प्रेम चलकर नित्य आता है हमारे द्वार अब भी
पर हमारी बाजुओं का पाश छोटा हो गया है
रोज़ सूरज रश्मियां अपनी लुटाता फिर रहा है
पर धरा की सोच का आकाश छोटा हो गया है
स्वप्न देखें रौशनी का, आँख पलकों में छिपाकर
कोसते हैं भाग्य को हम, अवसरों से मुँह चुराकर
साँस का सत्कार करने का नहीं है होश हमको
चाहते सौभाग्य हम, दुर्भाग्य पर नज़रें गड़ाकर
सामने खुशियाँ सुगंधित फूल चुनकर रख रही हैं
पर हमारी पुतलियों का व्यास छोटा हो गया है
उत्सवों में हम निजी एकांत लेकर जी रहे हैं
वास्तविकता त्याग दी, सिद्धांत लेकर जी रहे हैं
रोज़ करते फिर रहे पाखण्ड हम गंभीरता का
हम उदासी के लिए मुख क्लांत लेकर जी रहे हैं
हर गली, हर गाम पर, बिखरी पड़ी हैं खिलखिलाहट
पर हमारे प्राण में उल्लास छोटा हो गया है
अतिथियों को नाम से आवास घबराने लगा है
भूख इतनी बढ़ गई, उपवास भय खाने लगा है
हास्य को उपरांत यूँ संत्रास की चिंता बढ़ी है
क्रोध की कर कल्पना परिहास कतराने लगा है
कौन जाने किस घड़ी किसने छला है हम सभी को
आदमी का आपसी विश्वास छोटा हो गया है
✍️ चिराग़ जैन