Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
फूल, ख़ुश्बू, रंग तो मौसम चुरा ले जाएगा
कौन लेकिन बाग़बां का हौंसला ले जाएगा
हो गए बर्बाद तो फिर जश्न होना चाहिए
देखते हैं वक़्त हमसे और क्या ले जाएगा
जीतने की चाह छोड़ी, अब निभाकर दुश्मनी
हारने का डर मेरा दुश्मन लिवा ले जाएगा
दस्तख़त बेटे की ज़िद पे कर के बूढ़े ने कहा-
“क्या लुटा सकता था मैं, तू क्या लिखा ले जाएगा“
इल्म वाले बस तकल्लुफ़ में फँसे रह जाएंगे
ज़िन्दगी की मौज कोई सिरफिरा ले जाएगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
यार दहशत से समर्पन नहीं जीता जाता
रूप मिल सकता है, यौवन नहीं जीता जाता
क्या मरासिम की रवायत में कोई ख़ामी है
तन लिवा लाते हैं पर मन नहीं जीता जाता
एक झोंके की छुअन से ही बरस जाता है
आंधियो! शोर से सावन नहीं जीता जाता
सामने वाले के एहसास पे हारो ख़ुद को
प्यार का खेल है, जबरन नहीं जीता जाता
हौसला बनके सदा साथ में चलना मेरे
रंग और रूप से साजन नहीं जीता जाता
मार डाला था उसे ख़ुद के अकेलेपन ने
तीर-तलवार से रावन नहीं जीता जाता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
नाम रहेगा शेष हमारा
सर्वोत्तम परिवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आज़ादी के नग़मे गाकर, देशप्रेम की अलख जगाकर
स्वाभिमान हित जी लेते हैं, सिर्फ़ घास की रोटी खाकर
पल भर में तलवार हमारी हो सकती है खूं की प्यासी
पल भर में ही हो सकते हैं, शस्त्र त्यागकर हम सन्यासी
विष पीता अखिलेश हमारा
वज्र बना दरवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
ओज रुधिर में, रौद्र नयन में, रूप भयानक वैरी के हित
करुणा निर्दोषों के दुःख पर, पीठ बंधा वात्सल्य सुरक्षित
हमने सीखा ढंग से जीना, हमने सीखा ढंग से मरना
सुंदरता पर आँच हुई तो, हमने सीखा जौहर करना
शाश्वत सुख उद्देश हमारा
शांतिपरक निर्देश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
हम अनुनय की बोली बोलें, रस्ता मांगें हाथ पसारे
अभिमानी के लिए भरे हैं हमने आँखों में अंगारे
हम अपनी पर आ जाएँ तो सागर से अमृत चखते हैं
हम अपनी पर आ जाएँ तो पर्वत उंगली पर रखते हैं
सागर-सा आवेश हमारा
दास हुआ लंकेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
मस्त फ़क़ीरों की धरती है, शांति-अहिंसा के अभिलाषी
वन्देमातरम गाते-गाते, रण में कूद पड़े संन्यासी
हमने सागर को लांघा है, पर्वत लेकर उड़े गगन में
एक वचन पूरा करने को, चैदह वर्ष बिताए वन में
सीधा-सादा वेश हमारा
प्रेम-त्याग संदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आपस में लड़ते हैं तो क्या, दुःख में साथ खड़े होते हैं
हर मुश्किल के आगे हम ही, सीना तान अड़े होते हैं
जब संकट ने पाँव पसारे, जब भी कोई आफत आई
एक साथ मिलकर जूझे हैं, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
शौर्य रहेगा शेष हमारा
मिट जाएगा क्लेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
वनवासों को पूजा हमने, राजपाट हमने ठुकराया
जिससे मोह किया वो छूटा, जिसको त्याग दिया वो पाया
हम घर में रहकर वैरागी, हम वन में रहकर शासक हैं
योग-भोग दोनों के साधक, हम प्रियतम के आराधक हैं
मत मानो आदेश हमारा
पर समझो उपदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
पाक की सियासत क़माल की सियासत है
सबकी बनाती है ये रेल, चले जाओगे
फाँसी, गोली, क़ैद, सज़ा यही मिलता है बस
निकलेगा आपका भी तेल चले जाओगे
खेल-खिलवाड़ नहीं ज़िन्दगी का दांव है ये
कस ली है नाक में नकेल चले जाओगे
कुछ रोज़ महलों का रंग ढंग देख लो जी
बाद में तो आप ख़ुद जेल चले जाओगे
भारत के वीर सैनिकों से सामना है अब
साज़िशें करीं तो नींबू से निचुड़ जाओगे
ज़्यादा फूल कर कोई भूल मत कर देना
इन्हें क्रोध आया तो वहीं सिकुड़ जाओगे
सैनिकों के साथ यदि मैच खेलने लगे तो
