चूँकि इन चर्चाओं से देश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ता था इसलिए दोनों ही पक्ष चर्चा करते हुए उतने ही गंभीर होते थे, जितने तत्कालीन नेतागण देश को लेकर होते होंगे। इसका यह लाभ था कि चर्चा और संबंध दोनों सुरक्षित रहते थे।
इन चर्चाओं में से अधिकतम का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था और हर चर्चालु स्वयं ही अपने आप को विजेता समझकर मन लगाकर काम करने लग जाता था।
पिछले कुछ वर्षों से इस संस्कृति को लकवा मार गया। चर्चालुओं का स्थान श्रद्धालुओं ने ले लिया। ये श्रद्धालु चर्चा को लेकर इतने गंभीर होते हैं कि चर्चास्थल से काम पर जाने की बजाय युद्धक्षेत्र की ओर उन्मुख हो जाते हैं। चर्चास्थल से कूच करते समय दोनों ही पक्ष के श्रद्धालु सामनेवाले को शिशुपाल और स्वयं को कृष्ण समझते हुए ‘नितीश भारद्वाज’ मार्का मुस्कान लिए मन ही मन गांधारी की तरह समूल नाश का शाप दे रहे होते हैं।
इन चर्चाओं कुछ बातें ‘मान ली जाती हैं’, जैसे –
1) जो भी व्यक्ति सवाल पूछ रहा है, वह मोदी जी से ही सवाल पूछ रहा है।
2) जो भी व्यक्ति सिस्टम के किसी अंग से ख़फ़ा है, वह इनडायरेक्टली मोदी जी का विरोध कर रहा है।
3) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है, वह राहुल गांधी का समर्थक है, इसलिए इसे समझाना बेकार है।
4) जो मोदी जी का समर्थक है, वह समर्थक नहीं, भक्त है। इसलिए इसे समझाना भी बेकार है।
5) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है वह चोर है।
6) जो मोदी जी का विरोधी नहीं है, वह मूर्ख है।
7) जो एनडीटीवी नहीं देखता, वह ज़ीन्यूज़ देखता है।
8) जो ज़ीन्यूज़ देखता है, उसे कुछ ग़लत नहीं दिखता।
9) जो मेरे व्हाट्सएप पर आया है, वह किसी और के व्हाट्सएप पर नहीं आया, इसलिये हर अज्ञानी तक ज्ञान की रौशनी पहुँचाना मेरा कर्त्तव्य है।
10) सामनेवाले चर्चालु की आँखों पर एक चश्मा चढ़ा हुआ है, जिसे उतरवाए बिना मेरा मनुष्य जन्म सफल न हो सकेगा।
इन दस बिंदुओं को सामने रखकर चर्चा की गंगा बह निकलती है, और इन्हीं दस बिंदुओं पर हल्की-फुल्की बून्दा-बांदी, मूसलाधार बन जाती है। हर श्रद्धालु सामनेवाले श्रद्धालु को क्रमशः मूर्ख, भ्रष्ट, चोर, ग़द्दार, राष्ट्रद्रोही और पापी समझते हुए, ‘इसे तो वक़्त ही समझाएगा’ का कुंठित शाप देने लगते हैं।
जो श्रद्धालु अपने पंथ के मंदिर के जिस देवता को पूजता है, उसी के अनुरूप चर्चाभक्ति में उसकी भाषा का स्तर गिरता है। हर श्रद्धालु के पास चर्चायज्ञ में बोलने को कुछ रटे-रटाए मंत्र हैं, जिन्हें वह कठोर परिश्रम करके व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड पद्धति से प्राप्त करता है। चर्चा का विषय कुछ भी हो, श्रद्धालु अपने-अपने मंत्र पढ़ते रहते हैं।
चूँकि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के इन रटे-रटाए जुमलों से परिचित होते हैं इसलिए धार्मिक प्रार्थनाओं की तरह ये चर्चाएँ शोर पूरा करती हैं और असर शून्य।
भाजपा-कांग्रेस; राहुल-मोदी और भक्त-चमचा के आधार पर बँट रही जनता में फैलते विद्वेष को देखकर राजनीति अपने पूर्ववर्ती नेताओं का धन्यवाद ज्ञापन करती है कि जिस जनता को उन्होंने प्रजा बनकर रहना सिखाया था, वह अब श्रद्धालु बनकर एक-दूसरे से घृणा करके कितनी ख़ुश है!
