Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है।
विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों के वस्त्र चुराते, जूठे बेर खाते आप कल्पना नहीं कर पाएंगे। किसी अन्य धर्म के पास ठिठोली करता ईश्वर नहीं मिलेगा। किसी अन्य धर्म का आराध्य हनुमान की तरह अशोक वाटिका उजाड़ कर किसी पेड़ से फल तोड़कर खाने लगे तो यह उसके व्यक्तित्व को सूट नहीं करेगा।
यह सब केवल सनातन परम्परा में संभव है। यहाँ ईश्वर को जीवन के प्रत्येक क्षण में सम्मिलित किया गया है। सनातन परम्परा ईश्वर को किसी धर्मस्थल विशेष तक सीमित करने की पक्षधर नहीं है। यहाँ तो ईश्वर को साथ लेकर घूमने का रिवाज़ है।
घर में विराजमान लड्डू गोपाल बाक़ायदा घर के सदस्य की तरह रहते हैं। वे परिवार के साथ उठते हैं, सोते हैं, खाते-पीते हैं, नहाते हैं और घूमने भी जाते हैं। वे नाराज़ भी होते हैं और मानते भी हैं। पारलौकिक से ऐसा लौकिक संबंध अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है।
यही कारण है कि हमारा ईश्वर हमारे साथ हँसता है। खिलखिलाकर हँसता हुआ ईश्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह केवल हमारे पास सम्भव है।
माँ अनुसूया के पालने में त्रिदेव के खेलने की घटना इस बात की प्रमाण है कि सनातन परंपरा का ईश्वर वात्सल्य का सम्मान करता है। जसुमति मैया से झूठ बोलता कन्हैया ईश्वर के वात्सल्यबोध का परिचायक है। शबरी के जूठे बेर खाते राम और विदुरानी के हाथों से केले के छिलके खाते कृष्ण प्रेम की प्रतीति के उदाहरण हैं। रास रचाते कृष्ण संयोग सिंगार के प्रतिमान हैं और विकल होकर वन्य-वनस्पति से सीता का पता पूछते राम वियोग शृंगार के प्रतीक हैं। रुक्मणि के कृष्ण सदेह प्रेम की स्वीकारोक्ति हैं और मीरा के गिरिधर विदेह प्रेम के बिम्ब हैं। प्रह्लाद की आस्था पर खम्भ से उत्पन्न नृसिंह जब अपने नख से हिरण्यकश्यप का वध करते हैं तो भयानक रस साकार हो उठता है, और सती के आत्मदाह से क्रुद्ध शिव जब ताण्डव करते हैं तो रौद्र रस की सर्जना होती है। वामन अवतार में राजा बलि की समस्त सम्पदा नाप लेने वाले ईश्वर ने अद्भुत रस का उदाहरण प्रस्तुत किया। आँसुओं से सुदामा के चरण पखारते कृष्ण करुणरस का निमित्त हैं और नारद को हरिमुख देकर परिहास का पात्र बनाने वाले विष्णु हास्यरस की स्वीकृति हैं। युद्धक्षेत्र में भी उग्र न होकर संयत रहनेवाले राम शान्तरस का प्रमाण बन गए हैं।
सनातन परंपरा का ईश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हमारे साथ हो सकता है। यही कारण है कि विवाह के लिए सजती दुल्हन को गौरी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है और बारातियों को शिव के गण मानकर गारी गायी जाती है। कन्या के पिता को जनक मानकर गीत गाने का चलन आज भी हमारे समाज में है।
हमने ईश्वर की अनुभूति के ताने को दिनचर्या के बाने के साथ ऐसे बुन दिया है कि गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक हर जगह किसी न किसी पौराणिक सन्दर्भ का प्रतीक मानकर जीव को ईश्वर के समतुल्य मान लिया जाता है।
