Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
एक
सवाल था।
अनदेखी की
गोद में पलकर बड़ा हुआ,
और लापरवाही की
उंगली पकड़ कर
धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
जैसे ही सवाल पर
यौवन का ज्वार चढ़ा,
वह अपना
समाधान ढूंढने निकल पड़ा।
समाधान की चाह में,
उसे कुछ दोस्त मिल गए राह में।
समाजसेवा ने
उसे आवारागर्दी की लत लगाई,
राजनीति ने उसे
नशा करने की कला सिखाई।
मीडिया ने
समय बर्बाद करने का हुनर सिखाया,
तकनीक ने
अफवाह से उसका परिचय करवाया,
और आंदोलनों ने
उसके साथ मिलकर
सड़कों पर दंगा मचाया।
जवानी का महत्वपूर्ण समय
नष्ट करने के बाद,
जब सवाल बिल्कुल अकेला रह गया
तो उसे फिर से आई
समाधान की याद।
चक्कर काटते-काटते
देश की चिंता में व्यस्त दरबारों के,
उसे समझ आ गया
कि टोटके एक जैसे ही हैं इन सारों के।
एक दिन
दिन-दहाड़े
एक मीडिया स्टूडियो में
सभी राजनैतिक दलों ने
सवाल को घेर लिया,
फिर एंकर के साथ मिलकर
बंद स्टूडियो में
ऑन कैमरा उसे ढेर किया।
अपने पुराने यार की लाश देख
समाजसेवा और आंदोलन की आँख भर आईं,
उद्योगपतियों ने अनुदान देकर
उस सवाल की चिता सजाई,
लेखकों ने उसकी मौत पर
अलग-अलग तेवर के लेख लिखे,
संसद और विधानसभा
उसकी शवयात्रा में बहुत उदास दिखे।
एक नन्हें से नए सवाल के हाथों
उसकी चिता जली,
और इस दाह-संस्कार में
एक अदद समाधान की अनुपस्थिति
सबको खली।
अगले दिन
देश जब उसके फूल चुनने गया
तो देश का मन खिन्न था,
चिता की सुलगती हुई राख में
अस्थियों से बना
केवल एक प्रश्नचिन्ह था।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
आरोपी और अपराधी में क्या अंतर होता है; यह समझने के लिए विवेक का जागृत होना आवश्यक है। उन्माद विवेक की हत्या करके जन्म लेता है। उन्माद भीड़ का मूल स्वभाव है। हमारी राजनीति हमें नागरिकों से जनता और जनता से भीड़ बनाने में तो सफल हो ही गई है। जब लिंचिंग और एनकाउंटर जैसे हथकंडे जन से प्रशंसा पाने लगें, तब समाज में तर्क और निष्पक्षता की बात कहने पर अपशब्द ही सुनने को मिलेंगे। सोशल मीडिया पर आसाराम और रामरहीम का अब तक भी समर्थन किया जा रहा है। यह प्रश्न किसी आसाराम और रामरहीम का है ही नहीं! प्रश्न आत्मबल और आत्मविश्वास से हीन उस भीड़ का है जो किसी भी गड़रिये की हाँक सुनते ही ख़ुद को बकरी समझ लेती है।
प्रश्न उन युवाओं का है, जो किसी भी चर्चा में तर्क के मूलभाव को सुनने से पूर्व कहनेवाले की विचारधारा का परिचय टटोलने लगते हैं। प्रश्न उन लोगों का है जो आठ दिन में यह भूल जाते हैं कि हैदराबाद की दुर्घटना के मूल कारणों में पुलिस की लापरवाही भी एक बड़ा कारण थी। आज जिस पुलिस की विरुदावलियाँ गाई जा रही हैं, उसी पुलिस के व्यवहार और आचरण की विश्वसनीयता की स्थिति यह है कि उसके सम्मुख स्वीकार गया तथ्य भी न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उस पुलिस की जाँच प्रक्रिया इतनी दोषरहित है कि आरुषि हत्याकांड में पुलिस की दो अलग-अलग टीमों ने समान तथ्यों के आधार पर बिल्कुल विपरीत आकलन अदालत के सम्मुख प्रस्तुत किया था।