✍️ चिराग़ जैन
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जो समाज अपनी भाषा के प्रति लापरवाह होता है, उसके हाथों से उसकी संस्कृति फिसल जाती है। भारत में, वह भी उत्तर भारत में, उस पर भी उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा की परीक्षा के परिणाम आश्चर्य से अधिक क्षोभ से भर देते हैं।
राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की महानता का ढोल पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो आशा जगी कि अब संस्कृत और हिंदी भाषा का उद्धार हो जाएगा। लेकिन इसी सरकार के कार्यकाल में संस्कृत की पढ़ाई के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग गए। विश्विद्यालयों में हिंदी भाषा और संस्कृत भाषा की स्थिति दयनीय हो गई।
कलाओं के संवर्द्धन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक पूरा प्रकल्प ‘संस्कार भारती’ के नाम से चलता है। इस प्रकल्प की स्थापना के पीछे भी यही सोच थी कि कविता, नृत्य, संगीत और लोककलाओं की इम्यूनिटी बढ़ाई जाए तो सांस्कृतिक प्रदूषण से देश की सेहत बची रहेगी। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य पुरस्कारों की सूची में से कविता और साहित्य को बाहर करने में मिनिट नहीं लगाया। सूर, तुलसी, निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन जैसे कवियों का उत्तर प्रदेश कवियों को सम्मानित करने से पल्ला झाड़ गया।
वामपंथी सरकार में हों तो उनका भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति से विशेष वैर है ही। कविता के नाम पर जो कुछ वे पढ़ाते हैं उससे अच्छे-ख़ासे कवियों का मोहभंग हो जाए। हाँ, मानवतावाद का उनका दृष्टिकोण स्तुत्य है किंतु वे उस समस्या के दूसरे चरम पर खड़े हो जाते हैं, जिसके एक छोर पर राष्ट्रवाद खड़ा है।
वामपंथियों की सत्ता विश्विद्यालयों में रही तो उन्होंने लालित्य से हीन भाषा और संस्कृति से हीन कलाओं को थोपकर भाषा और कलाओं का बेड़ा गर्क किया। समाजवादियों और सेक्यूलरों के पास भी राजनीति की व्यस्तताएँ इतनी अधिक हैं कि इन्होंने भी भाषा और शिक्षा के प्रति कोई विशेष गंभीरता नहीं दिखाई, लेकिन इन दोनों ने शिक्षा में भाषा की स्थिति को दयनीय बनाने का भी कोई उपक्रम नहीं किया। अब ये आए तो इन्होंने स्वयं को इतना महान मान लिया कि मीरा, सूर, कबीर को पाठ्यक्रम से नदारद करने में भी संकोच नहीं किया क्योंकि उन पृष्ठों पर विचारधारा को पोषित करनेवाली सामग्री प्रकाशित करनी आवश्यक लगी होगी।
जिस ज़मीन को कविता की जुताई नसीब न हो, उस पर न तो संस्कार बोए जा सकते हैं, न ही संस्कृति। एक समय में उत्तर प्रदेश का हिंदी पाठ्यक्रम सर्वश्रेष्ठ होता था। डॉ मुरली मनोहर जोशी ने विज्ञान का शोध हिंदी भाषा में इसी प्रदेश से किया। यहाँ की बोलियों का लालित्य, यहाँ की भाषा, यहाँ का उच्चारण, यहाँ का लोक साहित्य… यह सब छिन गया तो संस्कृति का नाम संग्रहालयों में भी नहीं मिलेगा।
विचारधाराओं के इस नाटक में भाषाएँ नेपथ्य में जा रही हैं और कलाएँ बेचारगी के साथ कोने में पड़ी कुम्हला रही हैं। कलाकार का नाम जानने से पहले उसकी वैचारिक जाति पूछी जाती है। कविताओं से उनका गोत्र और सहित्य से उसका आधार कार्ड मांगा जा रहा है। विमर्शों की महामारी से ग्रस्त हिंदी साहित्य पहले ही जर्जर हुआ जाता है, ऐसे में प्रतिभा से उसकी जाति पूछकर सरकारी तंत्र करेले की बेल को नीम पर चढ़ाने का काम कर रहा है। इन हालों आप समाज से उसकी भाषा छीन लेंगे, और गूंगा समाज अपने नेताओं के जयकारे भी नहीं लगा पाता।
✍️ चिराग़ जैन
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शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, सुरक्षा और आजीविका -ये किसी भी सामाजिक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। इसके अतिरिक्त सड़क, यातायात आदि भी अनेक सुविधाएँ हैं, जो राज्य, नागरिकों के लिए जुटाता है, और नागरिक इसके एवज में सरकार को कर देता है। आपदा के समय सरकारें जो मुआवजा देती हैं, वह भी इन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से दिया जाता है।