अन्य लगभग सभी धर्मों की कट्टरता या अदृश्य कट्टरता ने उनके ईश्वर को केवल धर्मस्थलों तक सीमित कर दिया है। यही कारण है कि उनके ईश्वर के साथ केवल भक्ति का सम्बंध बनता है। प्रेम, क्रोध, वात्सल्य और हास-परिहास के संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसा कुछ करते ही उनकी भावनाएँ आहत हो जाती हैं। ऐसा कुछ करते ही वे असहिष्णु हो जाते हैं।
लेकिन सनातन परम्परा में यह सब कुछ सम्भव था। इसीलिए हमारे यहाँ ईश्वर को प्रतीक मानकर ख़ूब काव्य रचा गया। यदि हमारे यहाँ भी कट्टरता का रोग होता तो कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करनेवाले सूरदास को सूली पर चढ़ा दिया गया होता। कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण करनेवाले रसखान की गर्दन काट दी गयी होती। बिलखते हुए राम से परिचय करानेवाले तुलसी लोकनिंद्य हो चुके होते। शिव की बारात का बखान करनेवाले पुराण निषिद्ध हो चुके होते।
यह सनातन परम्परा का ही कनवास है कि यहाँ नारद मुनि के हास्यबोध और परशुराम तथा दुर्वासा सरीखे क्रोधित ऋषियों की कथा एक साथ स्वीकार्य है। जहाँ इंद्र तक को उसकी ग़लती का एहसास कराने के लिए कृष्ण गौवर्द्धन उठाने से नहीं हिचकते। गौवर्द्धन की घटना ईश्वर की ओर से मनुष्यता को यह संदेश देती है कि देवराज होने से ही कोई हमेशा सही सिद्ध होने का अधिकारी नहीं बन जाता।
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करनेवाले कृष्ण जिस धर्म के पास हैं, उनको यदि ऐसा लगने लगे कि कोई बात, कोई परिहास, कोई उपालम्भ, कोई तर्क, कोई चर्चा उनके ईश्वर का अपमान कर सकती है तो यह उनकी नासमझी से अधिक कुछ नहीं है।
ईश्वर तो मान-अपमान से काफ़ी दूर निकल गया है। वह भक्त के निश्छल अपनत्व का छोर पकड़कर कठौती तक चला आता है। यह अपनत्व किसी भी भाव से पूर्ण हो सकता है। यहाँ तो शत्रुभाव से ईश्वर का स्मरण करने वाले रावण और कंस तक को तारने का रिवाज़ रहा है।
इसलिए इन दिनों जो लोग ईश्वर के सम्मान के ठेकेदार बने घूम रहे हैं, उनको स्मरण हो कि जब तक कट्टरता से बचा हुआ है तब तक सनातन धर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता; और बाक़ी रही ईश्वर के सम्मान की बात तो उसकी चिंता ईश्वर पर छोड़ दें।
✍️ चिराग़ जैन
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होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़।
होली के दिन आपमें कृष्ण साकार होते हैं। मैं बचपन से कृष्ण के दैहिक वर्ण का विचार करता रहा हूँ। सुविधा के लिए साँवरे के विग्रह को काले या नीले रंग से दिखाने की परम्परा है किन्तु मैंने अपने आसपास इतना काला या ऐसा नीला रंग किसी मनुष्य की काया का देखा नहीं है।फिर एक दिन होली खेलते समय मुझे अनुभूत हुआ कि गुलाबी, बैंगनी, हरा, लाल, पीला, नीला और भगवा रंग जब स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं तो इस सम्मिलन से जो अनोखा सा रंग चढ़ता है, वही साँवरे का रंग है। जिसके लिए रंग शास्त्रियों ने कोई नाम तय नहीं किया है। यही साँवरा है। यही कन्हैया है। यही ब्रज का रंग है। यही फागुन का रंग है।
