मंज़िल
जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
✍️ चिराग़ जैन
जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
✍️ चिराग़ जैन
पीड़ा की तैयारी कर लो, सुख का आमंत्रण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
ईश्वर का अवतार जना है, माता को अभियोग मिलेगा
कान्हा जैसा लाल मिला है, आगे पुत्रवियोग मिलेगा
नारायण के बालसखा ने निर्धनता के कष्ट सहे हैं
वंशी के रसिया जीवनभर, समरांगण में व्यस्त रहे हैं
राधा के जीवन में दुख से पहले वृंदावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
वरदानों का सुख पाया तो, सुख का फल अभिशाप हुआ है
तप का पुण्य कुमारी कुंती के जीवन का पाप हुआ है
जो शाखा फैली है उसने कट जाने की पीर सही है
अर्जुन जैसा वर पाया, फिर बँट जाने की पीर सही है
पहले रानी बनने का सुख, पीछे चीरहरण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
सुख के पीछे दुख आएगा, हर क़िस्से का सार यही है
जितनी घाटी, उतनी चोटी, पर्वत का विस्तार यही है
यौवन आने का मतलब है, आगे तन जर्जर होना है
जिस धारा ने निर्झर देखा, अब उसको मंथर होना है
नदियों में ताण्डव उफना है, जब घिरकर सावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
✍️ चिराग़ जैन
हर सन्नाटा मुखरित होगा, जब मैं स्वर लेकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
थक कर टूट नहीं सकता हूँ, मुझको श्रम का अर्थ पता है
बढ़ने की इच्छा कर देगी, हर मुश्क़िल को व्यर्थ पता है
मेरे हाथों की रेखाओं में इतनी कठिनाई क्यों है
निश्चित मानो, भाग्य विधाता को मेरा सामर्थ पता है
पीड़ा को उत्सव कर लूँगा, आँसू को गाकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
मेरे मग में संघर्षों के ठौर न आएँ; नामुम्किन है
अपना बनकर ठगने वाले और न आएँ; नामुम्किन है
फिर भी हर पतझर को पानी देता हूँ, विश्वास मुझे है
फाग उड़े और अमराई पर बौर न आए; नामुम्किन है
हर आँधी से जूझ रहा हूँ, हर सावन जीकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
जो औरों पर लद जाता हो, मैं ऐसा क़िरदार नहीं हूँ
अपमानित होकर मुस्काऊँ, इतना भी लाचार नहीं हूँ
जितने डग नापूंगा, उतनी धरती मेरे नाम रहेगी
अपने पैरों पर चलता हूँ, बैसाखी पर भार नहीं हूँ
जितना पहुँचूँगा अपने ही पैरों पर चलकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
✍️ चिराग़ जैन
हार का ख़ौफ़ गुनहगार बना देता है
जीत की चाह कभी वार नहीं कर सकती
हाथ वहशत की ग़ुलामी पे अड़े थे, वरना
फूल का क़त्ल तो तलवार नहीं कर सकती
बेच दी होगी चकाचौंध में ग़ैरत उसने
भूख इंसान को ग़द्दार नहीं कर सकती
रौशनी नूर तो आलम पे लुटा सकती है
पर अंधेरे को गिरफ़्तार नहीं कर सकती
अश्क़ अशआर के लहज़े में बयां होते हैं
आशिक़ी दर्द को अख़बार नहीं कर सकती
✍️ चिराग़ जैन
प्रीति रहेगी, प्यार रहेगा, जीवन का विस्तार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा
सन्नाटे से शोर उगेगा, शोर पुनः सन्नाटा होगा
मंदी होगी, तेज़ी होगी, लाभ रहेगा, घाटा होगा
सारे सौदागर मर जाएँ, फिर भी ये बाज़ार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा
स्वप्न यही होंगे नयनों में, लेकिन नयन बदल जाएंगे
अर्थ यही होंगे बातों के, लेकिन कथन बदल जाएंगे
आज हमारे मन में है जो, यह ही शेष विचार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा
हम जलकण हैं लहरों में मिल, थोड़ा-बहुत बहल जाएंगे
सागर ऐसे ही गरजेगा, हम बादल में ढल जाएंगे
हर पल कुछ लहरें टूटेंगीं, पर सागर में ज्वार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा
हर त्रेता में कलयुग होगा, हर कलयुग में त्रेता होगा
हर युग में इक श्रवण रहेगा, हर युग में नचिकेता होगा
उत्तर भी बहुतायत होंगे, प्रश्नों का अंबार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा
✍️ चिराग़ जैन