भारत में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं की हालत इतनी ख़स्ता है कि यदि कोई अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाता है तो सामाजिक दृष्टि से यह उसके निकम्मेपन और बच्चों के प्रति लापरवाही का प्रमाण बन जाता है। सरकारें बदलती हैं तो इतिहास का पाठ्यक्रम बदल जाता है लेकिन सरकारी स्कूलों का ढर्रा नहीं बदलता।
निजी शिक्षण संस्थान बच्चों के अभिभावकों की हैसियत देखकर बच्चे को प्रवेश देते हैं। सरकारें ‘लोककल्याण’ का ढोल पीटने के लिए ‘बीपीएल कोटा’ जैसी व्यवस्थाएँ करती हैं, लेकिन इन योजनाओं का क्या हश्र होता है, यह कमोबेश सबको पता है। इस विषय पर कटाक्ष करते हुए इसी देश में ‘हिंदी मीडियम’ नाम से एक फ़िल्म भी बनी। क़माल यह है कि जिस फ़िल्म को देखकर हमारी आँखें शर्म से गड़ जानी चाहिए थीं, उसे हमने एक कॉमेडी फिल्म से ज़्यादा महत्व नहीं दिया।
सरकारी अध्यापकों के पास पढ़ाने के अतिरिक्त अनेक दायित्व हैं। पोलियो की दवाई पिलाना, वोटर लिस्ट बनाना, वोटर पर्ची बाँटना, राजनेताओं के दौरे के समय बच्चों को मंत्री जी की जय बोलने की ट्रेनिंग देना और इस प्रकार के तमाम कार्यों में बेचारे इस हद्द तक उलझे रहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए समय ही नहीं मिलता।
किताबें धरी रह जाती हैं और बच्चे व्यवस्था की जटिलताओं और तंत्र की नाकामियों के बीच जीवित रहने के गुर सीख जाते हैं। बिना स्कूल जाए हाज़िरी कैसे लगवाई जाए यह विद्यार्थियों की व्यवहारिक शिक्षा का प्रथम अध्याय बन जाता है।
अव्वल तो पाठ्यक्रमों के आधार पर पढ़ाई होती नहीं, और जहाँ होती भी है, वहाँ पूरी शिक्षा व्यवस्था सभ्य नागरिकों का निर्माण करने में विफल होती दिखाई देती है। सड़कों पर फैली गंदगी, बेतरतीब दौड़ते वाहन, किशोर अवस्था के अपराध, पढ़े-लिखे लोगों द्वारा ऑनलाइन की जा रही ठगी, सार्वजनिक संपत्ति का ध्वंस, सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलती भ्रामक जानकारियाँ और ‘कृपया यहाँ न थूकें’ जैसी तख्तियाँ इस बात की गवाही हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सभ्य नागरिकों का निर्माण करने में विफल हुई है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी ख़ज़ाने का बड़ा हिस्सा वितरित किया जाता है। लेकिन सरकारी स्तर पर नागरिकों को स्वास्थ्य के लिए कितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है; यह कहने की ज़रूरत नहीं है। शिक्षा की तरह ही यदि आप अपने घरवालों का इलाज सरकारी अस्पताल में करवा रहे हैं, तो समाज आपको बेचारा करार दे देता है।
मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि भारत के सरकारी अस्पतालों में सर्वश्रेष्ठ उपचार उपलब्ध है, किन्तु जनसंख्या के अनुपात में इन अस्पतालों की मात्रा इतनी कम है कि उपचार की प्रतीक्षा में सरकारी अस्पतालों के गलियारों में घिसट रहे नागरिकों को देखकर मन खिन्न हो जाता है।
उधर निजी अस्पतालों में मरीज के स्वास्थ्य से अधिक वरीयता अस्पताल के आर्थिक लाभ को दी जाती है। मुर्दों को वेंटिलेटर पर रखकर बिल बनाए जाने की अमानवीयता तक इस देश ने झेली है। टेस्ट लेबोरेटरी से लेकर मेडिकल स्टोर तक इतना पुख़्ता और ईमानदार माफ़िया सक्रिय है कि एक बार बीमार होने के बाद आप निजी स्वास्थ्य सेवाओं की किसी भी दुकान पर चले जाइये, आपसे की हुई कमाई पूरे तंत्र में ईमानदारी से बाँट ही ली जाएगी। आपका नाम एक बार पंजीकृत हुआ नहीं कि डॉक्टर, अस्पताल, मेडिकल स्टोर, दवाई कम्पनी और पैथोलॉजी लैब तक सबका मीटर डाउन हो गया। एक डॉक्टर एक बार टहलने निकलता है; जिसे दौरा या विज़िट कहते हैं; इस बीच जिस-जिस ग्राहक के बिस्तर के पास से गुज़रेगा उस-उसके बिल में डॉक्टर साहब के विज़िटिंग चार्ज जुड़ जाएंगे। आजकल कोरोना की बदौलत ‘आपदा में अवसर’ तलाशते हुए पीपीई किट के चार्ज भी जुड़ गए हैं। एक ही पीपीई किट को पहनकर एक वार्डबॉय सौ मरीज़ों का बुखार नापेगा और वह एक किट सौ मरीजों के बिल में प्रकट हो जाएगी। डॉक्टर के चार्ज अलग, शल्य चिकित्सा के चार्ज अलग, दवाइयों के चार्ज अलग, नर्सिंग स्टाफ के चार्ज अलग, सफाई कर्मचारी तक के चार्ज जोड़ दिए जाते हैं। अस्पताल की पार्किंग ख़ूब महंगी और अस्पताल के केफिटेरिया तक में खुली लूट। बाहर से खाने-पीने का सामान लाने की अनुमति नहीं, क्योंकि यदि बाहर से 10 रुपये की चाय लेकर अस्पताल में आ सके तो अस्पताल की सत्तर रुपये की चाय कौन पियेगा।