नियम और नीतियों ने नाप-तोलकर जिस मनुष्य को सभ्यता के शोकेस में सजा रखा है, उसको कुछ क्षण के लिए मन से जीने का अवसर देता है, होली का त्योहार। विवशता के रिंग मास्टर ने जिस शेर को सर्कस का जोकर बनाकर छोड़ दिया है, उसे एक बार पूरे सिंहत्व के साथ जंगल में दहाड़ने का मौक़ा देता है होली का पर्व।
नीतियों के इशारे पर किसी मशीन की तरह जिये जा रहे इंसान को एक बार उच्छृंखल होने का निमंत्रण देता है होली का दिन। अपने भीतर घुट रहे पागलपन को बाहर निकाल फेंकने का महोत्सव है होली।
हज़ारों वर्ष तक सभ्यता लपेटे घूम रहे व्यवस्थितों को देखकर शनैः-शनैः हमारा पूरा समाज सभ्यता लपेटकर घूमने लगा। जो पदार्थ कम उपलब्ध हो उसकी क़ीमत बढ़ने लगती है। प्राकृतिक रूप से जी रहे मानव ने जब करीने के परिधान से सज्ज मानव देखे होंगे तो उन जैसा बनने की होड़ लग गई होगी। यह होड़ बहुत ख़तरनाक होती है। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा समाज सभ्यता ओढ़कर घूमने लगा।
मानव इस हद्द तक सभ्य हो गया कि सभ्यता से ऊब होने लगी। इसलिए ज्यों ही होली पर कोई शंकर जी का बाराती बना बेलौस दिखाई देता है तो हम तुरंत उसकी देखादेखी अपना सभ्यता का आवरण उतार फेंकते हैं।
सभ्य से सभ्य मनुष्य भी जिस क्षण झिझक का खोल तोड़ता है ठीक उसी क्षण वह पूर्णतया प्राकृतिक हो उठता है। शादी-ब्याह में जब नाचने का अवसर आता है तो सभ्यता की झिझक से बंधे लोग किनारे खड़े तरसते रहते हैं और झिझक छोड़कर सहज हुए मनुष्य बेतरतीब नाचने लगते हैं। इस झिझक ने हमें अनेक आनन्दों से वंचित किया है।
होली इस झिझक के खोल से बाहर निकलने का महोत्सव है। चुटकी, रंगबाज़ी, हुड़दंग, ठिठोली, छेड़छाड़, मज़ाक़, गाली-गलौज… ये सब सभ्यता और नैतिकता के व्यामोह को ग़ायब कर देते हैं। हाइजीन-कॉन्शियस लोग जब रंगे हुए हाथों और पुते हुए दाँतों से गुंजिया खाते हैं तो मैनर्स का भूत किसी फटे हुए गुब्बारे-सा ज़मीन पर लोटता दिखाई देता है।
अनावश्यक संबोधनों पर अपनत्व की गालियाँ हावी होने लगती हैं। कल्फ़ लगे कपड़े पहननकर एटिकेट्स के साथ साइलेंटली चलने-फिरने वाले पुतले यकायक भीगे, फटे और रंगे हुए कपड़ों में नाचते हुए सड़कों पर जीवंत हो उठते हैं।
मोबाइल के स्पीकर को होंठों से चिपकाकर न्यूनतम स्वर में बात करने वाले जेंटलमैन अपने गले को लाउडस्पीकर बनाकर जब हो-हल्ला करते हैं तो आवाज़ अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करती है।
होली का यह अवसर हँसने का अवसर होता है। जो दिखे, उस पर हँसी छूट जाती है। और आनन्द यह कि जब हम उस पर हँसने के लिए दाँत निकालते हैं तो हमारे दाँतों की शेड देखकर वह हम पर हँसने लगता है। उसे स्वयं पर हँसते देखकर हम और हँसते हैं।
