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तुम लोगों की अनदेखी

छिछले बोल लुभाते हैं
नारे हिट हो जाते हैं
दोहरे अर्थ समेटे हेडिंग
मिलियन व्यू पा जाते हैं
फिर कहते हो मंचों से क्यों कविता अंतर्धान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सीधी-सादी कविता वाली पोस्ट कहीं खो जाती है
नोकझोंक की क्लिप दिखते ही शेयर कर ली जाती है
गीत सिसकते रहते हैं
छंद बिलखते रहते हैं
कविता-साधक फॉलोवर का
रस्ता तकते रहते हैं
जो शालीन रहा हो उसकी वॉल बहुत वीरान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सेंसेशन, वल्गर, फूहड़ता, इन पर सबका ध्यान हुआ
भद्दी बातें करती छोरी का जी भर गुणगान हुआ
अंधी हिंसक सोच चली
गाली और गलौज चली
नेगेटिव का बल देखो
वायरलियों की फौज चली
सभ्य सुसंस्कृत पोस्ट करी तो कचरे का सामान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

ट्रोलिंग करते फिरते हैं सब अपने-अपने वाद लिए
मानवता एकाकी फिरती, अंतस में अवसाद लिए
जितना शिष्ट प्रलाप हुआ
उतना पश्चाताप हुआ
ओछापन तो ट्रेंड बना
गहरा लिखना पाप हुआ
चोरी करने की आदत भी ईश्वर का वरदान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

✍️ चिराग़ जैन

जनता चुपचाप देखेगी

कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और मीडिया की मौज हो गई। भाजपाई बता रहे हैं कि पार्टी को अपने ख़ून-पसीने से सींचनेवाले किसी नेता को साइड लाइन करना नैतिकता नहीं है। यह बयान सुनते ही शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और के एन गोविंदाचार्य जैसे ढेर सारे नाम स्मृतियों में तैर गए। कांग्रेसी बता रहे हैं कि जो दल बदल रहा है वह तुम्हारा भी सगा नहीं होगा। यह बयान सुनते ही नवजोत सिंह सिद्धू, बी डी शर्मा, घनश्याम तिवारी और जनार्दन सिंह गहलोत जैसे नाम ठठाकर हँसने लगे।
भाजपाइयों को कांग्रेस का इतिहास याद आ गया और वे सीताराम केसरी, नरसिम्हा राव और डॉ प्रणब मुखर्जी के अपमान की गाथाएँ सुनाने लगे। ये गाथाएँ सुनकर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी की आँखें डबडबा आईं।
कांग्रेस में दो लीडरों के आगे सबकी प्रतिभा को दबाने की परंपरा रही। भाजपा में भी प्रतिभाशाली नेतृत्व को सलीक़े से साइड लाइन करने के अनगिन उदाहरण मिल जाएंगे।
प्रश्न कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, पीडीपी, जदयू, राजद, द्रमुक, अद्रमुक, झामुमो या अन्य किसी दल का है ही नहीं। यह शुद्ध रूप से सत्ता की लड़ाई है, जिसमें विचारधारा, नैतिकता, राष्ट्रहित, जनहित, धर्म, सम्प्रदाय, विदेशनीति, अर्थनीति जैसे तमाम शब्द खिलवाड़ की तरह प्रयोग किये जाते हैं।
राजनीति का एक ही सिद्धांत है, हमारे साथ रहो, नहीं तो हमसे गाली खाओ। यह सिद्धांत सभी का है। बेशर्मी और ढिठाई से प्रवक्ता बनकर चैनल्स पर बैठनेवाले रीढ़विहीन लोगों के घर में दर्पण की उपस्थिति निषेध होती है। राजनीति की चौखट पर क़दम रखते ही लाज के चीर स्वतः उतार फेंकने होते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल लेने से कुछ नहीं बदलेगा। चैनल जब कभी सिंधिया परिवार के इतिहास पर बहस करेंगे तो भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ता आपस में संवाद बदल लेंगे। ड्रामा वैसा ही चलेगा। अब कांग्रेस झाँसी की रानी के साथ हुए विश्वासघात पर सिंधिया परिवार को ग़द्दार बनाने पर तुल जाएगी और भाजपा सुभद्राकुमारी चौहान को कम्यूनिस्ट घोषित करके उस कविता और उस दौर के इतिहास को साज़िश करार दे देगी।
तमाशा चलता रहेगा। लीडर अवसर देखकर दल बदलते रहेंगे। आलाकमान समय की नज़ाक़त को देखते हुए सुखरामों को गले लगाते रहेंगे। कार्यकर्ता तो बेचारा जमूरा है। आज उसे कहा जाएगा कि हमने सिंधिया से कुट्टा कर ली है। और कार्यकर्ता फेसबुक पर उसके नाम की गारी गाने लगेगा। कल उसे कहा जाएगा कि अब हमने उससे अब्बा कर ली है और कार्यकर्ता उसके नाम की बधाई गाने लगेगा।
विधायकों को रिजॉर्ट में क़ैद करके ईद के बकरों की तरह ख़रीदने की परंपरा पुष्ट हो रही है और कार्यकर्ता चुनाव के दिन लाइन में लगकर वोट देने की अपील करते रहेंगे। आदर्श नागरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए व्हील चेयर तक पर लदकर वोट डालने जाएगा और समझदार लीडर उसके वोट को हथियार बनाकर लोकतंत्र की टांगें काट डालेगा।
न्यायालय अपील होने तक प्रतीक्षा करेगा और राजनीति क़ानूनी ख़ामियों का लाभ उठाकर न्याय को फाँसी पर लटकाते रहेंगे। कार्यपालिका नपुंसक ख़सम की तरह ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत पर जिस रात की जो दुल्हन होगी, उसी के तलवे चाटती रहेगी। और मीडिया इस पूरे दंगल में अपनी हाट बिछाकर टीआरपी बटोरती रहेगी।
जनता चुपचाप देखेगी। क्योंकि जनता ने कसम खाई है –
हम, भारत के लोग…!