इन सबसे तंग आकर यदि आपने अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया तो समझ लीजिए आपका शेष जीवन व्यस्त हो गया। सब जानते हैं कि अदालतों में केस लड़ते-लड़ते आदमी की उम्र गुज़र जाती है, इसीलिए ‘कोर्ट-कचहरी के झमेलों में कौन पड़े’ और ‘अदालत के चक्कर काटते-काटते एड़ियाँ घिस जाएंगी’ जैसे वाक्य हमारे नागरिक जीवन का अंग बन गए हैं। अदालत की इसी व्यवस्था का लाभ उठाकर पेशेवर ठग जनता को लूटते रहते हैं। शिक़ायत करनेवाला अदालत जाने से डरता रहता है और अपराध करनेवाला अदालत का नाम सुनते ही ख़ुश हो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि शिक़ायत होने के बाद फैसले आने से पहले हौसले टूट जाते हैं।
अदालतें कहती हैं कि मुआमले ज़्यादा हैं इसलिए न्याय में देरी होती है; लेकिन मन कहता है कि न्याय में देरी होती है, इसलिए मुआमले ज़्यादा हैं। बिल्डर ने पैसे लेकर फ्लैट नहीं दिया। इस मुआमले में भी जब दशक बीत जाते हैं तो न्याय व्यवस्था की नीयत पर से विश्वास उठ जाता है।
सुरक्षा के लिए नागरिकों के बीच जो सरकारी व्यवस्था है, वह पुलिस कहलाती है। पुलिस की कार्यवाही के दो पक्ष हैं। एक उन फिल्मों की तरह है जिनमें हीरो ईमानदार पुलिसवाला है, उससे पता चलता है कि ईमानदारी के साथ पुलिस महकमे में काम करना कितना असम्भव है। दूसरा उन फिल्मों की तरह है जिसमें हीरो अपराधी है, उनसे यह पता चलता है कि पुलिस को ख़रीदना और पुलिस को चकमा देना कितना आसान है। दोनों ही स्थितियों में आम आदमी पुलिस व्यवस्था से निराश हो जाता है। पुलिसिया भ्रष्टाचार और थानों में किया जाने वाला व्यवहार सभ्य नागरिक को थानों में जाने से बचने की सलाह देता है। इज़्ज़त और सभ्यता से पुलिस विभाग का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। पुलिस यह तर्क देती है कि यदि वे सख्त न हों तो जनता उनकी बात नहीं मानेगी। इस सबसे वह दौर याद आता है जब अंग्रेजों की शासन व्यवस्था में पुलिस का काम भारतीय जनता के बीच डर क़ायम रखना था। सत्ता बदल गई, लेकिन पुलिस का काम करने का ढर्रा वही रहा। दरोगा को माई-बाप और जनाब कहने की हमारी आदतों ने हमें कभी यह आभास ही नहीं होने दिया कि हमारे जन्म से पहले 15 अगस्त 1947 को आज़ादी का नाटक इस देश में खेला जा चुका है।
रह गई आजीविका। उसमें प्रारम्भ से अब तक जो कुछ किया गया है वह ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुआ है। इसमें अकेले सरकार दोषी नहीं है। जो नागरिक सरकारी नौकरियों में लग गए उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा भत्ते, रिश्वत, आरम्परस्ती और छुट्टियाँ गिनने में खपा दी। अव्वल तो स्टाफ ही नहीं है, जो स्टाफ है वह अपनी कुर्सी पर बैठकर स्वयं को सरकार ही समझता है। काम करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि टेबल के उस पार खड़ा नागरिक कुर्सीवाले का आदर कर रहा है या नहीं। यह आदर प्रदर्शित करने में जुड़े हुए हाथ, टिके हुए घुटने, रिरियाता चेहरा उपयोगी सिद्ध होता है। हाँ, जो नागरिक टेबल के नीचे हाथ घुसाकर करारी आवाज़ से साहब को प्रसन्न कर दे, उसके लिए मापदंड अलग हैं। दफ्तरी संस्कृति में कितने ही परिवारों की ज़िंदगी घुट-घुटकर दम तोड़ चुकी है। कितनी आश्चर्यजनक बात है, जो व्यवस्था हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए लागू की गई, उसकी जटिलताओं में ही जीवन होम हुआ जा रहा है।
स्कूल हैं तो पढ़ाई नहीं है, पढ़ाई है तो परीक्षा की प्रक्रिया, उससे बच निकले तो कॉपी जाँच के भ्रष्टाचार में मारे जाओगे। वहाँ से भी बचे तो परिणाम में मिस्टेक रहेगी, वह नहीं हुआ तो नौकरी ढूंढने के महाव्यूह, फिर जॉइनिंग की जटिलताएँ… सिस्टम तब तक आपका पीछा करेगा जब तक आप थककर गिर न पड़ें।
जो राज्य में विश्वास न रखे उसे अराजक कहा जाता है। मैं अराजकता का समर्थन नहीं करता लेकिन राज्य पर विश्वास कैसे किया जाए – यह उपाय जानने का उत्सुक हूँ।
इस लेख को पढ़कर अनेक लोग मुझे भाजपाई, कांग्रेसी, वामपंथी, समाजवादी और न जाने किन किन खेमों में खड़ा करेंगे। लेकिन मेरी लेखनी केवल उनके लिए है जो इन सब झरोखों से दूर होकर एक ख़ालिस भारतीय के जूते में पैर रखकर चिंतन करने को तैयार हो। क्योंकि मैं जानता हूँ कि नेहरू जी के अंदाज़े की ग़लती से जो युद्ध हुआ था उसका खामियाजा भी नागरिक ने ही भुगता था और मोदी जी ने जल्दबाज़ी में जो निर्णय लिए उनका खामियाजा भी नागरिक ही भुगत रहा है।