अपमान, उपहास, बेइज़्ज़ती, इन्सल्ट और ईगो जैसे शब्द इस समय बेमआनी हो जाते हैं। नियमों की क़ैद से मुक्त होकर पूरा वातावरण ठहाके लगाने लगता है। छद्म शालीनता रंगों की बरसात में धुल जाती है। हवा में उड़ता गुलाल बालों के बीच विराजने लगता है तो सिर पर चढ़ चुका ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय भाग जाता है।
कदाचित भारत के अतिरिक्त भी कुछ समाज, मनुष्य के भीतर के पागलपन को बाहर निकालने के लिए कोई आयोजन करते हैं; किन्तु संबंधों के भीतर पनप गयी कुंठाओं को उखाड़ फेंकने के लिए होली से बेहतर कोई अन्य अवसर किसी के पास नहीं है।
अगर आपने अब तक होली से परहेज किया है और आज तक स्वयं को इस उत्सव-धारा से अछूता रखा है तो मुट्ठी में अबीर लेकर अपनी ही उंगलियों से ख़ुद के गालों पर लगा लो… आपको ख़ुद से मुहब्बत हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।
प्रेम के पथ पर भाव ही भाव हैं; वहाँ अभाव जैसा कुछ है ही नहीं। यही कारण है कि जिसने प्रेम को जिया वह भावुक हो उठा। जिसने प्रेम को भोगा, वह आनन्दित हो गया। जिसने प्रेम को सुना, वह मौन हो गया। यही मौन प्रेम की गहनतम अनुभूति का पाथेय है।
जिसने सर्वश्रेष्ठ को सुन लिया, उसे उसमें अपनी आवाज़ मिलाने का ध्यान ही नहीं आ सकता। मुँह में गुड़ की डली घुल जावे, फिर कौन मूर्ख उसका स्वाद बताने में रस नष्ट करेगा! हाँ, उसके मुखमण्डल की भंगिमा का आलोक देखकर अन्यान्य लोग उसे अभिव्यक्त करने का अनुमान अवश्य लगाते हैं। लेकिन यह केवल अनुमान भर है।
प्रेम की अनुभूति तो पूर्णता की अनुभूति है। वहाँ कोई उद्देश्य शेष रह ही नहीं जाता। यश-अपयश; स्वीकृति-अस्वीकृति.. ये सब उस अनुभूति से पूर्व के चिंतन मात्र हैं। जिसने पा लिया; वह तो घुल गया उसमें। हम इधर बैठे अनुमान लगाते रह गए। जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैंठ… वह तो गहरे पानी पैंठ गया। और हम बावरे किनारे बैठकर लिखते रह गये कविता। बूझते रह गये पहेलियाँ। गढ़ते रह गये परिभाषा।
मीरा तो विलीन हो गयी। और हम इस पहेली में उलझे रह गये कि उसकी गुनगुनाहट ‘भक्ति’ है या ‘शृंगार’। सूर तो बिना आँखों के उसे देखकर निहाल हो लिये और हम उनकी रचनाओं में उसे ढूंढते रह गये। कबीर ने कुछ लिखा थोड़े ही। वह तो बावरा-सा उससे बतियाते हुए बड़बड़ाता रहा। और हमने उस बड़बड़ाहट को लिखकर दावा कर दिया कि हमने कबीर को सहेज लिया।
यह सब हमारा अंधविश्वास है। प्रेम की अनुभूति हम तक कभी आयी है तो हमने उसे अपनी व्यस्तताओं की चादर से ढँक दिया है। ऐसा नहीं है कि हमने प्रेम को जिया नहीं है। हमारे सम्मुख भी ऐसे अवसर अवश्य आए हैं कि प्रेम का अथाह सागर बाँहें फैलाये हमें समेटने को द्वार तक चलकर आया। लेकिन इस क्षण किसी ने बताया कि तुम पागल हो गये हो, और हमने पैर पीछे हटा लिये। यही तो अवसर था पागल हो जाने का। लेकिन हमें तो किसी ने समझाया और हम समझ गये… हम जैसे समझने को तैयार ही बैठे थे। …उफ़! यही समझना तो ख़तरनाक हो गया। इसी अवसर पर तो बुल्लेशाह हो जाने की ज़रूरत थी। …बुल्ले नू समझावण आइयां, बहना तें परजाइयां।
