Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
हाथी ने पेड़ के नीचे सो रहे चार चूहों को अपनी ताकत के मद में कुचल दिया। जंगल की पुलिस ने अदालत में हाथी पर मुक़द्दमा दायर किया। चूहों की औकात के मुताबिक़ मुक़द्दमा धीमी गति से चलता रहा और हाथी आराम से जंगल में ज़िन्दगी बसर करता रहा। इस बीच जंगल में चुनाव हुए और राजा के सिंहासन पर लकड़बग्गा बैठ गया।
हाथी ने मौक़ा देखते ही लकड़बग्गे से दोस्ती गाँठनी शुरू कर दी। वह एक शिष्ट नागरिक की तरह नवनिर्वाचित राजा के शपथग्रहण में समय से पूर्व खड़ा मिला। राजा ने जब भी कोई योजना या अभियान चलाया तो हाथी कार्यकर्ता की तरह ज़मीन पर लेट-लेटकर राजा के अभियान में भाग लेने लगा। इस बीच चूहोंवाले मुक़द्दमे के फैसले की घड़ी आ गई। सारे जंगल में चर्चा थी कि हाथी को फाँसी होगी। भयभीत हाथी ने राजा से अपनी वफ़ादारी का फल मांगा।
राजा ने चूहों की वोटिंग वेल्यू, हाथी की फेस टीआरपी और अपनी लोकप्रियता के ग्राफ़ का हिसाब लगाया और न्यायालय ने जादुई तरीके से सबूतों के अभाव में हाथी को निर्दाेष साबित कर दिया।
सारा जंगल देखता रह गया। अदालत की काफ़ी थू-थू हुई। दबे स्वरों में कुछ जानवरों ने राजा की भी निंदा की। राजा को महसूस हुआ कि इस मामले में हस्तक्षेप करके, उसने अपनी लोकप्रियता को हानि पहुँचाई है। राजा ने हाथी को बोला अब मुझसे मिलना-जुलना कुछ कम करो। अहसानमंद हाथी ने राजा की बात मान ली। अब हाथी राजा के किसी अभियान में दिखाई नहीं देता था।
इसी बीच हाथी का एक और पुराना पाप उघड़ आया। उसने सालों पहले खरगोशों के दो बच्चे मनोरंजन के लिए मार दिए थे। यह मुक़द्दमा भी अपनी कछुआ चाल से धीरे-धीरे टल रहा था। अब इसके फ़ैसले की घड़ी आ गई। हाथी ने पहले की तरह लकड़बग्गे से मिलने की कोशिश की लेकिन राजा के निर्देश की वजह से मुलाक़ात संभव न हो सकी। हाथी इस उम्मीद में बैठा रहा कि राजा अपने वफ़ादार को दोबारा वफ़ादारी का इनाम देगा।
उधर राजा ने फिर हिसाब लगाया। सबसे पहली बात तो यह कि तीन महीने बाद खरगोशिस्थान में चुनाव हैं। वहाँ खरगोशों के काफ़ी वोट हैं। खरगोश समुदाय वैसे ही लकड़बग्गे की सरकार से नाराज़ है। अगर हाथी को सज़ा हो गई तो खरगोशों की वोट लकड़बग्गे की पार्टी को मिल जाएंगी। फिर पिछली बार चूहोंवाले केस में हुए फैसले से जो इमेज डैमेज हुई थी, वह भी बैलेंस हो जाएगी। सारा गणित लगाकर लकड़बग्गा सो गया।
सुबह अदालत का फैसला आया। पूरे जंगल को उम्मीद थी कि हाथी को अधिकतम तीन साल की सज़ा होगी लेकिन अदालत ने हाथी को पाँच साल की सज़ा सुनाई।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जंगल में न्याय उसे कहा जाता है जिसके होने से लकड़बग्गे को ज़्यादा वोट मिल जाएँ। बाकी सब अन्याय है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हम जिस चीज़ को श्रम करके अर्जित करते हैं, उसका सम्मान करते हैं। यदि हमने संघर्ष किया हो, तो हम दूसरे के संघर्ष का भी सम्मान करते हैं। यदि हमने साधना करके प्रसिद्धि अर्जित की है तो, हम दूसरे की प्रसिद्धि का आदर करते हैं। यह तथ्य विश्व की प्रत्येक उपलब्धि पर लागू होता है। किंतु यदि हम प्रयास करने के बावजूद किसी वैभव से वंचित हैं तो हम उस वैभव के सिद्ध व्यक्ति का उपहास करके अपनी कुंठा निकालते हैं।
