Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सपनों की आँखें पथराईं
हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं
संघर्षों की तेज पवन ने
प्राणों की शाखें दहलाईं
इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला
स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला
लक्ष्मण, वैदेही, रघुराई
और न कोई संग सहाई
इतनी पीर सही तीनों ने
विधिना की आँखें भर आईं
फिर भी कब आँसू छलकाए, पुरुषोत्तम रघुबीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
किष्किंधा के द्वार खुले थे, किन्तु न नगर प्रवेश किया
निज अनुशासन की सीमा में, जीवन सकल निवेश किया
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाएँ पर वचन न जाई
दशकंधर से लंका जीती
और विभीषण को लौटाई
तीरों से कब मोह किया है, वीरों के तूणीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
हर चर्चा का सार बने हैं, जन-जन के अभिवादन हैं
आशा का आधार बने हैं, हर सम्भव के साधन हैं
केवट ने ली जो उतराई
शबरी जो झोली भर लाई
जो पूंजी जोड़ी रघुपति ने
उसकी चमक युगों पर छाई
सबकी दौलत ओछी कर दी, राघव की जागीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
दुनिया के ऐरे-ग़ैरे फरमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
रोज़ी-रोटी के पचड़ों में उम्र गँवाने वाले लोग
दिल की भाषा भूल चुके हैं अक्ल चलाने वाले लोग
पैसा-पैसा करते इन नादानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
लानत की कुछ फिक्र नहीं है, तारीफ़ों की चाह नहीं
दुनिया वाले क्या सोचेंगे अब इसकी परवाह नहीं
कभी-कभी आने वाले मेहमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
एक झलक पर दुनिया को कुर्बान किया जा सकता है
सब कुछ खोकर मिलने का अरमान जिया जा सकता है
दिल की सुनने वाले हम धनवानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
इश्क़ बरसता है तो हर मौसम सावन हो जाता है
प्यार अगर सच्चा हो तो फिर मन पावन हो जाता है
ईटू-मीटू जैसे इन अभियानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हम सब इस कारण ज़िन्दा हैं, शायद मर जाना दूभर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
जब तक सम्भव हो तब तक ये श्वास चलाने को ज़िन्दा हैं
तन को इंधन दे पाएँ, बस भूख मिटाने को ज़िन्दा है
शायद कुछ ऐसा कर जाएँ, दुनिया जिसको याद रखेगी
जीवन भर का जीवन जीकर, फिर मर जाने को ज़िन्दा हैं
कुछ लोगों का तन जर्जर है, कुछ लोगों का मन जर्जर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबको ऐसा भ्रम होता है, हम जग में अपवाद बनेंगे
अब तक मौन रही है दुनिया, फिर भी हम संवाद बनेंगे
लेकिन माली जान रहा है, बगिया के हर इक बिरवे को
सब कोंपल बनकर जन्मेंगे, मर जाने पर खाद बनेंगे
कब खिलना है, कब मुरझाना यह भी ऋतुओं पर निर्भर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबकी इतनी सी चाहत है, सुख का कुछ सामान जुटा लें
आँख मिली है सपने पालें, कण्ठ मिला है शोर मचा लें
एक ज़रा सी भूल हमारे है को है से थे कर देगी
ऐसे-वैसे जैसे भी हो, हम अपना अस्तित्व बचा लें
उस जीवन पर मुग्ध सभी हैं, जो पहले दिन से नश्वर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
✍️ चिराग़ जैन