अच्छा हुआ कि बुल्लेशाह नहीं समझे। समझ जाते तो गये थे काम से। उन्होंने उस क्षण में अपने प्रेम की गोद में बैठकर बेफ़िक्री का उद्घोष कर दिया- ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन?’ इस क्षण में समझानेवाले से उसकी पहचान नहीं पूछनी होती। यह क्षण तो ख़ुद को तलाशने का क्षण है। और जब प्रेम हमें चारों ओर से घेर ले तो बेफ़िक्री से गा उठो- ‘रब्ब दीआं बेपरवाहियाँ।’
बुल्लेशाह बहनों और परजाइयों की बात समझना तो चाहता है, लेकिन वो उस बुल्लेशाह को पहचान नहीं पा रहा है जिसे उनकी बात समझ आ सके। यहाँ, जहाँ वह पहुँच गया है, वहाँ बहुत सारे बुल्लेशाह हैं। बल्कि यूँ कहें कि सारे ही बुल्लेशाह हैं। बिल्कुल एक जैसे। यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। इसलिए इनमें से आपकी बात समझनेवाला बुल्लेशाह ढूंढा नहीं जा सकता। क्योंकि वहाँ तो सब एक ही हैं। …प्रेम गली अति साँकरी या में दो न समाय। फिर तो सभी अंतर मिट जाते हैं। स्त्री-पुरुष; जाति-धर्म; देह-विदेह; भक्त-भगवान सब एक हो जाते हैं। फिर कृष्ण, राधा के वस्त्र पहनकर नाच सकते हैं। फिर भगवान भी भक्त के पीछे दौड़ सकते हैं… पीछे-पीछे हरि फिरें।
यह सब शब्दातीत है। यह सब अमूर्त है। यह सब निराकार है। जाति, कुल, गोत्र, लाभ, हानि, नियम, युग, देश, धर्म… सबकी सीमाओं के पार। और इसे पाने के लिये कहीं जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो ठीक वहीं तक चलकर आता है, जहाँ आप उपस्थित हैं। कहीं जाकर या कहीं होकर, इसे पा लेने की बातें कोरी अफ़वाह हैं।
यह इतना सहज है कि इसके अनुमान भर पर जो साहित्य रचा गया, उससे रस के अजस्र स्रोत फूट पड़े। प्रेम की समस्त कविताएँ इस अकथ अनुभूति का अनुमान भर हैं। यूँ समझ लो कि मिर्ज़ा के विश्वास पर चेनाब की धार में उतरने वाली सोहनी पार हो गयी और हम उसके कच्चे घड़े के साथ डूब गये। महसूस करो, कि जब उस डूबने की कथा में हमें इतना रस मिल रहा है तो जो पार हो गयी, उसको क्या मिला होगा!
हम तब से अब तक कहते फिर रहे हैं कि सोहनी कच्चे घड़े के भरोसे चेनाब में उतर गयी और डूब गयी। यह हमारी आँखों के द्वारा बोला गया झूठ है। भला घड़े के भरोसे कोई चढ़ती नदी की धार में उतरता है। ये नदी की धार, ये कच्चा घड़ा और ये डूबती हुई सोहनी… ये सब हमारी आँखों द्वारा फैलाई गई अफ़वाह हैं। नदी कहीं बाहर थी ही नहीं। नदी तो सोहनी के भीतर थी। उत्ताल तरंगों के ज्वार का वेग। प्रेम का अथाह सागर सोहनी के मन में लहरा उठा होगा। …इस सागर से पार उतरने के लिए कच्चे घड़े की नहीं, पक्के विश्वास की आवश्यकता होती है। उस दिन उस पार मौजूद मिर्ज़ा की आँखों में वह विश्वास दिखा होगा सोहनी को, और एक बार यह विश्वास दिख जावे, फिर घड़ा फूट सकता है, लेकिन विश्वास नहीं टूट सकता। प्रेम का विश्वास अनब्रेकेबल होता है। पूरा ब्रह्मांड थर्रा उठे तो भी प्रेम के विश्वास का पाँव नहीं हिल सकता।