धनवान होने की लालसा रखनेवाला निर्धन व्यक्ति, सम्पन्न लोगों की जीवन पद्धति का उपहास करता है। सामाजिक सम्मान से हीन व्यक्ति, सम्मानित व्यक्तित्वों को ढोंगी कहने लगता है। क्रिकेट में विफल हुआ खिलाड़ी टीम इलेवन के हर सदस्य को भ्रष्टाचारी कहने लगता है। यही स्थिति राजनीति, फ़िल्म, साहित्य, पत्रकारिता, व्यापार, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों की है।
इन वंचित लोगों को यदि कोई अस्त्र मिल जाए तो ये उससे अपनी कुंठा निकालने का काम करते हैं। सोशल मीडिया ऐसा ही एक अस्त्र है जिस पर लोगों की चरित्र हत्या के अनगिनत उदाहरण देख चुका हूँ। भारत सरकार भी दोष सिद्ध होने तक आरोपी को अपराधी नहीं मानती किंतु फेसबुक के स्वयंभू न्यायाधीश किसी पर भी आक्षेप लगाकर उसे अपराधी सिद्ध कर देते हैं। चूँकि उसकी प्रोफाइल पर उसके जैसे ही लोगों का जुड़ाव होता है इसलिए समान वेवलेंथ के लोग उसे व्हिसलब्लोअर समझकर उसके शिकार को नोच-नोचकर खाने लगते हैं।
इन लोगों का एक ही सिद्धांत है कि किसी खटारा कार और मर्सिडीज़ की टक्कर होगी तो खटारा की प्रसिद्धि बढ़ेगी। मर्सिडीज़ के साथ उसका फ़ोटो भी अख़बार में छपेगा। इन लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि इस टक्कर में मर्सिडीज़ का कितना नुक़सान होगा। क्योंकि इनके पास खोने के लिए कुछ है ही नहीं।
किसी के चरित्र पर प्रश्न उठा देना। किसी के निजी जीवन की कुछ अफ़वाह उड़ा देना, किसी की मौलिकता पर सवाल खड़े करना, किसी की ईमानदारी को कठघरे में घसीटना और किसी की नीयत पर शंका ज़ाहिर करना इस प्रवृत्ति के लोगों का विशेष शौक़ है। और इसमें विशेष बात यह है कि ऐसा करनेवाले लोगों को न तो चरित्र का अर्थ पता, न निजता का, न मौलिकता का, न ईमानदारी का और न ही नीयत का। कुछ भी करके तीन चीजें हासिल करना इनका लक्ष्य होता है – 1) लोगों की संवेदना; 2) बुद्धिमान और निडर होने का भ्रम और 3) प्रसिद्धि। इस प्रयास में विवाद से हासिल होनेवाले कमेंट्स और लाइक्स इनके लिए थर्मामीटर का काम करते हैं।
किसी से इनबॉक्स में चैट करना, फिर उसके रिप्लाई को क्रॉप करके सीधे यह आक्षेप लगाना की अमुक आदमी मेरे इनबॉक्स में अश्लील बातें करता है। इस स्क्रीनशॉट में चाहे बेचारे ने सामान्य शिष्टाचार में आपके अभिवादन का उत्तर मात्र दिया हो किन्तु उसके टेक्स्ट को इनबॉक्स में संपर्क करने का प्रयास सिद्ध कर ही दिया जाता है। और कमेंट करनेवाले भी ‘बेचारी लड़की को दुःखी करने’ के आरोप में गालियों का पिटारा लिए पहुँच जाते हैं।
सत्य जाने बिना सत्य के मसीहा बननेवाले लोग ऐसे प्रकरणों में कमेंट करने में रत्ती भर भी समय नहीं गँवाते। किसी के चरित्र की रक्षा करनी हो तो सोचना भी पड़े, हत्या करने में कैसा सोचना। किसी के ज़ख़्म पर मरहम लगानेवाला ज़ख्म का अध्ययन करेगा, उसके मुताबिक दवा जुटाएगा, उसकी पीड़ा का स्तर देखते हुए दवा लगाएगा …इस सबमें समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन जिसका ध्येय किसी को चोट पहुँचाना हो वह तो पत्थर उठाकर मार देगा। उसे यह क्यों सोचना कि सामनेवाले का सिर फूटेगा या पैर। ध्वंस आसान है और सृजन कठिन। सम्मान अर्जित करने में युग व्यतीत हो जाते हैं, अपमानित होने को तो एक क्षण ही पर्याप्त है।
