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जनता की धमक

20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र की मनोदशा का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है। जून 2026 में आरंभ हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को जनता का कितना समर्थन मिला, कितना नहीं मिला -यह सही-सही कह पाना तो मेरे लिए संभव नहीं है। किन्तु सोनम वांगचुक को धरनास्थल से उठाए जाने की घटना ने जनता को कितना उद्वेलित किया, यह पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा।
जिस युवापीढ़ी में लोकप्रिय होने की होड़, पूरी दुनिया की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन चुका है, उसी युवापीढ़ी की आवाज़ को अनसुना करने की भूल राजनीति को नहीं करनी चाहिए थी। स्कूल-कॉलेजों में पढ़नेवाली जिन ऊर्जारश्मियों के बूते देश की आंखों में भविष्य के स्वप्न झिलमिलाते हैं, उन्हीं पर आंसूगैस के गोले छोड़ते समय प्रशासन की कोरें भीग जानी चाहिए थीं।
जिन सुकोमल पीढ़ियों को पोषित करके देश को अपने बुढ़ापे की लाठी तैयार करनी थी, उन्हीं पर लाठीचार्ज करते हुए प्रशासन की टांगें कांप जानी चाहिए थीं।
सोशल मीडिया के वीडियो गवाह हैं कि जब नीली वर्दीधारी पांच-छह सशस्त्र जवान अभद्रभाषा बोलते हुए एक अकेले नौजवान पर बलप्रयोग कर रहे थे, तब उस नौजवान ने प्रतिहिंसा नहीं की। उल्टे उसने गांधी की राह पकड़ी और सचमुच दूसरा गाल आगे करके उन लाठी बरसानेवालों को शर्मिंदा कर दिया। यह दृश्य गवाह है कि गांधी इस देश की शिराओं में आज भी ज़िन्दा हैं।
20 जुलाई 2026 के तमाम दृश्यों को आप ध्यान से देखेंगे तो आपको पुलिस की आंखों में आंखें डालकर चुनौती देते हुए ‘भगतसिंह’ दिखाई देंगे। 20 जुलाई 2026 के वीडियो दोबारा खंगालेंगे तो आपको वह भारत फिर से दिखाई देगा, जो किसी भी तरह के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना अपना नैतिक कर्तव्य समझता है।
20 जुलाई 2026 को क्नॉट प्लेस की सड़कों ने लाला लाजपतराय को भी याद किया और बटुकेश्वर दत्त को भी। चीत्कार के स्वर में पुलिसवालों को लताड़ती लक्ष्मीबाई भी दिखीं। ‘हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ -बिलखकर ऐसे मासूम प्रश्नों से पुलिस की वर्दी में खड़ी महिलाओं को नज़रें छुपाने पर विवश करती बेटियां भी दिखीं।
दुनिया ने चाहे जो कुछ देखा हो, लेकिन बर्बर प्रशासनिक आदेशों का पालन करने पर विवश पुलिसकर्मियों के चेहरे पर अनेक बार मुझे मनुष्यता के पदचिन्ह दिखे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन देश के लिए इन अर्थों में भी विशेष था कि इसमें आनेवाले किसी भी ‘स्टार’को कल अपने-आपको अपनी ख़ुद की नज़रों में स्टार बनाए रखने के लिए उन हज़ारों-लाखों ‘ट्विंकल लिटिल स्टारों’ की ज़रूरत थी, जो जंतर-मंतर पर पुलिस की लाठियां और झिड़कियां खा रहे थे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन मेरे लिए इसलिए पूर्ण सफल है कि युवा पीढ़ी का नाम आते ही अराजकता की आशंका जतानेवाले प्रशासन के पास कल इस पीढ़ी को अराजक सिद्ध करने का कोई उपाय न मिल सका। न कोई नेता, न कोई संगठन, न कोई स्पांसर, न कोई व्यवस्था… केवल एक जुनून। केवल एक जज़्बा। केवल एक अपनत्व। केवल एक देश।
जब-जब सत्ता ने विरोध के स्वर को दुश्मन मानने की भूल की है, तब-तब जनता को सड़क की राह पकड़नी पड़ी है। मैं इस देश का एक नागरिक होने के नाते अपनी विधायिका से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि यह जनता आपको प्यार करती है, इसीलिए अपने भविष्य का नियामन आपके हाथों में सौंपकर निश्चिंत होना चाहती है। सब जानते हैं कि ये देश बहुत बड़ा है। सब जानते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ लोगों के भविष्य की नीतियां बनाने में आपसे कुछ चूक हो सकती है।
इस चूक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के जनप्रयासों को कान देकर सुनने की ज़रूरत है। विरोध के स्वर कर्कश ज़रूर होते हैं लेकिन उनके अंत से सौहार्द और समर्थन का महानाद खोज लेनेवाला ही महानायक होता है।