इसीलिए सोहनी को डूबते देखकर जो साहित्य रचा गया उसे पढ़ने कभी न तो सोहनी आई, न महिवाल। वो तो उतर गये पार। और हम टूटे घड़े के टुकड़े उठाकर साहित्य रचते रह गये। ‘बाणोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्’ -संस्कृत की इस उक्ति को जब मैंने पढ़ा तब समझ न सका था। लेकिन जब मैंने बाणभट्ट का साहित्य पढ़ा तो इसका अर्थ ज्ञात हुआ। आज यही उक्ति मैं प्रेम के संदर्भ में कहता हूँ- ‘प्रेमोच्छिष्टम् सरस सर्वम्!’ जो भी कुछ सरस है, वह प्रेम की जूठन है। मूल स्रोत तो कहीं पुण्डरीक की प्रतीक्षा में बसा हुआ है। वह तो कादम्बरी के सौंदर्य में बिंधा धरा है। और हम पत्रलेखा-सी परिचारिका की भाँति प्रयासरत हैं।
लेकिन यह प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रेम की ये कविताएँ भी किसी-किसी क्षण आपके भीतर स्थित अनुभूति की इस कुंडलिनी को जागृत कर सकती हैं। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई देवल आशीष लिख बैठता है कि ‘मैंने धरती को दुलराया, तुमने अम्बर चूम लिया।’ यह साधारण पंक्ति नहीं है। यह लहरों में समाती किसी सोहनी के उस पार उतर जाने की गवाही का प्रयास है। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई महादेवी वर्मा कह लेती हैं कि ‘जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा, कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग’ -यह पंक्ति भी साधारण नहीं है। यह शबरी की प्रतीक्षा में व्याप्त राम के विश्वास की मुहर है। यह उस एक क्षण की यूएसपी है, जिसके लिए कोई जीवन भर बेर चुन-चुनकर प्रतीक्षा कर लेता है।
इन्हीं प्रयासों में माया गोविंद लिख पाती हैं कि ‘आशाएँ अलख जगाती हैं, बीमार कल्पना के द्वारे।’ -यह पंक्ति प्रेम की अनुभूति का कुछ अधिक स्पष्ट झरोखा है। कल्पना की बीमारी को भाँपकर आशाओं की अलख देखने में कवयित्री सफल हुई हैं। प्रेम के महीन परत को उघाड़कर देख लेने में कवयित्री सफल हुई हैं।
यह परत शृंगार की रचनाओं में ही उघड़ पाए… ऐसा कतई आवश्यक नहीं है। यह कहीं भी सामने आ जाती है। क्षण मात्र के लिए जब ‘वह तोड़ती पत्थर’ में भी यह परत उघड़ती दिखाई देती है तो इसको जीनेवाले निराला की आँखें यकायक लाल होते हुए भीग जाती हैं। लेकिन ‘सरोज-स्मृति’ के निराला की आँखें यकायक लाल नहीं होतीं, उनके अश्रुओं का रंग धीरे-धीरे गुलाबी होता है और फिर उनका मन नीला पड़ जाता है।
पर ये सभी रंग जिस इंद्रधनुष से फूट रहे हैं, वह सतरंगा इन्द्रधनु प्रेम के क्षितिज पर ही उभरता है। जिस रचनाकार ने एक बार इस क्षितिज पर टकटकी लगा दी, उसके लिये फिर रस की कोई कमी न रही। कल्पना के पंख लगाकर स्वयं को विहग कर लेना जिसने सीख लिया, उसी को प्रेम का विहंगम दृश्य देखना नसीब हो सका। फिर मेघदूत का यक्ष अपने चारों ओर विस्तृत प्रकृति में प्रिया के दर्शन कर पाता है। फिर मेघ के हाथों संदेशा भेजा जा सकता है। फिर वाल्मीकि आश्रम में बैठकर यह अनुमान किया जा सकता है कि द्रोणाचल से फूटते झरनों का दृश्य कैसा रहा होगा। फिर कलयुग में बैठकर यह भाँपा जा सकता है कि वाटिका में राम से नयन मिलने पर सीता कैसे लजा गयी होंगी। फिर बेर की कँटीली झाड़ियों से जूठी मिठास सहेजकर प्रेम के अपूर्व बिम्ब रचे जा सकते हैं। फिर विदुरानी खाद्य और अखाद्य का भेद भूल सकती हैं।