✍️ चिराग़ जैन

इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

कुर्सी के लिए क़ौम की परवाह उड़ा दो
नारों की आंधियों में हर इक आह उड़ा दो
लफ़्ज़ों की आग से भी न गर मुल्क जले तो
इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

✍️ चिराग़ जैन

लोकतन्त्र की नयी परिभाषा

भारतीय लोकतंत्र अपने सर्वाधिक वैभवशाली दौर से गुज़र रहा है। एक राजनैतिक दल ने जनता को बिजली-पानी मुफ़्त देने का ब्लूप्रिंट दिया। दूसरे राजनैतिक दल ने आटा फ्री बाँटने की घोषणा की। एक समय था जब चुनाव जीतने के लिए शराब, पैसा, सिलाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप और साड़ियाँ बाँटी जाती थी। इस चुनावी रिश्वत का बोझ राजनैतिक दलों या प्रत्याशियों के निजी कोष को उठाना पड़ता था। उस बोझ से बचने के लिए राजनैतिक दलों ने योजनाओं की आड़ में यह ख़र्च सरकारी कोष से करने का रास्ता निकाल लिया।
एक सरकार ने किसानों के कर्ज़ मुआफ़ कर दिए। अर्थात कृषि की दशा को सुधारने की बजाय, कृषक के स्वाभिमान को ध्वस्त करने की शुरुआत की। एक सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित कर दिया। अर्थात पाई-पाई जोड़कर जो सरकार को रजिस्ट्री की स्टैम्प ड्यूटी, हाउस टैक्स, इनकम टैक्स चुकाकर घर बना रहा है, उसको यह संदेश दिया कि तुम मूर्ख हो जो मेहनत करके घर बना रहे हो, तुमसे अच्छे तो वे लोग हैं जो कहीं भी घेर-घारकर मकान मालिक़ बने बैठे हैं। एक सरकार ने रोज़गार देने की बजाय चावल दो रुपये किलो बाँटने शुरू कर दिए।
जो ईमानदारी से टैक्स चुका रहा है, उसके लिए कोई सुविधा नहीं; उसे कोई प्रोत्साहन नहीं। बल्कि ऐसी व्यवस्था कर छोड़ना कि वह टैक्स चुराने की सोचे। लेकिन जिसने केवल सरकार से लेना सीखा है, उनके हाथ जोड़-जोड़कर उन्हें अकर्मण्यता की प्रवृत्ति के लिए प्रोत्साहित करते रहो। इस देश का वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में कहता है कि ‘मध्यम वर्ग अपना ध्यान ख़ुद रखे!’
क्यों भाई? जब मध्यम वर्ग को अपना ध्यान ख़ुद रखना है तो वह सरकार को पैसा क्यों दे? इस देश की राजनीति ने घर के कमाऊ पूत को नोच-नोच कर नाकारा बेटों की रोटी में घी भरा है। इस देश की राजनीति ने मांगनेवालों को बाबाजी कहा है और देनेवालों को तमंचा दिखाया है। यह काम सबने किया। कोई भी इसमें कमतर नहीं है।
इसी ट्रेंड पर जब दिल्ली में एक पार्टी की सरकार बन गई तो पराजितों ने सोशल मीडिया पर दिल्ली को मुफ्तखोर घोषित कर दिया। यह पहली बार हुआ है कि किसी दल विशेष के समर्थक जनमत को कोस नहीं रहे, बल्कि धिक्कार रहे हैं। यह पहली बार है कि लोकतंत्र में जनमत को गाली दी जा रही है। यह पहली बार है कि पूरे प्रदेश को एक ही शब्द से हाँका जा रहा है।
सामान्यीकरण की यही प्रवृत्ति है जिसके कारण दस-पाँच लोगों की हरक़त पर पूरे विश्वविद्यालय को ग़द्दार घोषित कर दिया जाता है। जनारालाइज़ेशन की यही प्रवृत्ति है कि एक पूरी कौम को बुरा मान लिया जाता है और दूसरी पूरी कौम को अच्छा मान लिया जाता है। सामान्यीकरण की यही बीमारी है जो कपड़े देखकर डीएनए बताने लगती है, जो नाश्ते की थाली देखकर भविष्य बताने लगती है, जो पोहा खानेवालों का अतीत बताने लगती है।