सोशल मीडिया पर बढ़ रही इन प्रवृत्तियों का और कोई उपाय हो न हो किन्तु इनकी अनदेखी से इनके हौसले ज़रूर पस्त हो सकते हैं। जिसकी फ्रेंडलिस्ट में किसी क्षेत्र के सिद्ध लोग उपस्थित होंगे वह उनका ध्यानाकर्षण करने के लिए उस क्षेत्र के ही किसी व्यक्ति को निशाना बनाएगा।
हमें चाहिए कि इस प्रवृत्ति के लोगों को; चाहे वे किसी की भी चरित्र हत्या का प्रयास करें; उन्हें तुरंत ब्लॉक किया जाना चाहिए। बच्चा तभी इतराता है जब उसे देखने के लिए कोई उपस्थित हो। यदि उनकी श्रोतादीर्घा में कोई बड़ा आदमी होगा ही नहीं तो वे किसको दिखाने के लिए उछल-कूद करेंगे।
कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण से किसी भी व्यक्ति के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करे; उसकी निजता में प्रवेश करे; उसे अपमानित करने का कुचक्र रचे; उसके चरित्र की हत्या का प्रयास करे तो ऐसे व्यक्ति की प्रोफाइल पर जाकर तुरंत उसे ब्लॉक किया जाना चाहिए। इससे हमारी ऊर्जा ऐसे नकारात्मक कुकर्मों से अछूती रह पाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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न्याय का सामान्य अर्थ है, परिस्थितियों के सम्यक आकलन के बाद पीड़ित को मरहम देना और अपराधी को दंडित करना। इस प्रक्रिया में किसी की जाति, लिंग, धर्म या आयु का प्रश्न कहाँ से जुड़ गया?
हमने विशेष-अधिकारों, वर्ग आधारित विशेष प्रकोष्ठों और इस तरह की अन्य व्यवस्थाओं से न्याय प्रक्रिया को अपाहिज बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है। इन प्रावधानों ने उस वर्ग को सर्वाधिक हानि पहुँचाई है, जिसके पक्ष में ये कानून बनाए गए हैं।
महिलाओं के पक्ष में दहेज कानूनों का प्रावधान हुआ तो उसकी गाज पारिवारिक जीवन की सहिष्णुता पर गिरी। जब घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के अपराधी को दंडित करने के लिये न्याय व्यवस्था सुसज्जित थी तो इस विशेष प्रावधान की आवश्यकता क्यों पड़ी। स्त्रियों के साथ ससुराल में होनेवाले दुर्व्यवहार की चिंता व्यक्त करते हुए ‘दहेज कानून’ बन तो गए लेकिन इस हथियार के दुरुपयोग के हज़ारों मुआमले अदालतों में ज़ाहिर होने लगे। दाम्पत्य जीवन की ज़रा-सी खटपट सीधे दहेज और घरेलू हिंसा के आक्षेपों तक जा पहुँची। लड़कियों ने परिवार बसाने के लिए प्रयास करने की बजाय थाने पहुँचना आसान समझ लिया। सास-ससुर, नंद-ननदोई, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी और यहाँ तक कि दोस्तों तक के नाम प्रताड़ना में लिखवाए; स्त्री सुरक्षा को कटिबद्ध पुलिस ने सबको लॉक अप में डाल दिया। परिवार के परिवार तबाह हो गए।
एक दिन अचानक अदालत को महसूस हुआ कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अब लड़की की शिकायत पर प्रमाण मांगे जाने लगे। अब ससुरालवाले डरते तो थे लेकिन त्वरित गिरफ्तारी की प्रक्रिया बन्द हो गई। किन्तु परिवार में सौहार्द कायम नहीं हो सका क्योंकि लड़कियों को बता दिया गया है कि कानून लड़की के पक्ष में झुका हुआ है।