अगर न्यायपालिका और पुलिस में से किसी एक गलियारे को दुरुस्त किया जाए तो इसका प्रभाव पूरे देश के तंत्र पर दिखने लगेगा। और तब सही अर्थों में राज्य ‘लोककल्याणकारी’ बन सकेगा। झंडों का रंग हो तो हो, लेकिन आँसुओं का कोई रंग नहीं होता साहब।
✍️ चिराग़ जैन
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21 जून बीत गया और दुनिया समाप्त नहीं हुई। यह बड़ी शर्मनाक बात है। एक प्रतिष्ठित समाचार चैनल ने इतनी शिद्दत से दुनिया के समाप्त होने की घोषणा की थी, क्या उस चैनल की इज़्ज़त का भी ख्याल न किया, डूब मरना चाहिए ऐसी बेशर्म दुनिया को। आज अगर दुनिया समाप्त हो गई होती तो वह चैनल टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ चुका होता।
यह ढीठ रवैया पहली बार देखने को नहीं मिला है। इससे पहले भी कई छोटे-बड़े अवसर ऐसे रहे हैं जब नियति ने अंतिम समय पर अपना निर्णय बदलकर हमारे मीडिया की साख पर बट्टा लगाया है। अभी कुछ दिन पहले ही तूफान ने पर्सनली फोन करके मीडिया को बताया कि इस बार मुंबई को नेस्तोनाबूद करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। मीडिया के कर्मठ कर्मवीरों ने मुम्बई के चप्पे-चप्पे पर कैमरे और ओबी वैन तैनात कर दिए, नरीमन पॉइंट से लेकर जुहू चौपाटी तक पत्रकारों ने मोर्चा संभाल लिया कि जिस जगह से भी तूफ़ान एंट्री करेगा वहीं से लाइव कवरेज जारी हो जाएगी। एक-एक मिनिट पर नई प्लेट्स बनती रही। ग्राफिक डिजाइनरों ने सारी ताक़त झोंक दी कि कहीं तूफ़ान की एंट्री के शॉट्स फीके न रह जाएँ, ऐसा न हो कि तूफान मुंबई को तबाह कर दे और हम उसके ग्राफिक्स में कमज़ोर रह जाएँ। हर लहर का एक्सट्रीम क्लोज़ अप ऑन एयर हुआ। कौन जाने किस लहर पर तूफ़ान की सवारी आ जाए। मुंबई बचे या न बचे, लेकिन तूफान की एंट्री में चूक न हो जाए।
बेचारे पत्रकार लहर-लहर का नमक फाँकते रहे और तूफ़ान फुस्स हो गया। मुंबई को तबाह होते देखने के अरमान लिए बैठी जनता को निराशा से बचाने के लिए एकाध गिरे हुए पेड़ों को क्लोज़ अप शूट करके तबाही का टिपर चलाना पड़ा। एकाध जगह उड़ी टीन शेड के शॉट्स को मजबूरी में छतें उड़ने के वॉइस ओवर के साथ एयर करना पड़ा। तूफ़ान ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यहाँ तक कहा कि समुद्र के किनारे पड़े भारी-भरकम पत्थर हवा में उड़ने लगेंगे। तूफान के इस बड़बोलेपन को सच मानकर मीडिया ने एक सप्ताह तक माहौल बनाए रखा। कई चैनल्स ने तो भूत-प्रेत और सास-बहू जैसे महत्वपूर्ण बुलेटिन तक तूफ़ान की अगुआई में न्यौछावर कर दिए। लेकिन तूफ़ान शेख़चिल्ली की औलाद निकला। जो-जो मीडिया को बताया था, उसमें से एक भी बात सच नहीं निकली। दुनिया मुम्बई को तबाह होते देखने के लाइव नज़ारों से वंचित रह गई और निराश पत्रकार अपना साजो-सामान उठाकर ब्यूरो में वापस लौट आए।
बहुत दुःख होता है साहब। मीडिया के साथ यह खिलवाड़ अच्छा नहीं है। ख़ुद सूर्य ने मीडिया को फोन किया था कि इस बार के सूर्यग्रहण से दुनिया तबाह हो जाएगी। हालाँकि तूफ़ान वाले झूठ के ज़ख़्म अभी भरे नहीं थे, लेकिन फिर भी हमारी मुस्तैद मीडिया सूर्य के एक फोन कॉल का सम्मान करते हुए ज्योतिषियों, खगोल शास्त्रियों, वैज्ञानिकों और गणितज्ञों को लेकर स्टूडियो में बैठ गई। जब ये सब लोग स्टूडियो में पहुँच गए तब एंकर को ध्यान आया कि इनमें से किसी ने भी अगर कोई ग़लत बात बोल दी, तो उससे जनता में अफ़रा-तफ़री मच जाएगी। यह विचार आते ही एंकरों ने मोर्चा संभाला और ख़ुद बोलना शुरू कर दिया। जब तक बुलेटिन चला तब तक नॉनस्टॉप बोलते रहे। विशेषज्ञों से सवाल पूछे गए क्योंकि यह एंकरिंग का कर्तव्य था, लेकिन उन्हें जवाब देने का अवसर नहीं दिया गया क्योंकि यह एंकर का धर्म था। पहले से प्राप्त जानकारियों को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया गया, क्योंकि इस ग्रहण के बाद इतनी तबाही मचने वाली थी कि फिर शायद ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का वह स्पॉट देखने का मौका बेचारे दर्शकों को कभी न मिल पाता, इसलिए ‘तीन बजकर दस मिनिट पर ग्रहण समाप्त होगा’ – यह बात भी ब्रेकिंग न्यूज़ बना दी गई। इधर चंद्रमा ने सूर्य को एक कोने से घेरना शुरू किया, उधर एंकरों का स्वर ओज़ोन लेयर पार करने लगा। फायर रिंग का दृश्य बना और एंकर ऐसे उतावले होने लगे जैसे पहले से देखी हुई एक्शन फ़िल्म को दोबारा देखते हुए पड़ोसी को आगे का सीन बताने की उतावली में कोई कुर्सी का हत्था तोड़ दे। एंकरों का स्वर चंद्रमा पर पड़े विक्रम लैंडर से टकराने लगा। चंद्रमा अपनी गति के अनुसार सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुज़र गया। दुनिया बच गई लेकिन मीडिया मर गया। दुनिया तबाह नहीं हुई। सूरज की फोन कॉल फेक निकली।