✍️ चिराग़ जैन

आधुनिक आंदोलन और पौराणिक सन्दर्भ

“जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।” -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया।
अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी प्रणालियों का उदाहरण हमारे पुराणों में मिल जाता है।
अपनी बात मनवाने के लिए किसी अधिकृत व्यक्ति पर दबाव बनाने का उपाय आंदोलन कहलाता है। यह प्रयास एकल भी हो सकता है और सामूहिक भी।
राजनैतिक, सामाजिक अथवा व्यवस्था संबंधी किसी परिवर्तन हेतु किया गया यह प्रयास आधिकारिक रूप से एक शक्तिसंपन्न व्यक्ति के कानों तक अपेक्षाकृत सामान्य व्यक्तियों की आवाज़ पहुँचाने हेतु किया जाता है।
सामन्यतः आंदोलन करनेवाला व्यक्ति व्यवस्था से निराश नहीं होता, अपितु वह व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन करके उसे और अधिक जनहितैषी बनाने का समर्थक होता है।
श्रीकृष्ण के आह्वान पर जब गोकुलवासियों ने कंस के सैनिकों को करस्वरूप मक्खन देने से स्पष्ट मना किया था तो सम्भवतः ‘हड़ताल’ या ‘तालाबंदी’ का प्रथम उदाहरण घटित हुआ। इसी प्रकार इंद्र की पूजा बंद करके, गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय एक स्थापित सत्ता का ‘बहिष्कार’ करते हुए ‘तख्ता पलट’ करने का उदाहरण हो सकता है।
रामकथा में अशोक वाटिका में बैठी माँ सीता, जब अन्न-जल त्यागकर अपनी काया को कृश कर लेती हैं तो यह ‘अनशन’ का प्रमाण है।
माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र को राजा बनाने के प्रयासों का भरत ने ‘इस्तीफा देकर विरोध’ दर्ज किया।
हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने पिता को भगवान मानने से इंकार करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ खड़ा कर दिया था।
सावित्री ने सत्यवान का जीवन लौटाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग करके यमराज के निर्णय को बदल दिया था।
सागर मंथन ‘मानव शृंखला’ का उदाहरण है, तो समुद्र मंथन के समय हलाहल के निदान हेतु श्रीशिव को दिये गये ज्ञापन की प्रवृत्ति, ‘जनहितयाचिका’ जैसी मानी जा सकती है।
कठोपनिषद के नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध के विरोध में तीन दिन तक यमराज के द्वार पर ‘धरना’ दिया।
द्रौपदी ने केश खोलकर पाण्डवों के सम्मुख ठीक वैसा ही विरोध प्रदर्शन किया था जैसे आजकल ‘काले झंडे’ अथवा ‘काली पट्टी’ बाँधकर किसी को शर्मिंदा किया जाता है।
गांधारी की आँखों पर पट्टी बांधने का प्रकरण ‘प्रतीकात्मक विरोध’ जैसा प्रतीत होता है और कर्ण के रथ को हाँकनेवाले मद्रराज शल्य ने ‘असहयोग आंदोलन’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहाँ तक कि माता दाक्षायिनी ने अपने पिता की हठधर्मिता के विरुद्ध योगाग्नि का आह्वान किया और स्वयं को भस्म कर लिया। यह घटना ‘आत्मदाह’ के ‘चरम विरोध’ का उदाहरण बन गई। श्री शिव का तांडव नृत्य तो स्पष्ट रूप से ‘उग्र विरोध प्रदर्शन’ है ही।
इसके अतिरिक्त भी लंकादहन, अशोक वाटिका ध्वंस, भीष्म प्रतिज्ञा, गंगावतरण और वामनावतार सरीखे अनगिनत पौराणिक प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि व्यवस्था को जनकल्याणकारी बनाए रखने के लिए सत्ता की नीतियों का विरोध करना दरअस्ल सत्ता का विरोध नहीं होता।
घेराव, ज्ञापन, याचिका, धरना और रैलियों का उद्देश्य सत्ता को परेशान करने की बजाय समस्या पर ध्यान केंद्रित करना भी हो सकता है।
यदि शासन ने जनता के साथ अपनत्व का संबंध बिसार नहीं दिया हो तो उसे हर आंदोलनकारी एक तपस्वी प्रतीत होता है। और यदि शासन ने सत्तामद में जनता को तुच्छ समझना सीख लिया हो तो वह हर तपस्या को राजद्रोह घोषित करने का अभ्यस्त हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

औचक निरीक्षण की पूर्वसूचना तो देनी चाहिए ना!