‘चार बर्तन होंगे तो आवाज़ होगी ही’ -यह कहावत हम सबने सुनी है। लेकिन दाम्पत्य में साथ रहनेवाले बर्तनों को यह बताया गया कि यदि थाली और गिलास में टकराहट हो तो गिलास को आवाज़ करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि कानून थाली के पक्ष में झुका हुआ है।
क्यों जी, जिन लड़कियों ने दहेज कानूनों का दुरुपयोग करके अपने ससुराल पक्ष के सभी लोगों का जीवन नर्क कर दिया है, उनको किस अदालत ने दंडित किया है। पारिवारिक कलह को आधार बनाकर कन्यापक्ष, वरपक्ष से मोटी रकम वसूलता है और हमारे न्यायालय इसे सेटलमेंट का नाम देकर उस पर ठप्पा लगा देते हैं।
ग़ज़ब का न्याय है! पत्नी ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर हिंसा का आरोप लगाया। इन तीनों आरोपों में अपराधी को जेल भेजने की बजाय पैसे से पत्नी का मुँह बंद करने की सुविधा दे दी गई। अगर अदालत पति को अपराधी मानती है, तो उसे कारावास क्यों नहीं दिया जाता। और अगर अदालत जानती है कि पत्नी केवल क्रोध में उक्त आरोप लगा रही है तो किस अपराध में पति को आर्थिक मुआवजा देने के लिए बाध्य किया जाता है। कितने ही निर्दाेष लोग इस कानूनी व्यवस्था में असहाय होकर आत्मघात तक पहुँच गए।
इन प्रश्नों पर विचार करेंगे तो हम पाएंगे कि इस प्रकार की हर सेटलमेंट हमारी न्याय प्रक्रिया की विफलता को प्रमाणित करती है।
ठीक यही स्थिति एससी/एसटी कानून की भी है। दो व्यक्तियों के सामान्य से झगड़े को भी जातीय अपमान का मुद्दा बनाकर कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। हज़ारों निर्दाेष इस प्रावधान की भेंट चढ़ गए। एक दिन अचानक माननीय न्यायालय को लगा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। इसमें शिकायत दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी की बजाय पहले शिकायत की वास्तविकता की पड़ताल कर लेनी चाहिए। इतना सुनते ही झूठी शिकायतों को हथियार बनाकर ब्लैकमेल करनेवाले तथाकथित दलित भड़क गए और उन्होंने देश भर में उत्पात मचाकर न्यायलय को धमकी दी कि यदि हमारी शिकायत की वास्तविकता जाँचने की कोशिश की तो हम पूरा देश जला डालेंगे। सरकार ने इन बेचारे ब्लैकमेलर्स की बात सुनी और सुप्रीम कोर्ट को कहा कि तुमने बिना सोचे-समझे बेचारे दलितों के फटे कानून में टांग अड़ाई है, चलो दोबारा अपने निर्णय की पड़ताल करो, वरना ये बेचारे देश जला डालेंगे।
समझ नहीं आता कि संसद में बैठे विधिनिर्माताओं के पास वास्तव में दूरदर्शिता है ही नहीं या फिर वे जानबूझकर अगले इलेक्शन से आगे देखना नहीं चाहते। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता समाज का विश्वास जीतने की प्रथम सीढ़ी है। दहेज कानूनों से बर्बाद हुए परिवार और जातीय कानूनों से त्रस्त हुए लोग आज भी देश की संसद और न्यायालय की ओर इस आशा से देखते हैं कि हम तो शहीद हो गए साहब लेकिन अयोग्य योद्धा के हाथ से इन घातक अस्त्रों को वापस ले लो। इन अस्त्रों से ये अपने आसपास के लोगों को ज़ख्मी कर रहे हैं और अंततः अपनी भी जान के दुश्मन बन चुके हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