दहेज हत्याएँ हुईं तो सरकार ने दहेज विरोधी और घरेलू हिंसा विरोधी क़ानून बना दिए। सरकार की वाहवाही हुई और बाद में इन क़ानूनों का दुरुपयोग कर हज़ारों परिवार बर्बाद होते रहे। दामिनी कांड हुआ तो केवल लड़की की शिक़ायत के आधार पर किसी को भी गिरफ़्तार करने का नियम बन गया, सरकार की वाहवाही हो गई और इन क़ानूनों के दम पर ब्लैकमेलिंग का धंधा चल निकला। हमारा पूरा तंत्र जल्दबाज़ी में है। जल्दी से लीपापोती करो, नहीं तो महिलाओं के वोट हाथ से निकल जाएंगे।
जल्दी से घोषणा करो, नहीं तो जनता सरकार के विरुद्ध हो जाएगी। आंदोलनकारियों को भी जल्दी से सब कुछ चाहिए होता है। इतनी जल्दबाज़ी में समस्याओं के विवेकपूर्ण उपाय नहीं हो सकते। अदालतें एक मुआमले का फ़ैसला सुनाने में दशकों लगा देती हैं, वहाँ काम जल्दी हो; इसकी किसी को चिंता नहीं है लेकिन क़ानून बनाने में जल्दी करने की होड़ लग जाती है। यदि विधायिका अपने निर्णयों में जल्दी न करे तो न्यायपालिका को अपने निर्णय में देर न करनी पड़े, और कार्यपालिका को अपनी जल्दबाज़ी से अराजकता की प्रशंसा लूटने का अवसर न मिल सके!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Hyderabad Police encountered rapists dramatically.
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम भारतीय लोग ज़रा हटकर सोचते हैं। जैसे ही कोई समस्या हमारे सामने आती है तो हम उसकी ओर देखते ही नहीं। समस्या चिंघाड़ कर कहती है कि मैं तुम्हारा सर्वनाश कर रही हूँ, लेकिन हम उसकी इन बातों को कान न देकर उसके अगल-बगल कुछ टटोलने लगते हैं। बिल्कुल उस पगले की तरह जिसे चोट लग जाए तो वह उसकी मरहम तलाशने की बजाय मरहम लगानेवाले के कपड़े फाड़ देता है।
समस्या निर्भया का विक्षिप्त शरीर लेकर हमें डराना चाहती है और हम महिला कानूनों को कड़ा करके इतराने लगते हैं। समस्या बुलंदशहर का वह परिवार दिखाती है जिसमें माँ-बेटी को दुनिया के सबसे लाचार पिता की आँखों के सामने रौंदा गया। सुनकर हम एक पल को दहलते हैं, लेकिन अगले ही पल हम सपा, बसपा और भाजपा, कांग्रेस को कोसने लगते हैं। समस्या प्रियंका रेड्डी की अधजली लाश लेकर फिर हमारे सामने आती है और हम इस लाश पर रोने की बजाय इसमें हिन्दू-मुस्लिम ढूंढने लगते हैं।
समस्या कन्फ्यूज़ हो जाती है कि मैं इस देश को बर्बाद कैसे करूँ, ये तो ख़ुद बर्बाद हो रहे हैं। टीवी चैनल भयंकर टेंशन में हैं। उन्हें इस बात की ग्लानि है कि कभी तो ख़बरों का ऐसा टोटा होता है कि भूत-प्रेत और सास-बहू चला-चलाकर स्लॉट खपाना पड़ता है और अब एकदम से ख़बरों की झड़ी लग गई है।
समझ नहीं आता कि उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल की आरती दिखाएँ, प्याज के बढ़े हुए दामों का चटकारा लगाएँ, प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर मज़े लें या हैदराबाद के इस बलात्कार का बुलेटिन बनाएँ। हद्द है। इस देश में घटनाओं का कोई रोस्टर होना चाहिए। पॉलिटिकल पार्टियों में अलग अफ़रा-तफ़री है। हैदराबाद को लेकर इतना कन्फ्यूज़न है कि लीडर समझ नहीं पा रहे कि इस घटना पर स्थानीय सरकार को गाली देनी है, या केवल घटना पर दुख प्रकट करके कन्नी काट लेनी है।
सोशल मीडिया पर अपराधियों के लिए आक्रोश दिखाई दे रहा है, जिसे देखकर महसूस होता है कि यदि सोशल मीडिया ही जनता हो तो देश में अराजकता फैल चुकी होती। प्रश्न किसी एक घटना का है ही नहीं।