क्या-क्या याद करें साहब। भारत में कोयले का स्टॉक ख़त्म होने की ख़बर हो या कोसी की बाढ़ में पूरा उत्तर भारत बह जाने की ख़बर; धूमकेतु टकराने की पक्की जानकारी हो या धरती के भीतर चल रही हलचल का आँखों देखा हाल; मीडिया हर ख़बर को सीरियसली लेता रहा और प्रकृति धोखा देती रही।
जनता सच से वंचित न रह जाए इसलिए बेचारे दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मन के भीतर भी ट्रांसमीटर फिट कर आए हैं। ट्रम्प हो या पुतिन, चीन हो या पाकिस्तान; उनके मन में जैसे ही कोई विचार आता है तुरंत यहाँ प्रोम्पटर पर बीप होने लगती है। चैनल्स तुरन्त उस विचार को अपने दर्शकों तक पहुँचा देते हैं। अब अगर कोई अपने मन में आए विचार पर न टिके तो इसमें मीडिया क्या करे? बात से पलटते हैं ट्रम्प और नाम बदनाम होता है भारतीय मीडिया का। ऐसी ही हरक़तों के कारण ‘हड़प्पा न्यूज़’ और ‘मोहनजोदड़ो टीवी’ जैसे चैनल्स किसी इनपुट को इग्नोर कर गए और उस समय दुनिया की तबाही की फुटेज तैयार न हो सकी। तब प्रकृति ने गच्चा न दिया होता तो आज उन सभ्यताओं के विनाश की वजह का ‘अनुमान’ न लगाना पड़ता। बस एक पैन ड्राइव खोजनी होती और सारा सीन एचडी फॉरमेट में देख पा रहे होते।
पर इस बार कम से कम हमारे देश में ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। हमारी जनता मीडिया के साथ है। इतनी सब बातें झूठ निकलने के बावजूद, जनता ख़बरों पर अटूट विश्वास करती है। क्योंकि जनता जानती है कि पूरी क़ायनात हमारे चैनल्स को झूठा सिद्ध करने पर उतारू है। लेकिन हम इस सत्यवादी मीडिया को झूठा मानकर इसका साथ नहीं छोड़ सकते। हमने मीडिया को अभयदान दे रखा है कि सूरज, चांद, मंगल, धूमकेतु, बाढ़, तूफ़ान, भूकम्प, बादल, ट्रम्प, इमरान, पुतिन, कैमरून और कोरोना तक जहाँ से जो इनपुट मिले उसे जस का तस सुंदर ग्राफिक्स के साथ ब्रॉडकास्ट करो। क्योंकि अगर किसी दिन कोई इन्फॉर्मेशन सही निकली और दुनिया तबाह हो गई तो हमारा मीडिया दुनिया को क्या मुँह दिखाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
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कोई लागत से भी कम क़ीमत पर माल बेच रहा है, तो समझ लो कि वह व्यापार नहीं कर रहा, वरन बाज़ार पर कब्ज़ा कर रहा है। बाज़ार का एक ही धर्म है, मुनाफ़ा। जो आज इस धर्म से विमुख दिख रहा है, उसका कल कट्टर होना तय है। क़ीमत बहुत कम हो तो नीयत ख़राब होगी। सुनते हैं, दूध-दही पीनेवाले देश में चाय मुफ़्त बाँटी गई थी। लोगों ने मुफ़्त में चाय की चुस्की ली और चाय के व्यापारियों ने देश लूट लिया।
हमारे देश में एक मध्यमवर्गीय आदमी टैक्सी करने से डरता था। टैक्सीवालों की मनमानी और उनकी गुंडागर्दी से त्रस्त लोगों को जैसे ही आठ रुपये प्रति किलोमीटर का रेट दिखा तो लोग लपककर रेडियो टैक्सी में घूमने लगे। कूपन, ऑफर और न जाने कितना पैसा फेंककर इन कम्पनियों ने डेढ़ साल में हर मोबाइल में अपनी उपस्थिति बना ली। लोग पुरानी टैक्सियों और ऑटो रिक्शा को छोड़कर, धड़ल्ले से रेडियो टैक्सी की सुविधा के अभ्यस्त हो गए। फिर कोई कूपन नहीं, सर्ज लगने लगा, रेट बढ़ते-बढ़ते औसतन बीस-पच्चीस और कभी-कभी तीस-पैंतीस रुपये प्रति किलोमीटर तक जाने लगे।
खिलौनों की क़ीमतें अचानक से बाज़ार में औंधे मुँह गिरीं। शानदार पैकेजिंग के साथ चीनी सामान ने भारतीय व्यापार पर कब्ज़ा कर लिया। चीन का दृष्टिकोण व्यापक था। वह सस्ते खिलौने बेचकर भारत की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ कर रहा था। आज भारतीय बाज़ारों से चीन को खदेड़ना कितना महंगा पड़ रहा है, यह हम सबके सामने है।