प्रधानमंत्री ने विश्व भर में घूम-घूमकर देश की छवि सुधारी है। और छवि वास्तव में सुधरी भी है, लेकिन देश नहीं सुधरा। हम आज भी किसी देवता की तस्वीर को चप्पल से पीटकर अपने दलित होने की कुंठा निकाल रहे हैं। हम भगवान की तस्वीर पर जूते फेंककर सरकार से आरक्षण बहाल रखने की फिरौती मांग रहे हैं। यह सब देखकर बाबा भीमराव अंबेडकर फूले नहीं समा रहे होंगे। रेलगाड़ियाँ रोक दी गई हैं। बाज़ार बन्द पड़े हैं। सड़कों पर हथियारबंद गुंडे गुंडई कर रहे हैं। इन सबको गुंडागर्दी का आरक्षण चाहिए। ये सब बाबा अम्बेडकर के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने की स्वतंत्रता चाहते हैं। ये चाहते हैं कि जब पुलिस इन्हें हायतौबा करने से रोके तो संविधान पुलिस के हाथ बांध दे, लेकिन संविधान इन्हें हिंसा करने से रोके तो ये संविधान का बोरिया बांध दें।
सरकार इन्हें नहीं रोकेगी। वह माननीय न्यायालय से कहेगी कि अगले चुनाव में हमें इन लड़कों से विजय की पालकी उठवानी है इसलिए हम इन्हें बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटने से नहीं रोकेंगे सो तुम्हारे पास दो ही उपाय हैं या तो अपनी बहू-बेटियों को घर में घोंट दो या फिर इन लड़कों को आरक्षण की रिश्वत देकर विदा कर दो। न्यायालय सरकार को फटकारता है। सरकार आँसू बहाते हुए आरक्षण मांगनेवाली भीड़ को बताती है कि हमने तुम्हारी बात रखी तो हमें न्यायालय ने डाँट दिया। सुनकर हथियारबंद गुंडों का मन पिघल जाता है। वे न्यायालय की ज़्यादतियों से टूट जाते हैं और जिलाधीश का दफ्तर फूँक देते हैं। वे बेबस होकर बसें जलाने पर मजबूर हो जाते हैं। न्यायालय से न्याय न मिलने की पीड़ा से त्रस्त होकर वे बेचारे, आम लोगों से मारपीट करते हैं।
वे ब्राह्मणों के आराध्य को चप्पल से पीटते हैं। वे हिन्दू-देवी देवताओं को अपमानित करते हैं। इससे क्रुद्ध होकर हिंदुओं का खून खौल जाता है। उनके भीतर परशुराम उतर आते हैं। वे भीमराव अंबेडकर और कांशीराम की मूर्तियों पर कीचड़ उछालते हैं।
उधर पटेल, जाट, गुर्जर समुदाय इन सब घटनाक्रमों का महीन अध्ययन करते हुए अपने लिए आरक्षण की रणनीति बनाते हैं। माननीय न्यायालय सरकार की ओर देखता है और सरकारें वोटबैंक की ओर। आंदोलन के बैनरतले होनेवाले फसादात का धुआँ आकाश में छाने लगता है और विश्व में भारत की छवि सुधरने का परचम धूसर हो जाता है।
हाँ, इस सबके बीच स्कूल गए बच्चों की, दफ़्तर के लिए निकले बेटे की, टूर पर गए पति की और गश्त पर गए पिता की चिंता में कुछ आँखें राह देखती रह जाती हैं। इस सबके बीच कोई नन्हा फरिश्ता दुनिया में आने से पहले ही आँखे मूंद जाता है। इस सबके बीच किसी चायवाले के घर चूल्हा नहीं जल पाता। इस सबके बीच किसी गोलगप्पेवाले का ठेला उदास खड़ा रह जाता है। इस सबके बीच कोई दर्द दवा तक नहीं पहुँच पाता है। इस सबके बीच कुछ मेहनतकशों की मजूरी नहीं हो पाती। इस सबके बीच कुछ अहम ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
✍️ चिराग़ जैन