एक झटके में सबसे बिछुड़ जाओगे
बॉल छोड़ दी तो पाकिस्तान में धमाका होगा
बल्ले पे जो ली तो ख़ुद आप उड़ जाओगे
भारत से भूल के मुकाबला न कीजियेगा
आपके पीएम को दबोच लेंगे मोदी जी
आप जब तक शुरुआत भी नहीं करोगे
तब तक अंत को भी सोच लेंगे मोदी जी
लच्छेदार बातों के भरोसे मत रहिएगा
ताकते रहोगे ऐसी लोच लेंगे मोदी जी
नए पंछियों को कहिए कि घोंसले में रहें
उड़ने लगे तो पर नोच लेंगे मोदी जी
भारत की संसद की नींव न डिगा सकोगे
जनता को अभी संविधान पे भरोसा है
भूख के सवाल का जवाब खोज लेंगे हम
भारत को अपने किसान पे भरोसा है
आपस का सारा मतभेद भूल जाएंगे जी
राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान पे भरोसा है
दुश्मनों की साज़िशों से डरते नहीं हैं क्योंकि
सीमाओं पे जूझते जवान पे भरोसा है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम भारतीय लोग प्रवृत्ति से विश्वासजीवी हैं। विश्वास दो प्रकार का होता है, एक अटल विश्वास और दूसरा अटूट विश्वास। भाषा के बहुत गहरे विश्लेषण के हाथों मजबूर न हों तो इन दोनों का अर्थ एक ही है किन्तु फिर भी विश्वास दो प्रकार का होता है ऐसा हमारा विश्वास है।
जब हम किसी पर अटूट विश्वास करते हैं तो उसे तब तक अटूट बनाए रखते हैं जब तक वह टूट न जाए। एक बार टूट जाने के बाद हम फिर दोगुनी शक्ति लगाकर अटूट विश्वास करने लगते हैं।
नेता चुनाव में जो वायदे करते हैं, वे झूठे होते हैं -ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए प्रत्येक दल के वायदे सुनने के बाद सबसे बढ़िया झूठ बोलनेवाले नेता को अपना विश्वास मत देकर हम उसे सदन में भेज देते हैं। वह जीतते ही हमारे दुःख-दर्द को भूल चुका होगा- ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए हम उसके विपक्षी पर विश्वास करके उसके खि़लाफ़ नारे लगाने लगते हैं।
जो लोग सरकार के विरोधी हैं वे विपक्ष पर विश्वास करते हैं। जो लोग विपक्ष के विरोधी हैं वे सरकार पर विश्वास करते हैं। जो किसी के विरोधी नहीं हैं वे सब पर विश्वास करते हैं। और जो सबके विरोधी हैं वे ख़ुद पर विश्वास करते हैं।
मुहल्ले के कोई गुंडा भारतीय लोकतंत्र पर टिके हमारे विश्वास की हत्या करे तो हम पुलिस पर विश्वास कर बैठते हैं। जैसे ही हमें हमारी भूल का आभास होता है हम तुरंत अपने विश्वास की आरती का थाल लेकर न्यायालय में घुस जाते हैं। न्यायालय में जब विश्वास की लौ झपकने लगती है तो हम उसे संसद की ओट से बचाने की कोशिश करते हैं। जब संसद में भी विश्वासमत गिरने लगता है तो हम मीडिया के कैमरे के सामने विश्वास की गठरी खोल बैठते हैं। कैमरे के हाथ जब उल्टे हमारी ही गर्दन की ओर बढ़ने लगते हैं तो हम मुहल्ले के किसी गुंडे को लाख-दो लाख रुपये चढ़ाकर अपने विश्वास की रक्षा कर लेते हैं।
कल कुछ विश्वासी नागरिक बोल रहे थे कि सरकार ने सुशासन और सुविधाओं का पार्सल दिल्ली से रवाना किया है। अब समस्या यह है कि जिस ट्रेन से रवाना किया है वह लेट चल रही है।
हमने तार्किक उत्तर का विश्वास रखकर प्रश्न पूछ लिया- ‘पर भैया, जिस सरकार ने पार्सल भेजा है; ट्रेन भी तो उसी सरकार के आदेश पर चलती है।’
प्रश्न सुनते ही वे भड़क गए। बोले, ”तुम जैसे लोगों के कारण ही इस देश का सत्यानाश हुआ है। जब देखो सरकार को उंगली खोंचते रहते हो। और कुछ काम ही नहीं है। तुम साले पाकिस्तान के एजेंट हो। राष्ट्रद्रोही हो तुम। तुम ही सरकार को बदनाम करने के लिए ट्रेनवा लेट कराए हो। तुम्हें खटक रहा है कि कोई आदमी काम कैसे कर ले। तुम्हारी छाती पर तो साँप लोट रहे हैं।”
उनका यह रौद्र रूप देखकर हमें विश्वास हो गया कि सरकार ने सचमुच दिल्ली से पार्सल भेजा है जो एक न एक दिन गाँव तक ज़रूर पहुँचेगा, लेकिन मिलेगा उसी को जिसे सरकार पर अटूट और अटल दोनों तरह का विश्वास होगा।
© चिराग़ जैन