हम कलाकारों के पास बहुत से लोग आते हैं कि हम आपका प्रमोशन मुफ्त में करना चाहते हैं। हम आपका डिजिटल मार्केटिंग का सारा काम करेंगे, आपको कोई पैसा नहीं ख़र्च करना पड़ेगा। सारा काम हम करेंगे, और आपको कुछ पैसा भी दे देंगे। इतनी विनम्रता हमें ख़ुश कर देती है और हम ख़ुशी-ख़ुशी जंगल के शेर से सर्कस के शेर बनने को तैयार हो जाते हैं।
जब कोई टेलीकॉम कंपनी मुफ्त में मोबाइल सेवा देती है, जब कोई पैथोलॉजी लैब नगण्य क़ीमत में हज़ारों रुपये के टेस्ट करने का दावा कर रही हो, जब कोई राजनैतिक दल मुफ़्त समान बाँटकर वोट मांग रहा हो तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। ये सब व्यापारी हमारी लालची प्रवृत्ति और स्थापित व्यापारियों की बेध्यानी या गुंडागर्दी का लाभ उठाकर बाज़ार में दस्तक देते हैं।
अगर कोई दोस्त आवश्यकता से अधिक अपनापन दिखाकर आपके घर पर पैसा लुटा रहा है तो उसकी दोस्ती को टटोल लेना आवश्यक है।
बाज़ार की यह नीति अब राजनीति में भी धड़ल्ले से चल रही है। हमारी सरकार आई तो आपको बिजली फ्री मिलेगी; हम आपको राशन फ्री देंगे; हम आपका कर्ज़ा मुआफ़ कर देंगे; हम आपसे बस में यात्रा के पैसे नहीं लेंगे… इन जुमलों से सत्ता हथियाने में सभी दल सक्रिय हैं।
आपको भूख लगने पर रोटी कमाने की शिक्षा देनेवाला व्यक्ति देखने में क्रूर लग सकता है लेकिन वह वास्तव में आपका गुरु होता है, जो आपको आत्मनिर्भर बनाना चाहता है। लेकिन भूख लगने पर आपकी झोली में रोटी डाल देनेवाला व्यक्ति चुपके से आपको भिखारी बना रहा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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हम खोखले आदर्शों और तन्त्रीय विफलताओं के एक ऐसे शिकंजे में जकड़े जा चुके हैं, जिसमें से निकलने के लिए शिकंजे को जड़ समेत उखाड़ देने की शक्ति से कम बात न बनेगी।
संविधान एक ऐसी किताब है, जिसको किसी लोकतंत्र की रीढ़ कहा जा सकता है। किन्तु इस रीढ़ में स्लिपडिस्क कैसे किया जाता है, यह कला हमारी विधायिका को बख़ूबी मालूम है। विधायिका इसे हारमोनियम की तरह प्रयोग करती है। सुर इसमें सारे हैं, लेकिन किस खटके को कब दबाकर अपने मतलब का राग अलापा जाए, यह ज्ञान राजनीति के ककहरे में सिखा दिया जाता है। सत्ता संभालने से पूर्व इसी किताब की शपथ उठाई जाती है। जब शपथ-ग्रहण चल रहा होता है, तब शपथ लेनेवाले को भी ज्ञात होता है कि इस शपथ से बड़ा झूठ दुनिया में कोई नहीं है। शपथ दिलानेवाला भी जानता है कि शपथ की शब्दावली पूर्ण होने तक भी यह शपथ नहीं टिकेगी। लेकिन शपथ-ग्रहण की औपचारिकताओं का अभिनय चलता रहता है और विनम्रता की भूमिका अदा करता ‘जनप्रतिनिधि’ बिना पैसा ख़र्च किये एक मिनिट से भी कम समय में पूरे देश को यह बता देता है कि ‘मैं (नया मसीहा) अब तुम्हारा देश चूसने के लिए अधिकृत हो गया हूँ।’
ये शब्द सुनते ही पूरी ब्यूरोक्रेसी उसके जूते के नम्बर के मुताबिक अपनी खोपड़ी सेट कर लेती है। वह जिस क्षेत्र पर पिकनिक मनाने निकलता है, वहाँ तहलका मच जाता है। इससे अधिक क्या तबाही होगी कि उस क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों की नींद उड़ जाती है। अधिकारी रात-दिन दफ़्तर में रहकर चप्पे-चप्पे पर अपनी और अपने कर्मचारियों की खोपड़ियाँ बिछाते हैं कि पता नहीं किस चप्पे पर साहब का मन जूता मारने को मचल उठे, वह चप्पा ख़ाली रहा तो साहेब को कितनी निराशा होगी। ध्यान रहे कि हमारी संवेदनशील ब्यूरोक्रेसी यह सब श्रम साहेब को ख़ुश करने के लिए करती है, जनता को ख़ुश करने के लिए नहीं। साहेब भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए ब्यूरोक्रेसी का दिल दुखाये बिना, वे ख़ुश होकर लौट आते हैं। दोनों के बीच का यह समर्पण देखकर जनता की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ जाते हैं।
सब कुछ अभिनय मात्र है। औपचारिकताओं की इतनी लंबी फेहरिस्त है कि जीवन और औपचारिकताओं की होड़ में जीवन हमेशा छोटा रह जाता है।
संविधान में एक मज़ेदार बात और लिखी है कि संविधान का अपमान करनेवाले को बख़्शा नहीं जाएगा। इस बात ने संविधान को धर्मग्रन्थ बना दिया है। अब अगर किसी को इस किताब को जलाते, पटकते, गिराते, फाड़ते देखा गया या इस किताब पर प्रश्नचिन्ह लगाते देखा गया तो वह राष्ट्रद्रोही माना जाएगा लेकिन अगर कोई विधिवत इसको पढ़कर इसके साथ खिलवाड़ करे तो उसे पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