फिर हवा के स्पर्श से कँपकँपाती पाँखुरी की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देने लगती है। फिर किसी मीठी याद में गड़ा तिनका बरसों बाद भी कविता की याद में चुभ सकता है। फिर देवता के गुनाह में भी पारलौकिक प्रेम के दर्शन किये जा सकते हैं। फिर सब कुछ देखा जा सकता है। फिर सब कुछ जाना जा सकता है।
हज़ार कवि प्रेम के इस मार्ग पर चलते हैं तो उनमें से कोई एकाध ही देह के पार पहुँचकर प्रेम-वैभव तक पहुँचने वाली राह को स्पर्श कर पाते हैं। और इस राह को स्पर्श करने वाले हज़ारों कवियों में कोई एकाध ही विदेह के भी पार पहुँचकर प्रेम को स्पर्श करने में सफल होता है। और ये एकाध ही कबीर, मीरा, सूर, बुल्लेशाह होकर अपनी अनुभूतियों की गूंज से युग-युग तक प्रेम का स्मरण कराते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
22 जनवरी 2005 को शाम के बुलेटिन में ख़बर आई की दक्षिणी मुम्बई के एक फ्लैट से परवीन बॉबी का शव बरामद हुआ है। समाचार वाचक ने बताया कि परवीन बॉबी की मौत के दो दिन बाद पुलिस ने उनका शव बरामद किया।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि उस दिन वह समाचार बुलेटिन मेरे भीतर एक सिहरन पैदा कर गया था। मैं देर तक यह सोचता रहा कि जिन सितारों को दूर से देखकर हम रोमांचित होते हैं उनके भीतर का भयावह अकेलापन उनके जीवन को किस हद्द तक असह्य बना देता है।
एक अदद ज़िन्दगी अनबूझ पहेली की तरह दुनिया से विदा हो गयी, और इस भयावह सन्नाटे में अचानक खुसर-फुसर की आवाज़ें सरसराने लगीं। किसी ने कहा कि वह शराब बहुत पीती थी इसलिए किडनी फेल हो गयी। किसी ने कहा कि डैनी के प्यार में पागल होकर मर गयी। किसी ने अमिताभ बच्चन से नाम जोड़ा तो किसी ने महेश भट्ट से। किसी ने कबीर बेदी की दीवानी बताया तो किसी ने कहा कि काम मिलना बंद हो गया था इसलिए भूखी मर गयी।
कनबतियाँ चटखारे लगाती रहीं और फिल्मी ग्लैमर के चरम को छूकर लौटी एक नायिका अपने भोगे हुए सच को अपनी पलकों में मूंदे हुए दुनिया से रुख़सत हो गयी। उस दिन मैं बहुत देर तक उदास रहा था। आज तक पर देखी वो खिलखिलाती सूरत देर तक मेरे ज़ेहन में ठहाका मारकर हँसती रही और मैं उसके ठहाकों की व्यंजना में संवेदना की कराह को देर तक सुनता रहा।
उस दिन से मैंने किसी भी सामाजिक व्यक्ति की निजता में झाँकना बन्द कर दिया। उस दिन के बाद मैंने जाना कि फलों से लदा हुआ हर वृक्ष अपनी जड़ों में दमघोंटू उमस से घिरा होता है।
आज बस यूँ ही तारीख़ पर निगाह पड़ी तो याद आ गया वह एहसास जो मैंने एक क्षण में उस अभिनेत्री के साथ जी लिया था। एक ऐसी अभिनेत्री के साथ जिससे मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, जिससे मैं कभी मिला नहीं था…
लेकिन यह एहसास मुझे आज भी हिला देता है कि जिस दुनिया के मनोरंजन के लिए उसने अपने आँसुओं पर खिलखिलाहट का मेकअप पोत लिया था, उस दुनिया ने उसकी मौत को भी गॉसिप की थाली में रखकर मिर्च-मसाला लगाकर यूज़ कर लिया।
✍️ चिराग़ जैन