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बाँसुरी : माधुर्य की गंगोत्री

बाँसुरी मेरा प्रिय वाद्य है। अपनी ख़ामियों को ख़ूबी बना लेने का श्रेष्ठतम उदाहरण है बाँसुरी। बाँस के खोखलेपन से सुर निकाल लेने का चमत्कार है बाँसुरी। श्वास की लिपि से मन की भाषा बोलने का यंत्र है बाँसुरी। अंगुलियों पर थिरकते सुरों को उच्छ्वास की ऊष्मा से मीठा करने का...

चाहत

दिल ऊँचाई पर जाना भी चाहता है और किसी से बतियाना भी चाहता है दीवाना है, ज़िंदा है जिसकी खातिर उसकी खातिर मर जाना भी चाहता है दिल दे बैठा है जिसके भोलेपन को उस पगली को समझाना भी चाहता है मुश्किल है, अंधियारे को रौशन करना जल जाना तो परवाना भी चाहता है सूरज रब बन जाता है...

तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता...

कबिरा खड़ा बजार में…

कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा...

कविता बुन लेता हूँ

शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ यूँ कविता बुन लेता हूँ इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं इस सारी सामग्री में से मोती...
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