हमारी न्याय प्रक्रिया, हमारी कार्यपालिका, हमारी विधायिका और हमारी पत्रकारिता एक बार, केवल एक बार यह गंभीरता से विचार करे कि समस्या की आँखों में आँखें डालकर उसका समाधान खोजने की बजाय इधर-उधर झाँकने की अपनी प्रवृत्ति से हम धोखा समस्या को दे रहे हैं या ख़ुद को!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमारा समाज पर्दे का दास हो गया है। मीडिया हमारे दृष्टिकोण तय करता है और हम भेड़ों की तरह स्वयं को बुद्धिमान मानकर उस दृष्टिकोण का अनुसरण करने लगते हैं।
‘दंगल’ फिल्म में गीता-बबीता को ज़बरदस्ती उनकी मर्ज़ी के बिना उनके पिता पहलवानी सिखाते हैं तो हम उनके पिता को महान सिद्ध कर देते हैं। क्योंकि कहानी के अंत में पिता (आमिर ख़ान) सही सिद्ध हो गए। हम मंज़िल देखकर रास्ते की प्रशंसा करने लगते हैं। इसी रास्ते पर जब ‘थ्री इडियट’ का डीन चलना चाहता है तो हम उसके खि़लाफ़ खड़े हो जाते हैं। क्योंकि अबकी बार आमिर ख़ान स्टूडेंट थे।
‘कालिया’ में अमिताभ बच्चन स्मगलर बन जाते हैं तो हम दुआ मांगते हैं कि वे पुलिस के हाथ न आएँ। ‘ज़ंजीर’ में वही अमिताभ इंस्पेक्टर बने, तो हम चाहते हैं कि उनके चंगुल से कोई मुजरिम न बचने पाए। इसका साफ़ मतलब है कि हमारी सोच दरअस्ल हमारी नहीं है। हम वह सोचते हैं जो टीवी चाहता है।
हम उतने भर को सच मान लेते हैं, जो पर्दे पर दिखाया जाता है। हम ठीक उसी एंगल से सोचने लगते हैं जिस एंगल से पर्दा चाहता है। हरियाणा में प्रेम विवाह के खि़लाफ़ खाप पंचायतों का फ़ैसला आता है तो हम प्रेमियों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। (कृपया ज्ञात हो कि मैं खाप के पक्ष में नहीं हूँ) किन्तु उत्तर प्रदेश में एक लड़की अपनी मर्ज़ी से सारे क़ानूनी दायरों में रहते हुए प्रेमी के साथ भाग जाती है तो उसके बर्बाद हो जाने की दुआ मांगी जाती है। उस पर लानतें भेजी जाती हैं। क्यों, क्योंकि खाप के मुआमलों में मीडिया ने हमें बताया कि परंपराओं के नाम पर यह अत्याचार है, और हम मानने लगे। लेकिन अब मीडिया ने हमें बताया कि एक दलित के साथ भाग कर लड़की ने अपने पिता की राजनैतिक प्रतिष्ठा भंग कर दी, उनके मुँह पर कालिख़ पोत दी …और हम मानने लगे।
मैं दोनों मुआमलों में किसी को ग़लत या सही नहीं ठहरा रहा हूँ। मैं केवल यह जानने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमारे समाज की अपनी कोई सोच है भी या नहीं। या फिर हम सदियों से मानसिक मवेशियों की तरह अनुसरण ही करते आ रहे हैं। हम एकतरफ़ा फैसला देने में इतनी जल्दी क्यों करते हैं। हम यह क्यों नहीं जानना चाहते कि घटना जहाँ से हमें दिखाई दे रही हैं, उसमें कोई आयाम अनदेखा भी हो सकता है। जो लड़की आज मीडिया के दरवाज़े पर खड़ी होकर अपने पिता से संवाद कर रही है, उसी लड़की ने यदि केवल पुलिस से आस लगाई होती या वह सीधे अपने पिता के सम्मुख खड़ी हो जाती और इसके बाद कोई अनहोनी हो जाती तो हम इसी सोशल मीडिया पर उसे मूर्ख बताते हुए कहते- ‘पागल थी, जिस प्रदेश में पिता नेता है, उसी प्रदेश की पुलिस से सहायता मांग रही थी, जानती नहीं थी क्या कि पुलिस कितनी भ्रष्ट है। सीधे मीडिया में आ जाना था, फिर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती उसका बाल बांका करने की।’
काश हम लोग, अपने विवेक से घटना के सम्यक आकलन का प्रयास भर करना सीखें। काश हम यह समझें कि आँखों को केवल दो आयाम दिखते हैं।
✍️ चिराग़ जैन