एक मज़हब को पनाह दी थी कभी बस्ती ने
आज तक ज़ात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
इक हसीं शाम की ख़्वाहिश में क़दम बहके थे
अब तो हर रात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
ग़ैब ख़ामोश था जब क़त्ल हुए थे जंगल
इसकी बरसात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
गर कलम शाही तमन्नाओं की परवाह करे
फिर तो हर हाथ को क़ीमत चुकानी पड़ती है
सबकी मुस्कान बनाए रखूँ इस चाहत की
मेरे जज़्बात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
✍️ चिराग़ जैन