इन्हीं पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों ने राजनैतिक माहौल में कटुता भर दी है। इन्हीं धारणाओं के कारण समाज में विद्वेष भरता जा रहा है। और इस अभ्यास का दुष्परिणाम यह है कि आज सोशल मीडिया पर खुलकर बोला जा रहा है कि दिल्लीवाले मुफ़्तखोर हैं, दिल्लीवाले स्वार्थी हैं, दिल्लीवाले राष्ट्रद्रोही हैं, दिल्लीवाले हिंदूविरोधी हैं।
अजीब मानसिकता के लोकतांत्रिक हैं आप। जो हमें वोट न दे, वह राष्ट्रद्रोही! जब इसी दिल्ली ने सातों लोकसभा सीटें जिताई थीं तब यही जनता राष्ट्रभक्त थी। जब अपने धुर विरोधियों के साथ मिलकर सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हो तब जनता से नहीं पूछते कि वह कैसा महसूस करती है? अपनी पराजय के कारणों का मंथन करने की बजाय जनता को गाली देना तो सभ्यता का द्योतक नहीं हैं। सौ-पचास लोगों की हठधर्मिता को लताड़ने की बजाय दो करोड़ लोगों को दुत्कारना तो लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। यह जनता है साहब, यहाँ आपकी पार्टी का संविधान नहीं चलता कि ‘या तो मूकदर्शक बन जाओ, नहीं तो मार्गदर्शक बना दिये जाओगे।’
इसी जनता ने अभूतपूर्व बहुमत देकर आपको सत्ता दी है। इस जनता को कोसने की बजाय अपनी नीतियों, अपने नेताओं की भाषा, अपनी कार्यशैली और अपनी ऐरोगेन्सी का आकलन करो; नहीं तो लोकतंत्र की धरती आपकी फसल को खरपतवार घोषित करके उखाड़ फेंकेगी। भारत के लोकतंत्र में आप भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। आपकी विचारधारा इस देश के एक बड़े जन का मानसिक पोषण करती है। लेकिन अकेले आपकी ही विचारधारा का नाम भारत नहीं है। भारत विविध विचारों, विविध पंथों, विविध भाषाओं, विविध धर्मों, विविध पहनावों, विविध खानपान, विविध रंगों, विविध मान्यताओं और विविध ऋतुओं के साथ एक रहनेवाला देश है। इसे एक ही रंग में पोतकर इसके सौंदर्य का ह्रास करने का प्रयास न करो, यह आत्मघाती क़दम है। इसे एक ही ऋतु में सीमित करके, इसके वातावरण को प्रभावित करने का दुस्साहस न करो, यह स्वास्थ्य के प्रतिकूल है।
कृष्ण ने जिनका वध किया, वे यवन नहीं थे। राम ने जिनका वध किया, उनमें कोई मुसलमान नहीं था। महावीर ने जिन्हें अहिंसा का उपदेश दिया वे सब बाहर से नहीं आए थे। राममोहनराय ने जिन कुरीतियों पर आघात किया वे हमारे ही समाज में मौजूद थीं। दयानन्द सरस्वती ने जिस कर्मकांड को दर्पण थमाया, वह हमारे ही समाज का अंश था। हर समय में, हर समाज में कुछ नकारात्मकता अवश्य होती है। इस नकारात्मकता को किसी वर्ग विशेष से जोड़कर प्रचारित करना समाज के स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। कोई भी हर बार सही नहीं होता, और हर बार ग़लत नहीं होता। लोगों को मत देने के अधिकार से वंचित न करो, उनके जनमत को धिक्कारना बन्द करो, नहीं तो यह लोकतंत्र इस अहमन्यता को सिरे से नकार देगा!

✍️ चिराग़ जैन

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