हमारा संविधान इतना लचीला है कि अगर मेरा इस तंत्र के किसी रेशे से पंगा हो जाए तो इस लेख में संविधान को महज एक किताब कहने के अपराध में मुझ पर कार्रवाई हो जाएगी और मुझे तंत्र के रेशों को ख़ुश करना आ जाए तो फिर पूरी किताब मेरे पक्ष में काम करने लगेगी।
हमारे यहाँ वक़ालत में न्याय दिलाने की पढ़ाई नहीं कराई जाती, बल्कि यह सिखाया जाता है कि इस किताब को किस कब किस एंगल पर रखकर न्याय को और जटिल बनाया जा सकता है। जो जितना जटिल बना दे, वह उतना बड़ा वक़ील। न्यायाधीश अपने कोर्ट में अधिवक्ताओं के इस कौशल को देखकर प्रसन्न होते रहते हैं। न्यायाधीश जानते हैं कि वक़ील अपने लाभ के लिए केस को लंबा किये जा रहे हैं। अदालतें न्याय नहीं देतीं, वे वैराग्य देती हैं। जो दो लोग विवाद के चरम तक पहुँचकर अदालत में आए हों, उन्हें यह ज्ञान कराया जाता है कि ‘जो लोग आपस में लड़ते हैं उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।’ यह ज्ञान होते ही वे दोनों लड़ाके कोर्ट की कैंटीन में बैठकर हँसी-ख़ुशी आपस का विवाद सुलझा लेते हैं। दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुक जाते हैं और विवाद सुलझ जाता है। इससे समाज में आपसी सौहार्द, विनम्रता, मेलमिलाप और भाईचारा बढ़ता है। एक पंथ, दो काज हो जाते हैं। अदालतों का मनोरंजन भी हो जाता है और विवाद भी स्वतः सुलझ जाते हैं। लेकिन ध्यान रखना कि इन अदालतों के विरोध में कुछ भी कहा तो कहीं के नहीं रहोगे।
कार्यपालिका का तो कहना ही क्या। वे इस तंत्र के सबसे सरल सोपान हैं। कोई छिपाव नहीं। कोई हिप्पोक्रेसी नहीं। कोई ड्रामेबाज़ी नहीं। सीधी बात, पैसा है तो ठीक, वरना रगड़ दिए जाओगे। अब यह मत सोचने लगना कि कैसे रगड़ दिए जाओगे। शुरू से यही बात समझा रहा हूँ। पुलिसवाला नाराज़ हो गया तो किसी को भी, किसी भी समय चार-पाँच धाराएँ लगाकर धर लेगा। वे धाराएँ सही हैं या ग़लत -इसे सिद्ध करने के लिए अदालत जाना पड़ेगा। वहाँ चल रहे मनोरंजन कार्यक्रम में बीच-बीच में एकाध सीन आपका भी जुड़ जाएगा। उसमें न्याय तलाशने के लिए संविधान टटोलोगे तो अंत में यही ज्ञान होगा कि तंत्र से पंगा नहीं लेने का, वरना धरे जाओगे!
यही बात तो मैं समझा रहा हूँ। लेकिन किसको समझा रहा हूँ। उस जनता को, जो दस-पाँच हज़ार करोड़ के घोटाले को भ्रष्टाचार मानना बंद कर चुकी है। उस जनता को, जो तंत्र के किसी तिनके से पहचान निकलते ही ख़ुद भ्रष्टाचारी होने को तैयार बैठी है। उस जनता को, जो एप्रोच और रिश्वत की सरल राह पर चलने को धर्म मान बैठी है। उस जनता को, जो दो-चार मर्डर और एकाध बलात्कार करनेवाले को वोट दे आती है। उस जनता को, जो अपनी ख़ामोशी से राजनीति को शोषक, न्यायपालिका को अकर्मण्य और कार्यपालिका को भ्रष्ट होने के अवसर उपलब्ध कराती है।
और कौन समझा रहा है? मैं, जो इस कालखण्ड में अपनी समझ के अनुसार परत-दर-परत आकलन करने के बावजूद सम्पूर्ण क्रांति के एकमात्र उपाय की ओर इंगित करने से इसलिए बचता हूँ कि इस तंत्र से पंगा कौन ले!
हम निराशा के उस छोर को छू रहे हैं, जहाँ उम्मीदों की लाशें सड़ांध मारने लगी हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, दफ़्तर, चुनाव, कला, मीडिया, कृषि सब जगह माफ़िया काम कर रहा है। देश की जड़ों में जो घुन लगा है, वह भी अब भूखा मर रहा है। चीख़ने की ज़रूरत है और हम बोलने में भी हिचक रहे हैं।
इस तंत्र के कुछ ऐसे अंग हैं, जो गुप्त रूप से तंत्र में विद्यमान हैं। तंत्र के विविध रेशे अपनी सुविधा के अनुसार इन अंगों का उपभोग करते रहते हैं।
युवा इस बात से ख़ुश हैं कि ‘यूट्यूब पर फलाने बंदे की वीडियो देखकर मज़ा आता है, क्योंकि वो सबकी जमकर लेता है।’ जो जितना अश्लील, वह उतना हिट। और हम शालीनता के लबादे में अश्लील होने का अवसर तलाशते किंपुरुष।
युवा अबोध हैं, इसलिए बिना झिझके अश्लीलता को लाइक करते हैं। हम समझदार हैं इसलिए चोरी-छिपे मन ही मन लाइक करते हैं, पर बाहर से शालीन बने रहते हैं।
इस दोहरे चरित्र के साथ तन्त्रीय विफलताओं के इस शिकंजे को उखाड़ना असम्भव है। हम रोज़ ख़ुद से झूठ बोलते हैं कि सब सही हो जाएगा। क्योंकि ज्ञान हमें झूठ बोलना सिखाता है और व्यवहारिक ज्ञान हमें ख़ुद से झूठ बोलना सिखाता है।
✍️ चिराग़ जैन