परिवहन व्यवस्था का हाल जानने के लिए एक मंत्री जी अपने ही प्रदेश की रोडवेज बस में सवार हो गए। वो भी भेष बदलकर, बिना लालबत्ती, बिना सुरक्षा-दल और बिना कैमरे की घोषणा किए।
ये कैसे शौक पाल लिए हैं नेताओं ने। व्यवस्था से मंत्रियों का क्या लेना। अरे भई अपने चुनाव, वोट, ठेके, पोस्टिंग-ट्रांसफर पर ध्यान दो और अपनी कुर्सी सम्भालो!
सोचिए, फाइल में जिस व्यवस्था को अधिकारी ने “संतोषजनक”, “उत्कृष्ट” और “जनहितकारी” लिख दिया है, उस पर भरोसा करने में क्या दिक्कत है? यह तो अपने ही विभाग की रिपोर्ट पर अविश्वास है।
अब पंगा लोगे तो झटका तो लगेगा ही। कंडक्टर ने खुले पैसे न होने के कारण मंत्री जी को बस से उतार दिया। यात्रियों की भाषा में इसे बदतमीज़ी कहते हैं, लेकिन विभागीय शब्दावली में शायद इसे “आत्मविश्वासपूर्ण कार्यशैली” कहा जाता होगा।
मंत्री जी ने सोचा, कि बस से उतरकर ऑटो कर लेते हैं। मगर वहाँ भी लोकतंत्र और मंत्री जी चक्कर खा गए। मीटर से चलने के प्रस्ताव को ऑटोवाले ने पूर्णमत से धराशायी कर दिया। मीटर लगा था, पर उसका काम किराया बताना नहीं, वाहन की शोभा बढ़ाना था। किराया तो चालक के मूड, यात्री के कपड़े, मौसम, ट्रैफिक और ग्रह-नक्षत्र देखकर तय हो रहा था। मंत्री जी हैरान रह गए।
लेकिन असली हैरानी जनता को हुई। जनता सोचने लगी कि यह आदमी कौन है, जिसे आज पहली बार पता चला कि कंडक्टर रूखा बोलते हैं और ऑटोवाले मीटर से नहीं चलते?
सबसे चिंता की बात यह है कि नेताओं की यह आदत समाज को गलत संदेश दे रही है। अगर मंत्री खुद बसों में घूमकर सच्चाई खोजेंगे, तो फिर निरीक्षण समितियाँ क्या करेंगी? शिकायत प्रकोष्ठ किसलिए हैं? दर्जनों बैठकें, सैकड़ों समीक्षा रिपोर्टें और हजारों पन्नों की प्रगति-रिपोर्ट आखिर किस दिन काम आएँगी? बसों से लेकर रेलगाड़ी और तमाम विभागों में लगी शिकायत पेटियाँ अनाथ हो जाएंगी। इतने वर्षों से जो कागज़, व्यवस्था को उत्कृष्ट बताते रहे, उन सबका मुँह काला हो जाएगा।
मुझे तो डर है कि कहीं यह बीमारी दूसरे विभागों में भी न फैल जाए। कितना भयानक दृश्य होगा जब सरकारी अस्पतालों में सफाई कर्मचारी मंत्री जी के मुँह पर झाड़ू मार रहे होंगे। गंदगी की शिकायत करने पर वार्ड बॉय धक्का मार रहे होंगे। क्या इमेज बनेगी अपने विकसित देश की।
सोचिए, अपने लाव-लश्कर से बिछड़कर किसी पुलिसवाले के हाथ लगे मंत्री जी का जब अपशब्दों से अभिषेक किया जाएगा तो लोकतंत्र को कितना बुरा लगेगा।
प्रशासन की पूरी परंपरा ही खतरे में पड़ जाएगी। वर्षों से जो समस्याएँ केवल ज्ञापन, ट्वीट और प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरक्षित थीं, वे अचानक प्रत्यक्ष दिखाई देने लगेंगी।
मंत्रियों को चाहिए कि वे अपने औचक निरीक्षण की पूर्व सूचना जारी करें ताकि कंडक्टर नहा-धोकर इस्तरी की हुई यूनीफॉर्म पहनकर आए, बस धुली हुई हो, बस में पहले से कैमरा टीम तैनात हो, और कंडक्टर के विनम्र व्यवहार की रील बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करायी जाए। इससे दुनिया भर में हमारे देश की वाहवाही होगी।
मंत्री जी यदि सचमुच जनता की तकलीफ़ें जानने लगेंगे, तो जनता की वर्षों पुरानी शिकायतों का रहस्य समाप्त हो जाएगा। फिर चुनावी भाषणों में “हमें अभी पता चला है” जैसे ऐतिहासिक वाक्य कौन बोलेगा?
लोकतंत्र की सेहत के लिए कुछ रहस्य बने रहना भी आवश्यक है। जनता को यह भरोसा रहना चाहिए कि सरकार को सब कुछ मालूम है, और सरकार को यह सुकून रहना चाहिए कि जनता मानती है—उसे कुछ भी मालूम नहीं। यही संतुलन लोकतंत्र को अब तक चलाता आया है। मंत्री जी यदि बार-बार बसों में बैठकर इस संतुलन को बिगाड़ेंगे, तो व्यवस्था के ब्रेक फेल हो जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

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