तलाश
रेल की खिड़की में बैठी तुम
अपनी हथेलियों में
तलाशती रह गईं मुझको
और प्रेम
सरसों सा फूलता रहा
धरती की हथेलियों में पड़ी
लोहे की लम्बी लकीरों के
दोनों ओर
दूर तक
…बहुत दूर तक।
✍️ चिराग़ जैन
रेल की खिड़की में बैठी तुम
अपनी हथेलियों में
तलाशती रह गईं मुझको
और प्रेम
सरसों सा फूलता रहा
धरती की हथेलियों में पड़ी
लोहे की लम्बी लकीरों के
दोनों ओर
दूर तक
…बहुत दूर तक।
✍️ चिराग़ जैन
दीपक जलते दीवाली के, दीपक जलते हैं यादों के
रौशनी बिखरती कातिक में, उत्सव मनते हैं भादो के
घर भर में ज्योति पसरती है, शादी-ब्याहों में टेलों में
जमकर आतिशबाज़ी होती, गर विजय मिली हो खेलों में
लेकिन हम मौन बिताते हैं, उत्सव अपनी आज़ादी का
आँगन में नहीं लगाते हैं इक दिव्य तिरंगा खादी का
दुनिया भर को मालूम चले मतलब अपनी आबादी का
हर आँगन में इस बार जले इक दीया अगर आज़ादी का
✍️ चिराग़ जैन
भारत रत्न का सवाल है साहब। विवाद लाज़मी है। इतिहास साक्षी है हमने आज तक आसानी से किसी को महान नहीं माना। आसान और महान का कोई तारतम्य नहीं है ना। रामको जंगल भेजा, पत्नी से वियोग कराया, उनका घर उजाड़ दिया तब पता चला कि वो महान हैं। नानक, कबीर, महावीर, गांधी सबके साथ यही किया हमने। रूल इज़ रूल। फिर चाहे वो कोई भी हो।
हाँ, अगर कोई विदेशी रिकमेन्डेशन जुगाड़ ले, फिर उसकी महानता पर हमें कोई संदेह नहीं रहता। जैसे टैगोर; जिसको अंग्रेजों ने महान मान लिया उसकी महानता सर्टिफाइड हो गयी।
बीच में कई सालों तक हमने कई सालों को भारत रत्न नहीं दिया। कोई महान था ही नहीं। फिर सिलसिला शुरू हुआ तो मरे हुए भी लाइन में लग गए।
सचिन तेंदुलकर का क़द ऊंचा था; तो ये विवाद किया कि खेल को भारत रत्न क्यों? इस विवाद की आवाज़ इत्ती ज्यादा थी कि किसी और महापुरुष के दावे की रिरियाहट सुनाई ही नहीं दी।
अब मामला अटल जी के नाम का है। तो नेताजी को ताव आ गया। उधर सपाइयों ने लोहिया की चारपाई मैदान में पटक कर ताल ठोक दी। मायावती इसलिए चुप हैं कि उनके अम्बेडकर आलरेडी एक अदद भारत रत्न कब्ज़ाए बैठे हैं। लालूजी दाल-रोटी के सवाल में उलझे हैं वर्ना राबड़ी जी का नाम प्रपोज़ किया जा सकता था।
कई बार लगता है कि हमारे वोटर आईडी कार्डपर एक-एक भारत रत्न छापने का आदेश ज़ारी किया जाना चाहिए। और जिसके कार्ड पर भारत रत्न खुद छपने से इनकार कर दे, उसे सम्मानित मान लिया जाना चाहिए।
गांधी, सुभाष, गौतम, महावीर, भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे लोग सम्मान के इस खेल से बहुत ऊपर हैं साहब। किसी तमगे का लालच दिखा कर इनको छेछालेदार के इस भौंडे दंगल में घसीटना भारत का भी अपमान है और इन रत्नों का भी।
✍️ चिराग़ जैन
चन्द्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है
तुम दमक का दंभ भरना बाद में।
जब तुम्हारे चाटुकारों का
जुगनवी दल
फुदकने के लिए अंधियार पा ले
और लाखों बून्द जैसी तारिकाएँ
जब घड़ी भर टिमटिमा लें
तब दिखना नूर अपनी चांदनी का
रात में सोए हुओं को
और रोते श्वान, गीदड़,
उल्लुओं को।
रात के आकाश में बिखरे पड़े
बूंदी के दानों में
किसी लड्डू से तनकर बैठ जाना।
रात भर हँसना
सड़क पर लड़खड़ाते मद्यपों पे
और जी भर भागना
खाली सड़क पर
तेज सरपट दौड़ती
कुछ गाड़ियों के साथ।
तब तलक रुक कर निहारो
दूर पश्चिम में
दिवाकर की दमकती
आख़िरी किरणों से बिखरे रंग।
देख लो,
दिन भर मनाकर रौशनी का जश्न
कैसा जा रहा निस्संग।
वो अभी दिन भर के टूटे
कामगारों की
थकन लेकर गया है।
चंद्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है।
✍️ चिराग़ जैन
अपने हर चरित्र में जो मनोवैज्ञानिक इंजीनियरिंग की वो कमाल थी। चाचा चौधरी का दिमाग़ बड़ा बनाया और होंठ मूछ में छुपा दिए। साबू का शरीर बड़ा बनाया। पिंकी, बिल्लू, चाची इन सबके आकार में एक प्रकार था। साबू जैसे चरित्र की कल्पना कार्टून जगत् में एलियन का प्रादुर्भाव था। संभवतः यह चरित्र भारतीय बच्चों का एलियंस से पहला परिचय है।
कैरिकेचर की दुनिया में वे एक नयी धारा के संयोजक थे। काल्पनिक चरित्रों को उन्होंने सूरत दी, पहचान दी। और खुद की पहचान को केवल एक साधारण से हस्ताक्षर तक सीमित करलिया।
बचपन के कनवास पर कौतूहल मिश्रित हास्य के बीज बोने वाले प्राण महान थे।
विनम्र श्रद्धांजलि
✍️ चिराग़ जैन